अज़ीज़ नाज़रीन,
जिस अंदाज़ में ज़ाफ़रानी महाज़ ने २०१४ उसके बाद २०१९ में मुतलक़ अक्सरियत हासिल की थी तो ज़ाफ़रानी तंज़ीम गर अपनी जेब भरने और हिंदुत्व के नाम पर अवाम को गुमराह करने के बाजए अगर अवाम के लिए काम करती तो बोहोत कुछ बेहतर कर सकती थी।
लेकिन इन १० सालों की ग़ुलामी में ज़ाफ़रानी तंज़ीम ने सिर्फ़ और सिर्फ़ मुल्क के असासों पर डाका डाला नाम बदले अवाम को ज़हरिला बनाया मुख़ालिफ़ों को ख़तम करने की हिकमत की और पाकिस्तान को कोसा। अब तो अवाम को भी ज़ाहिर हो चूका होगा की संघी और ज़ाफ़रानियों को अंग्रेज़ों के ग़ुलाम वतन का ग़द्दार क्यों कहा जाता था। अंग्रेज़ों ने हिंदुस्तान का माल लूट कर ब्रिटेन ले गए और ज़ाफ़रानी तंज़ीम ने लूट कर स्विस बैंक में जमा किया।
अब बात असल मुद्दे पर आतें हैं सभी ने भारत को लूटा जिन्होंने उसको अपनी माता माना उन्होंने ही उसको ज़ख़्मी किया। अगर कोई सच्चा भारत का हमदर्द रहा तो वही जिसको बाल्टी भर भर के मुख़ालेफ़ीन, ज़ाफ़रानी और जुम्मन गाली देते रहे। भक्तों और लंगूरों के दूल्हे भाई जान असदुद्दीन ओवेसी और उनकी तंज़ीम मजलिस उसको किसी भी क़िस्म का कोई चन्दा नहीं मिला। क्या मुल्क में मुस्लिम अमीर ज़ादे कम हैं हैदराबाद में ही ऐसे कितने मिल जायेगें जो एक ही झटके में १०००-१२०० सो करोड़ चन्दा दे सकते थे। लेकिन सदर असदुद्दीन हराम कमाई पर यक़ीन नहीं रखते है वोह इस्लामिक उसूलों पर चलने वाले मुजाहिद हैं। अगर उनके पास ऐसा कोई ऑफर आया भी होगा तो उन्हने मना कर दिया होगा।
चंदे की रक़म सभी को मिली क्या इक़्तेदार वाली जमात क्या मुख़ालेफ़ीन अगर नाम नहीं है तो भक्तों के दूल्हा भाई का नाम नहीं है और ना ही "बी" टीम का नाम है। फ़ायदा किस को हुआ उन्हीं को जिन्होने मजलिस और असदुद्दीन पर इल्ज़ाम लगाया और सत्ताधारी पक्ष को हुआ। क्या बोलते थे जुम्मन फ़ायदा पहुचायेगा बीजेपी से पैसे खाये अमित शाह ने वोट तक़सीम के लिए पैसे दिए। यहाँ तक २०१९ के बाद एक जुम्मन सोशल मीडिया पर ज़हर फैला रहा था मेने ख़ुद असाउद्दीन को अमित शाह के बंगले से निकलते देखा है उनके पी.ए. के दोनों हाथों में दो काले सूट केस थे। इतना बड़ा झूठ एक सच्चे मुजाहिद पर लगाया तो अब तमाम बदगुमानी उन ही लोगों की ज़ाहिर हो रही है जिन्होंने इलज़ाम लगाया था।
नाज़रीन एक बात आप लोगों को बता दूँ जिन मुग़लों के नाम से इन ज़ाफ़रानियों की दर्जे हरारत बढ़ जाती थी उनमे से किसी ने भी हिंदुस्तान के साथ ग़द्दारी नहीं की। जो कमाया यही से कमाया और यही पर छोड़ कर चले गए। यहाँ तक की जिन सूफ़ी बादशाह आलमगीर औरग़ज़ेब रेहमतुल्लाह अलैहे के ऊपर हर वक़्त इन ज़ाफ़रानियों का नज़ला उतरता रहता है उन्होंने हुकूमत के माल से अपनी तन्खा तक नहीं ली। अपनी रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी वोह टोपी बून कर क़ुरआन लिख कर पूरी करते थे। उनकी वसीयत के हिसाब से ही उनकी क़बर को एक आम क़बर जैसा रखा गया नहीं तो ख़लीफ़ा ए वक़्त थे आलमगीर थे उनके लिए दौलत के ख़ज़ाने खुले हुए थे जैसी चाहते अपनी क़बर को तामीर करवाने का हुकुम जारी कर देते। दूसरी बात किसी भी मुस्लिम बादशाह ने आवारा गर्दी दुनियां घूमने फिरने में मुल्क का पैसा बर्बाद नहीं किया। तभी तो किसी भी बादशाह ने हज का सफ़र नहीं किया। कियोंके हुकूमत का पैसा फ़िज़ूल बर्बाद नहीं करना था। नहीं तो आज का राजा उसका सूट ही १५ लाख का होता है आवारा नंबर १
हर मुद्दे पर मुस्लिम अवाम को मुग़लों से मिलाते हैं। हाँ है हमारे अंदर मुग़लों की सक़ाफ़त। हाकिमियत के हुनर हैं, गंगा जमुनी तहज़ीब को बरक़रार रखने की आदत है, इन्साफ की बालादस्ती है, हराम लुक़मे हराम पैसे कमाने से बचने की आदत है। और यह बात अपने कई मज़मून और नज़्मों में तहरीर कर चूका हूँ हराम का एक लुक़मा नस्लें ख़राब करता है। हलाल के पैसे में बोहोत बरकत है, अब तो संघी, ज़ाफ़रानी तंज़ीम की नस्ल हो गई ख़राब।
दल बदलू गिरगिट बोलता है कोई १० करोड़ के बांड उसके दरवाज़े पर रख कर चला गया। आपका घर है या ख़ैराती दूकान। ऐसे गुप चुप तो कोई अपने नाजाइज़ बच्चे को अनाथालय के दरवाज़े पर छोड़ कर चला जाता है। अब बताओ क्या तुम्हारा घर अनाथालय है या ख़ैराती संस्था जहाँ हर ख़ास को हक़ है की अपनी गंदगी तुम्हारे दरवाज़े पर छोड़ कर चला जाए। और तुम उसको पालो पोसो उससे दो गुना मुनाफ़ा वसूल करो।
तेरा क्या होगा रे ५६ इंची,,,,,, भारत, भारत, मेने आपके साथ ग़द्दारी की है आपका पैसा खाया है। अब सज़ा खा।
सहाफ़ी ज़ुबेर
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