“This is the same radical and terror mentality of Hindus where a Member of Parliament from Amrawati Navneet Rana elected under Representation of Public Act threatened a respected Muslim member of Parliament Asaduddin in the house during the proceeding. "Bolna Padega, Hindustan me rehna hoga, JSR bolna hoga". If the percentage of Venom in Hindus so high against Indian Muslims then the foreign students are nothing in front of these terrorists. Such types of Hindu Radical politicians are the back bone of these terrorists, and they are getting support from these politicians. Now only foreign Countries can give collectively punish Indian Terrorism. Neglect, side by and debar India from any types of International policy making, trade and political opportunity. Then only this saffron virus will finish, failing which, it will give more trouble to international community”.
Notation from English desk of
Journalist Zuber
अज़ीज़ नाज़रीन,
जिस हिसाब से मुसलमानों और इस्लाम के ख़िलाफ़ मीडिया ने २०१२-१३ से ज़हर भरने का आग़ाज़ किया था उसका असर अब दिखने लगा है। जिन ज़ाफ़रानी तंज़ीम के नुमाइंदों ने नाग के ज़हर की काश्त कर के अपना सियासी रसूख बनाया लेकिन अब वोह ज़हर उनकी खुद की नस्लों को तकलीफ देने लगा है।
इन ज़ाफ़रानी ज़ेहनियत शिद्दत पसंद सियसतदांओं ने आम, नीम दीगर साया दार दरख़्त लगाने के बजाये बबूल बोये थे इस उम्मीद पर की इसके कांटे मुस्लिम अवाम के पैरों में पेवस्त होंगे लेकिन उन काटों की तकलीफ अब उनकी खुद की नस्लों को भोगनी पड़ रही है। जो नारा देते थे
"जिस हिन्दू का खून न खौले -खून नहीं वो पानी है।
जिसका कोई धर्म नहीं हो -उसकी व्यर्थ जवानी है"
अब वही जवानी जेलों में सड़ रही है और कोई नेता ऐसे दहशतगर्दों के साथ नहीं है।
नमाज़ पढ़ने पर आम तोर पर हिंदुस्तान में अक्सरियत तबक़े की जानिब से बवाल काटा जाता है। जब्कि अबू धाबी, पाकिस्तान, ओमान, बहरैन, अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे मुस्लिम और क्रिस्टी मुमालिकों में मंदिर की तामीर होती है तो खुशियां भारत में बनाई जाती हैं।
गुजरात में दौरान नमाज़ जो कुछ भी हुआ उससे भारत की साख को सख्त बट्टा लगा है। अब भले ही वज़ीर खारजा लीपा पोती करतें रहें हम एक्शन लेंगें मुजरिमों को बख़्शेगें नहीं लेकिन जो होना था वोह तो हो गया। इस ज़हर की फसल की असल उपज है एवान जहाँ पर हर हिन्दू शिद्दत पसंद सियसतदांओं ने नंगा नाच किया है। भले ही वोह मुस्लिम नुमाइंदों की हलफ बरदारी हो या मुस्लिम नुमाईंदों के हुकूमत से अपनी क़ौम की निस्बत से सवाल पूछने की हिकमत हो, हर मुद्दे पर हिन्दू शिद्दत पसंद सियासतदानों ने बरहना मुज़ाहेरा किया है। कभी मुस्लिम अवाम को उनके मज़हब के नाम पर ज़लील करना कभी उनको बाबर औरंगज़ेब या जिन्ना से शबी देना कभी उनको पाकिस्तान जाने की धमकी देना या पाकिस्तानी, ग़द्दार या आतंकवादी बोलना।
नमाज़ से किसी भी हिन्दू को कोई तकलीफ नहीं होती है और ना ही शोर शराबा होता है। वहीँ दुबई, ओमान, इंग्लैंड, अमेरिका में गरबे के ९ रोज़ तक रोड पर गरबा होता है। एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन और रोड पर गरबा होता तब किसी को कोई तकलीफ नहीं होती।
बॉम्बे लोकल में भजन मण्डली ज़ोर ज़ोर से ठोल मंजीरे बजाते हैं ज़हरीले गाने गाते हैं उस डब्बे में उनके मज़हब और मुवाफ़ेक़त अवाम के अलावा कोई दूसरा चढ़ नहीं सकता वोह क्या है। कोविद वबा के बाद यह सिलसिला थोड़ा कम हुआ है लेकिन अभी भी लोकल में भजन कीर्तन चालू है। नमाज़ पड़ता हुआ नमाज़ी किसी हिन्दू को ऐसा तकलीफ नहीं दे रहा है।
यह हिंदुओं की वही शिद्दतपसन्द और दहशतगर्दाना ज़ेहनियत है जहां अवामी नुमाइंदगी एक्ट के तहत मुंतख़िब हुई अमरावती की एक रकून पार्लिअमान नवनीत राणा ने कार्यवाही के दौरान एवांन में एक मुअज़्ज़ज़ मुस्लिम रकून ए पार्लिअमान असदुद्दीन को धमकी दी थी। "बोलना पड़ेगा, हिंदुस्तान में रहना होगा, जे.एस.आर. बोलना होगा"। अगर हिंदुओं में भारतीय मुसलमानों के लिए ज़हर का पैमाना इस क़दर ऊंचा है तो बेरुन मुल्क तालिब ए इल्म इन दहशतगर्दों के सामने कुछ भी नहीं हैं। इस तरह के हिंदू इन्तेहापसन्द सियासत के दहशतगर्दों की रीढ़ की हड्डी हैं, और उन्हें इन सियासतदानों से हिमायत मिल रही है। अब सिर्फ़ बेरुन मुल्क मुमालिक ही भारतीय दहशत को इज्तेमाई सज़ा दे सकते हैं। भारत को किसी भी तरह की बेन अक़वामी पालिसी बनाने, तिजारत, और सियासत के मौक़ों से नज़र अंदाज़ करना, किनारे करना और अलहदा करना। तभी यह ज़ाफ़रानी वायरस ख़त्म होगा, ऐसा न होने पर यह आलमी बरादरी को और ज़्यादा परेशानी देगा।
भारत में बढ़ते हुए इस अक्सरीयती हिन्दू दहशत और अक़लितों पर होने वाले हमलो पर अब तो अमेरका के सीनेट में भी बातें होने लगी हैं।
नाज़रीन जिस हिसाब से आज के नए भारत में हर दस्तूरी इदारों को ग़ुलाम बना कर क़ानून को ताख में रख कर एक तरफ़ा राजा की जानिब से फ़ैसले लिए जा रहें हैं वोह भारत की सालमियत के लिए ख़तरा है। फ़िर जिस हिसाब से अक़लियतों ख़ास मुस्लिम, क्रिस्टी अवाम को हरासा किया जाता है वही सूरत ए हाल अब सिखों के साथ हो रही है। जिस नमाज़ से हिन्दू अक्सरियत को तकलीफ होती है तरावीह की नमाज़ पर बवाल काटते हैं। उस ही तरावीह की नमाज़ को न्यू योर्क टाइम्स स्क्सेयर रोड पर मुसलमानों को अदा करते हुई वीडियो वायरल है। अमेरिका में ना किसी पुलिस ने लात मारी ना किसी को आने जाने मे तकलीफ़ हुई ना किसी का मज़हब ख़तरे मे पड़ा। ज़ेहन मे गोबर भरा हो तो ज़हर छोटी सी बात पर पैदा होगा। अमेरिका क्रिस्चियन अक्सरियत मुल्क है जहाँ मुस्लिम आबादी महज़ १.५% से २% के क़रीब होगी लेकिन मज़हबी आज़ादी देखो। वहीँ भारत में मुस्लिम आबादी २०% है भारत को अंग्रेज़ों से आज़ाद करवाने मे बड़ा योगदान रहा लेकिन यहाँ की हालत देखो।
नाज़रीन जिस हिसाब से भारत मे मुस्लमान क्रिस्टी सिख मारे जा रहे हैं बेरुन मुल्क इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया में भारतीय काटे जा रहें हैं मारे जा रहें हैं फांसी पर लटकाये जा रहें हैं उसका हिसाब बेरुन मुल्क भारतियों को देना पड़ रहा है। बोस्टन अमेरिका में फ़िर से एक हिंदी तालिब ए इल्म की लाश मिली है। जिस भारतीय की मौत हुई है, उसका नाम अभिजीत पारुचुरू (२०) है. मूल रूप से आंध्र प्रदेश का रहने वाला था। उसके के वाल्दैन अमेरिका में ही रहतें हैं। उससे एक शेर जो हिन्दू शिद्दत पसंदों में बोहोत मशहूर है याद आ गया।
इंग्लैंड अमेरिका तो झांकी है, इजराइल अभी बाक़ी है
सहाफ़ी ज़ुबेर
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