Saturday, 6 February 2021

हक़ का साथ दो, इन्साफ की पैरवी करो हुकूमत की ग़ुलामी नहीं।

अज़ीज़ नाज़रीन,

मेरा यह मज़मून महज़ भारत के अमन पसंद अवाम और किसान भाइयों तक महदूत नहीं है बरक्स आलमी बरादरी से भी मुख़ातिब है।  नाज़रीन इसे हुकूमत की बदबख़्ती, बदनीयती या बदक़िस्मती कहेंगें या इस अदना से सहाफी की हक़ गोई को अवाम की हिमायत के जब जब हुकूमत की ना इंसाफ़ी बमुक़ाबिल इन्साफ की जंग होती है और यह सहाफी इन्साफ और मज़लूमों की जानिब खड़ा हो कर अवाम से दरयाफ्त करता है की में इस जंग में इन्साफ की जानिब हूँ आप किस जानिब हैं तो जवाब फ़ौरन वसूल होता है। 

इस ज़िम्न में किसानों के साथ हूकूमते हिन्द के हक़तल्फ़ी वाले सियाह क़ानूनों की खिलाफ़वर्ज़ी के साथ इस सहाफी ने एक मज़मून जमुहरियत में टकराव दलील है तानाशाही हुकुम। २७ जनवरी २०२१ को शाया किया था।  जिसमे मज़मून के आख़िर में सवाल पूछा गया था में तो किसानों के साथ हूँ क्या आप हैं।   इस सहाफी के सवाल का जवाब १ फ़रवरी यानी महज़ ३ दिनों के बाद ही मिलना शुरू हो गया था।  जब भारत की तमाम मुख़ालेफ़ीन तंज़ीमे एक सूर से बोल उठी की हम किसानों के साथ हैं, अवामी शख़्सियत यहाँ तक की बेरुन मुल्क अमेरिका, पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड ने भी किसानों की हिमायत की है और हूकूमते हिन्द पर लानत।  आज की तारिख में किसान मुद्दा हूकूमते हिन्द के गले की हड्डी बन गया है।   

भारत की अवामी शख़्सियतों की अगर बात करें तो किसी ने भी किसानों की मुख़ालेफ़त कर के हुकूमत का साथ नहीं दिया है.  अगर किसी ने साथ दिया है तो महज़ वह मुठ्ठी भर ज़ईफ़ अवामी शख़्सियत होंगी।   जिनको बॉलिवुड और क्रिकेट में अब अपनी शिनाख़्त क़ायम रखने के लिए देसी प्रोन एक्ट्रेस, कॉल गर्ल और ड्रग अडिक्ट जैसी किसी ख़ातून के सहारे ज़िंदा रहने पर मजबूर होना पड़ता है, चाहे वोह देवांगन हो या कनाडा से भगाया गया और दरअंदाज़  बॉलीवुड का ग़द्दार हो।   जो इंसानी लाशों पर तंत्र मन्त्र करने वाले एक तांत्रिक का साथ देता है और बॉलिवुड इंडस्ट्री मुंबई की ज़ारिया ऐ माश एक तांत्रिक के बहकावे में आ कर उत्तर प्रदेश ले जाने की ना सिर्फ हिमायत करता है बल्कि माशी इमदाद भी करता है।  अब ऐसे ग़द्दार जो अपनी खुद की रोज़ी के साथ इन्साफ ना कर सकें जो अपने वतन को छोड़ कर भारत में दरअंदाज़ी करें उनसे और क्या तवक़्क़ो हो सकती है की वोह दूसरों की भलाई के कामों को करेगें ऐसे लोग तो पहले ग़द्दारी करेगें।  

अब ऐसे ज़ईफ़ दिमाग़ी मुफ़लिस, अदना ताक़त वाले आज के दौर के नौजवान पीढ़ी को कैसे संभाल सकतें हैं उनमे इतनी क़ुव्वत और ताक़त ही नहीं बची है।  उनके लिए तो वही ज़ईफ़ और बूढ़ी वाली सोच सही रहती है ताके कोई भी उनको ज़न्खा तस्सव्वुर ना करे और ना ही यह इलज़ाम रखे की नौजवान नस्ल को मुतमईन नहीं कर पाए।  और तमाम काम आसानी से हो जाए। 

किसानों के मुद्दे पर जिस हिसाब से संघ की चड्डी धारियों और अक़ीदत मंदों ने अपने ज़हन में भरी हुई गंदगी निकाली है उससे उनकी औक़ात दिख गई की चाहे वोह कितने भी आला और नफीस कपडे पहन लें, चाहे वोह कितने भी बड़े घरों में रह लें लेकिन वोह सिर्फ बॉलिवुड तक ही महदूत हैं वहीँ किसानों की हिमायत अलामी बरादरी और हॉलिवुड ने की उससे ज़ाहिर होता है की किसान कितना भी सादा रहे मट्टी का सीना का चीरे लेकिन उनकी हिमायत हॉलिवुड वाले करतें हैं।   फिर हुकूमत की हिमायत करने वाले चाहे वोह प्रोन एक्ट्रेस, काल गर्ल हो या कनाडा से भगाया गया दरअंदाज़ इनकी औक़ात हॉलिवुड के अदना से अदना अवामी शख़्सियत के घर के बहार झाड़ू लगाने के बराबर है।  

नाज़रीन जब से इस सहाफी ने होश संभाला है ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है की मोदी मोदी मोदी के चक्कर में हर वोह इंसान फंस जा रहा है जो कभी आला किरदार का हामी होता था, और अपनी पोशीदा खाकी चड्डी का खूब मुज़ाहेरा कर रहा है।  सचिन तेंदुलकर जिसको ना सिर्फ भारत के अवाम क्रिकेट का भगवन मानते हैं बल्कि आलमी सतह पर भी उनको खूब फ़ौक़ियात हासिल है, लेकिन किसानों के मुद्दे पर अपनी पोशीदा चड्डी उन्होंने भी दिखा दी।   अरे भाई इतना भी क्या ग़ुलामी करना, की हक़ का साथ देने के बजाये क़ातिल का साथ देना शुरू कर दो।   किसान किसी हुकूमत के लिए नहीं लड़ रहें हैं बल्कि अपने हक़ के लिए लड़ रहें हैं। 

नाज़रीन इस सहाफी का एक ही फलसफा है इस मुद्दे को किसान बनाम हुकूमत मत देखो और ना ही किसानों का साथ दो, बल्कि हक़ और ना हक़ के दरमियान जो हक़ है उसका साथ दो।   मज़लूम और ज़ालिम के दरमियान जिसके ऊपर ज़ुल्म हुआ उसका साथ दो, क़ातिल और मक़तूल के दरमियान जिसका क़त्ल हुआ उसका साथ दो ना की जिसके हाथ में शमशीर है जिसकी गुलाम अदलिया है जिसकी गुलाम हुकूमत है जो मासूम अवाम को खड़ा कर के एक ही सांस में सरों के अम्बार लगा रहा है उसका साथ देने के बजाये उन सरों का साथ दो जो बग़ैर किसी जुर्म के बग़ैर किस ग़लती के क़त्ल कर दिए गए।   नाज़रीन तारीख़ में हिटलर, मसूलिनी को कभी भी अच्छे नाम से नहीं याद किया जाता है बल्कि ज़ुल्म और क़त्लों गारत करने ना इंसाफ़ी करने के लिए याद किया जाता है।   उसी हिसाब से भारत की तारीख़ में अब जब भी मोदी मोदी मोदी जैसे चमचों को याद किया जाएगा तो मोदी के ज़ुल्म और ज़ालिम का साथ देने वाले बुज़दिल ऐसा बोल कर याद किया जाएगा। 

आज जो भी अवामी शख़्सियत किसानों के मुद्दे पर हुकूमत के हिमायती दिख रहें हैं उनसे एक ही गुज़ारिश है, अगर वोह सभी मर्द हैं तो उनकी ज़मीन जायदाद पर किसी ने क़ब्ज़ा कर लिया या उनके यहाँ खानदानी तनज़िया उठ जाता है तो वोह बड़ा दिल करें और अपना हक़ छोड़ कर ना हक़ का साथ दें और जिसने उनके साथ नाइंसाफी की है उस ही की हिमायत करें तब में जानूंगा की यह सब असली मर्द हैं।  

प्रोन एक्ट्रेस और काल गर्ल अवामी नचौड़ी आज बड़ी बड़ी बातें कर रही है किसानों के बजाये हुकूमत के साथ खड़ी है, अगर इतनी ही हक़ पसंद है तो काहे को बॉम्बे हाई कोर्ट में दावा दाखिल किया था।  छोड़ देना था अपना हक़। दूसरों के लिए नसीहत बड़ी बड़ी बातें और अपने हक़ के लिए लड़ाई, यह केसा पैमाना है।  भारत के जिस जिस आवामी शख़्सियत ने किसानों के ख़िलाफ़ हुकूमत की हिमायत में ट्वीट किये हैं जब तुम्हारे साथ ना इंसाफ़ी हो या कोई भी क़ानूनी पचड़े में पड़ो तो बजाये क़ानूनी लड़ाई करने के नाहक़ को ना इन्साफ को अपना हक़ दे देना और छोड़ देना अपना हक़।  जब अपनी बात आएगी तो हाई कोर्ट से मन मवाफ़िक़ हक़ नहीं मिला तो सुप्रीम कोर्ट तक जाओगे वहां से नहीं मिला तो ऊपर की बेंच में जावोगे।   अब देखना यही दिलचस्प होगा दूसरों के लिए तो सभी नसीहत करतें हैं लेकिन जब उनकी खुद की बारी आती है तब उनके कहे हुए अलफ़ाज़ का कितना पासो लिहाज़ रखतें हैं।   

में तो उन तमाम ज़ईफ़ और फ़रोख़्त किये हुए अवामी गुलामों को चूनौती देता हूँ, अगर हुकूमत, मोदी, बीजेपी या संघ का कोई भी नुमाइंदा इनके बंगलों, ज़मीन या किसी और आशियात पर क़ब्ज़ा करता है या कोई भी ना जाइज़ टेक्स लगाती है या ना इंसाफ़ी करते है जिसको के यह ज़ईफ़ समझतें हैं की इनके साथ नाइंसाफी हो रही है इनकी हक़तल्फ़ी हो रही है लेकिन हुकूमत समझती है की हम इनको इनाम दे रहें हैं तब भी यह लोग अपना हक़ हुकूमत के लिए छोड़ दें।   जब एक इंसान अपना हक़ नहीं छोड़ सकता तो यह तो तमाम किसान बरदारी है एक नहीं दो नहीं तीन नहीं लाखों करोड़ों किसानों की आवाज़ है।  

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