Saturday, 27 February 2021

नई तरह की सियासत का आगाज़ हो रहा है।

अज़ीज़ नाज़रीन

२०वी सदी बोहोत सी बातों के लिए तारिख में याद रखी जाएगी उनमे से एक होगी मुल्के हिन्द में मुस्लिम अवाम के ऊपर ज़ाफ़रानी दरिंदगी, ज़ुल्म जिसने अपनी तमाम तर हदें पार कर के मंगोलों की दरिंदगी को भी मात दे डाली है।   हक़ीक़त में देखा जाए तो हिन्द में इस दौर को ज़ाफ़रानी साजिश, क़त्ले आम, ज़िना बिल जब्र, जालसाज़ी, फरेब के लिए भी याद रखा जाएगा।  

नाज़रीन इसी सदी में कांग्रेस का ज़वाल और ज़ाफ़रानी तंज़ीम बीजेपी का ऊरूज और ज़वाल भी तारीख़ के सफों में शाहिद होंगे।  कांग्रेस के मुफ़लिस होने के बाद बीजेपी का किरदार मशकूक और मुफ़लिसाना होता चला गया और इस का फायदा दीगर तंज़ीमों ने खूब उठाया।  इस ज़िम्न में असद उद्दीन की मजलिस की मक़बूलियत ना सिर्फ मुस्लिम अवाम में बेशुमार बड़ी है बल्कि दलित, क्रिस्टी, सिख और सेक्युलर हिन्दू अवाम के दिलों दिमाग़ में भी असद उद्दीन और उनकी मजलिस दस्तक देने में कामयाब हुए हैं।  इस सहाफी को ज़र्रा बराबर शक और शुबाह नहीं की यह तंज़ीम मुस्तक़बिल में परचम, दस्तूर, इन्साफ और  एवान की आबरू बरक़ार रखने में कामयाब रहेगी।

बिहार असेंबली उसके बाद महाराष्ट्र और गुजरात बल्दिया में जिस कारगरदेगी का मुज़ाहेरा किया है उससे कांग्रेस के वोट बैंक को तो ज़बरदस्त झटका लगा ही बरक्स ज़ाफ़रानी तंज़ीम के लिए भी ख़तरे की घंटियां बजने लगी हैं।  भले हैं वज़ीरे आज़म अमहदाबाद, सूरत बल्दिया नतीजों पर मुत्मइन नज़र आ कर गुजरात के अवाम का शुक्रिया करें लेकिन इस बात को इस सहाफी ने महसूस किया है की अब गुजरात से ज़ाफ़रानी तंज़ीम के तम्बू उखड़ना शुरू हो गए हैं।  

इस सदी में जो एक बात और मन्ज़रे आम होगी वोह अददशुमार की निस्बत से होगी और अदद २, ३ और ५ की मक़बूलियत होगी। अदद २ का ज़िक्र उर्दू नज़्मों के ब्लॉग http://zuberpakshayri.blogspot.com/ में हर थोड़े वक़्फ़े के बाद कई नज़्मों में मिल जाएगा जिनकी शुरूवात अप्रैल २०१८ में की थी।  अदद ३ और ५ का ज़िक्र २०१४ के बाद से तक़रीबन ज़्यादातर मज़मूनों में मिलेगा।  

नाज़रीन इस सहाफी ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही सियासी तंज़ीमों के ज़वाल की बात कही है उसकी वजह साफ़ है क्योंकि जिस रस्ते को इख़्तेयार कर के कांग्रेस का ज़वाल हुआ उसी पर बीजेपी भी गामज़न है तो कैसे सरसब्ज़ होगी। 

आज कांग्रेस के ज़वाल और पस्ती की वजह ही दोगली हिकमते अमली है और हर वक़्त महज़ इन्तेख़ाब से क़ब्ल अवाम के ज़ेहनों में शक शुकूक भर देना और ख़ास मुस्लिम अवाम को ख़ौफ़ज़दा करते रहना अगर कांग्रेस को वोट नहीं दिया तो बेजीपी आ जाएगी।  अगर बीजेपी आई तो दंगे होंगे, अगर बीजेपी आई तो मुस्लिम क़त्ले आम होगा। वही तजुर्बा भारतीय जनखा पार्टी हिन्दू अवाम पर कर रही है अगर बीजेपी को वोट नहीं दिया तो भारत मुस्लिम राष्ट्र बन जाएगा, अगर बीजेपी को वोट नहीं दिया तो हिन्दू अक़लियत हो जायेगें।  अगर बीजेपी को वोट नहीं दिया तो हिन्दू बच्चियों को लव जिहाद में फसा कर उनका इसतेसाल किया जाएगा।  फिर इंतेखाब ख़तम होने के बाद तमाम वादे महज़ अपनी तंज़ीम और उनसे जुड़े हुए अफ़राद के लिए वक़्फ़ हो जातें हैं, जहाँ तक सवाल है आम हिन्दू का तो उसको कोल्हू के बैल के जैसे तेल निकालने के लिए रख लिया जाता है।  जैसे नोट बंदी, जीएसटी, आसाम में ऐन.आर.सी. रही सही कसर बा एक वक़्त तमाम हिन्द को क़ैद कर दिया, बिल आखिर अपने गुनाहों का कफ़्फ़ारा किसानों के साथ ज़ुल्म बर्बरियत कर के पूरा किया।  तमाम भारत में ताला बंदी के चलते गुजराती, मारवाड़ी, बनिया, सिंधी दिवालिये हो गए।  बड़े बड़े ताजिरों के घरों की मस्तूरातें सब्ज़ी भाजी और फल बेच कर अपना और अपने एहले ख़ाना का पेट रही थी।    अच्छा बच्चो मुझे बतलाओ की इन पांच मुद्दों से सबसे ज़्यादा नुकसान क्या किसी मियां का हुआ या खुद हिन्दू अवाम का हुआ।   जिस गुजरात में आज बीजेपी कमो बैश २० साल से क़ाबिज़ है उसी गुजरात में नोट बंदी के सबब गुजराती हिन्दू छोटे और मझोले ताजिर दिवालिये हो गए; नोट बंदी और ताला बंदी के चलते तमाम भारत में बोहोत से ताजिरों ने मुफलिसी और ग़ुरबत के सबब खुदकशी कर ली। 

कांग्रेस के पास एक भी ऐसा नुमाइंदा नहीं है जो बीजेपी के ग़ैर ज़रूरी दबाव का जवाब दे सके।   यही वजह है की बीजेपी को कांग्रेस से मुस्लिम नुमाइंदों की जीत पर उतना बवाल नहीं मचाना पड़ता है जितना की AIMIM के नुमाइंदों की जीत पर आग बबूला हो जाती है।   

बीजेपी को इल्म है की तंज़ीम के सरबराह को धमकी दे दो बाक़ी का काम हस्बे मंशा हो जाएगा और तमाम गुलाम क्या मुस्लिम क्या हिन्दू वही करेगें जो तंज़ीम का सरबराह कहेगा।  कोंग्रेसी गुलाम सोच की एक ताज़ा मिसाल अभी हाल ही में देखने को मिली।   राज्य सभा से एक ग़ुलाम कोंग्रेसी आज़ाद हुआ।   फिर उसने एवान में मुस्लिम मुखालिफ तक़रीर कर डाली।  यही फ़र्क़ है ग़ुलाम कोंग्रेसीयों में और AIMIM के नुमाइंदों में।  ग़ुलाम कोंग्रेसी कहता है आज तमाम आलम में मुस्लिम बदनाम हैं और हर मुस्लिम मुल्क में मुस्लिम एक दुसरे को ही मार काट रहें हैं।

यही ज़ुबान संघी दहशतगर्द बोलतें हैं और यही बीजेपी वाले फिर वही ज़ुबान अगर कोंग्रेसी बोलेगें तो उनमे और शिद्दत पसंद हिन्दुओं में फ़र्क़ क्या रहा।  उस ग़ुलाम कोंग्रेसी आज़ाद को में सहाफी जुबेर जवाब देना चाहूंगा।   पहली बात तो तमाम आलम में मुस्लिम मुल्कों में अगर आपस में झगडे हो रहें हैं तो उसके लिए यहूद और नसारा साजिशें ज़िम्मेदार हैं।  और उन मुमालिकों में मौजूद मुनाफ़िक़ ज़िम्मेदार हैं जो उन तमाम मुल्कों के पेट्रोल, सोना और अरबों खरबों की माश पर यह यहूद और नसारा का क़ब्ज़ा कर उनकी हुदूत में इज़ाफ़ा चाहतें हैं।   यह मुनाफ़िक़ मुसलमानों में ना इत्तेफ़ाक़ी पैदा कर के भाई को भाई से लाडवा रहें हैं और यह महज़ ज़ुबानी जमा खर्च नहीं है बल्कि इस सहाफी के पास ऐसे सबूत मौजूद हैं।   रहा सवाल पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान मुल्क कश्मीर में तो वहां पर भारत साजिश कर रहा है।  अपने दरअंदाज़ कश्मीर में भेज कर वहां के हालात को तबाह कर रहा है।   जब तक पाकिस्तान में इमरान खान की हुकूमत नहीं आई थी तो वहां मुनाफ़िक़ सलमान (कुल भूषन जादव) जैसे भरे पड़े थे जो क़ौम में इन्तेशार डाल कर मुसलमानों को आपस में लाडवा रहे थे, और पाकिस्तान को कमज़ोर कर उसको तोड़ने की साजिश में शामिल थे।   कुछ को तो फ़ासी पर टांग दिया कुछ का सर क़लम कर दिया और कुछ जेल में क़ैद कर दिए गए।  फिर जब जब अफ़ग़ानिस्तान में अमन मोहायेदा इमरान खान ने किये की उस प्रोसेस को वहां पर मौजूद भारत के वाज़ारतखाने ने डेरेल कर दिया।  ईरान ने जनवरी २१ में एक इसरायली जासूस को फ़ासी पर टाँगा जो मुस्लिम भेस में जासूसी इजराइल के लिए कर रहा था और ईरान में तबाही मचा रहा था।    नाज़रीन ख़िलाफ़ते उस्मानियाँ याद है, उस अज़ीम ख़िलाफ़त को तबाह बर्बाद एक मुनाफ़िक़ सोच ने किया था.  पाशा कमाल जो की दरअसल एक यहूदी जासूस था और मुस्लिम भेस बना कर मुस्लिम हमदर्द बन कर ख़लीफ़ा के खिलाफ बग़ावत कर डाली।  साजिश।  तुर्की को बर्बाद करने में मुनाफ़ेक़त शामिल है.   

आज कोंग्रेसी मुस्लिम भी वही बोली बोलतें हैं जो बीजेपी और संघ को अज़ीज़ होती है या जैसा की हाई कमान से हुकुम जारी हो जाता है वैसा ही बोलना पड़ता है अगर ज़रा सा हक़ बयानी की तो हो गए तंज़ीम में रूसवा।  लेकिन ऐसा असद के साथ नहीं है, तभी बीजेपी को ज़्यदा अंगार असद की बातों पर लगती है।  यही फ़र्क़ है ग़ुलाम कोंग्रेसी मुस्लिम सोच में और असदुद्दीन की सोच में।  उस ग़ुलाम कोंग्रेसी आज़ाद को हक़ बोलना था और राज्य सभा में कहना था की आज मुस्लिम अवाम और मुस्लिम मुमालिकों के साथ साजिशें हो रही हैं, उनको आपस में लाडवा कर ना इत्तेफ़ाक़ी को बढ़ा कर कमज़ोर किया जा रहा है।   हिन्द में मुस्लिम अवाम को बर्बाद तबाह करने के जेलों में ठूसने के क़ानून एवानों  में बनाये जा रहें हैं।  लेकिन उस क़ौम के गद्दार ने क़ौम को ही कोसना शुरू कर दिया।   यही वजह है की ऐसे लोग जुम्मन के नाम से मशहूर हुए।  

महज़ नाम मुस्लिम रख लेने से कुछ नहीं होता है अगर तुमको उस दर्द और तकलीफ का एहसास नहीं है जो दुसरे मुस्लिम को किसी शिद्दत पसंद काफिर, संघी दहशतगर्द, ख़ाकी दहशतगर्द (पुलिस), काफिर दहशतगर्द फाॅर्स (फौज), काफ़िर इन्तेज़ामियाँ (हुकूमत), काफ़िर रखैल कचेरी (सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट) से पहुँचती है।  नाम चाहे कुछ भी हो बल्कि वोह दर्द और तकलीफ का एहसास होना ज़रूरी होता है जो एक मुस्लिम के ज़ख़्मी होने पर दुसरे को पहुँचती है तब तो तुम असली मुस्लिम हो, नहीं तो भरे पड़े हैं बाज़ारों में मुनाफ़िक़ जो हक़ बात को महज़ तंज़ीम के हुकुम पर दबा डालतें हैं चबा डालतें हैं।  इन सब चीज़ों का एक ही हल है बदला, क़िसास। 

भारत में मुस्लिम मुखालिफ बात है,  नहीं मुझे तो ऐसा महसूस नहीं होता और ना ही मुझे कभी मुतस्सिब और फ़िरक़ावारना ज़ेहनियत का एहसास हुआ.  ऐसी ज़ेहनियत वही है जो मुस्लिम हो कर हुकूमत के नुमाइंदों के आगे सर झुका लेती है और ख़ौफ़ज़दा हो जाती है.   

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