अज़ीज़ नाज़रीन,
कुछ हज़रात असदुद्दीन की निस्बत से फेसबुक पर अपने नज़रियात बाँट रहें हैं, की एवान में ओवैसी ने
पाकिस्तान की जेल में बंद हिंदी अवाम कुलभूषण जाधव की हिमायत करते हुए कहा था कि पाकिस्तान
अगर वाकई में अपने आप को इस्लामिक मुल्क कहता है तो पाकिस्तान को बताना पड़ेगा कि इस्लाम
में रहम किसको बोलते हैं.’ जिस तरह जंग-ए-बदर में अल्लाह के रसूल ने उन तमाम कैदियों
को माफ किया, अगर पाकिस्तान इस्लामिक मुल्क है तो पाकिस्तान को मिसाल पेश करनी पड़ेगी. बताओ
क्या पाकिस्तान तुम्हारे पास रसूल की तरह रहम है. क्या तुम वाकई में जानते हो कि इस्लाम
में माफी किसको कहते हैं. अगर तुम अपने आपको इस्लामी मुल्क बोलते हो तो तुम्हारी जेलों
में जो हिंदुस्तानी बैठे हैं, उन्हें रिहा करो और दुनिया के सामने पैगाम दो कि इस्लाम में माफी किसको कहते हैं.
ओवैसी पाकिस्तान की सरजमी से पाकिस्तान को बुरा भला कह कर आए थे. उन्होंने कहा
कि था आप अपने देश के मुसलमानों की चिंता करो,
भारतीय मुसलमान अपने देश में बहुत खुश हैं.
सहाफी जुबेर का मसले पर उनकी ज़हानत और इल्म की रौशनी में जवाब
नाज़रीन दो बातें हैं,
१. या तो ऐसी झूटी और फरेबी बातें लिखने वाला संघी है और वोह असदुद्दीन के बढ़ते हुए रुतबे से ख़ौफ़ज़दा हो कर झूट फैला रहा है।
२. दूसरी बात जो पाकिस्तान में जा कर मुस्लिम हिन्दुस्तान में बोहोत खुश है बोलने का मामला है वोह २०१३ का है हाल ही में दहशतगर्दों के क़ब्ज़े के बाद सब को साफ साफ़ दिखने लगा है की अकलियतों ख़ास मुस्लिम अवाम के साथ क्या हो रहा है।
जहाँ तक दरिंदे, जल्लाद, क़ातिल, दहशतगर्द, ज़ालिम कुलभूषन जादव के मामले का सावल है असद भाई खुद आगे आ कर जवाब दें की क्या उन्होंने उस दरिंदे को छोड़ने और माफ़ करने की हिमायत की थी। अगर हाँ तो उनकी हर बात का जवाब यह सहाफी अपनी अक़्ल और इल्म की रौशनी में देना चाहेगा।
एक दम बकवास है असद साहब की इज़्ज़त करता हूँ लेकिन झूट को फरोग नहीं दूंगा, चाहे वोह मेरी ही तंज़ीम के सदर क्यों ना हो। इस ज़िम्न में ३ चीज़ें कहना चाहूंगा।
१ली. अगर असद साहब ने इस्लामिक रियासत की बात की है तो उनको पता होना चाहिए जहाँ तक इस्लामिक रियासत की बात है उसके खिलाफ जंग करना, मुस्लिम अवाम को क़तल करना, इस्लामिक रियासत को तोड़ने की साजिश करने वाले की सजा मौत है गर्दन क़लम करना। सबसे बड़ी बात उसका जुर्म साबित हो चूका है, इस्लामिक रियासत को ईज़ा पहुँचाना और तोड़ने की साजिश में शामिल था। वोह दरिंदा दहशतगर्दाना हमलों में भी शामिल था और मुसलमान बन कर क़ौम में इन्तेशार और निफ़ाक़ डाल रहा था जो इस्लामिक शरीयत के हिसाब से गुनाहे अज़ीम है। और ऐसे दरिंदे की एक ही सज़ा है, गर्दन क़लम करना।
२. दूसरी बात उन्होंने रसूले अरबी की मिसाल दी, तो वोह अल्लाह के रसूल थे रेहमतुल लीलआलमीन हम उनके मानने वाले हैं, अगर हमारे अंदर उनके जैसे नबी के औसाफ़ आ गए तो हम में और उनमे फ़र्क़ क्या रहेगा, उनको अल्लाह की जानिब से ख़ास क़िस्म की रूहानियत हासिल थी, हम उनके दर्जे को कैसे पहुंच सकतें हैं। जब सहाबा नबी तक नहीं पहुंच सके, हम तो बोहोत अदना हैं, नबी हफ़्तों महीनो रात दिन रोज़ा रखते थे नबी की शाना बा शाना सहाबा ने भी वोह अमल किया कमज़ोरी आ गई नक़ाहत आ गई नमाज़ में गिरने लगे, तो नबी ने फ़रमाया में तो अपने रब के यहाँ से रिज़्क़ पाता हूँ इसलिए मुझे रात दिन के हालते रोज़े में कोई नक़ाहत कोई तकलीफ नहीं होती, लेकिन तुम इंसान हो बशर हो मत रखो मेरी तरह रोज़े।
३री. बात जंगे बदर फतह होने के बाद क़ैदियों के ऊपर हुसने सुलूक किया गया था, दौरान जंग नहीं, अभी जंग कहाँ ख़तम हुई अभी तो जंग चालू है तो कुलभूषण जैसे दरिंदे, दहशतगर्द ज़ालिम को छोड़ने की बात करना मतलब इस्लाम को ईज़ा पहुँचाना है। इस्लामिक रियासत को जिसने तोड़ने की साजिश रची, मुस्लिम अवाम में बदगुमानी पैदा की अपना मुस्लिम नाम रख कर उनको राहे रास से भटकाया और ऐसे दरिंदे कसाई ज़ालिम जल्लाद की ज़िन्दगी की भीक मांग रहे हो वोह भी जज़बाती बातें कर के इस्लाम और मुसलमानों की आड़ ले कर। फिर तुम में और काफिरों संघी, बीजेपी वालों में फ़र्क़ क्या रहा वोह हिन्दू मज़हब को आगे करते हैं तुम इस्लाम को। माफ़ करने वाले मुद्दे पर मौलाना वहीउद्दीन को पहले ही धो चूका हूँ, और उसमे जिहाद की ५ सिफ़त बयान की गई है उसमे आखिर वाली वही है जंग ख़तम होने के बाद क़ैदियों के साथ हुसने सुलूक किया जाए अब उनको मज़ीद तकलीफ देना इस्लामिक क़ानून के खिलाफ है।
माफ़ करना बोहोत अच्छी बात है और यह सहाफी भी माफ़ी के हक़ में है और नबी अल्लाह की हदीसों सुन्नतों पर अमल करने की कोशिश करता है. लेकिन जहाँ तक कुलभूषण की माफ़ी का सवाल है तो उसने किसी अकेले मुस्लिम फर्द का नुकसान नहीं किया बल्कि मजमूई इस्लाम और मुसलमानों का नुकसान किया है. अगर उसने किसी अकेले मुस्लिम बाप के बेटे को क़तल कर दिया होता तो अब उस बाप पर मुनस्सर होता की वोह उसको माफ़ करे या क़िसास ले. लेकिन यहाँ तो मामला एक दम अलग है उसने रियासत को नुकसान पहुंचाया है और मजमूई मुस्लिम क़िताल किया है तो माफ़ी कैसी।
असद साहब उम्मीद है आप हक़ और बातिल के दरमियान हक़ के दामन को थामे रखेंगे और इस मुद्दे पर मज़ीद वज़ाहत करेगें। अगर वोह अलफ़ाज़ आपके थे तो आपको जवाब दिया गया अगर नहीं थे बात आई गई हुई।
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