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Success of Shaheen and Gaznavi must be scared to the enemies.
अज़ीज़ नाज़रीन,
शिद्दत पसंद हिन्दू, संघी दहशत, भारतीय जनखा पार्टी की सियासत में उनके भगवान राम और सीता मय्या
के साथ साथ अगर पाकिस्तान, मुसलमान, इस्लाम,
ओवेसी, मुग़लों का नाम ना लिया जाए तो उनकी सियासी इबादत पूरी ही नहीं
होती है। इन शिद्दत पसंदों और बीजेपी वालों
की जब हर एक सियासी हिकमते अमली ना काम साबित हो जाती है और राम के पुर्षोत्तर और सीता
की पाकीज़गी की धज्जिया उड़ा कर भी इनको कोई नफा नहीं मिलता तो अपने असल भगवान पाकिस्तान,
मुसलमान, इस्लाम, ओवेसी और मुगलों के पास आ जातें हैं।
राम की सियासत के इस सफर में अगला नाम महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के सदर राज ठाकरे का जुड़ गया है। जनाब को जब चारों जानिब से अवाम की थुत्कार हाथ लगी ना मराठी अस्मिता काम आई और ना मराठी साइन बोर्ड में ख़त अल अलफ़ाज़ की सियासत, तब ऐसे डूबते हुए सूरज को एक ही आसरा था वोह था राम का आसरा। अब इस राज नामी अक़ीदत मंद को मुस्लिम, पाकिस्तान, ओवेसी और इस्लाम नाम के भगवान पहले ही नकार चुके हैं। मतलब इन भगवानों का नाम ले कर इन हज़रत को वोट नहीं मिलते बरक्स चोट मिलती है। यह भगवान तो बीजेपी, संघ, शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम के लिए मेहफ़ूज़ और वक़्फ़ हैं। जब कभी भी इनकी कश्ती डूबने लगी की किसी भी एक भगवान के नाम का विर्द करना शुरू कर दिया और अवाम का ज़हन तब्दील कर के वोट ले लिए। इंतेखाब ख़तम भगवान का विर्द ख़तम।
नाज़रीन यह कैसे राम के अक़ीदत मंद हैं जो राम के नाम पर राम मंदिर के नाम पर जालसाज़ी कर के करोड़ों रूपये डकार जा रहें हैं। जब से राम मंदिर पर आला अदालत का फैसला आया है हर शिद्दत पसंद हिन्दू राम मंदिर के नाम पर अपना पेट और झोला जालसाज़ी, फरेब कर के भरने में लगा है। अभी तक ऐसे दर्जनों बजरंगदल, संघ के शिद्दतपसन्द-दहशतगर्द और बीजेपी के बड़े बड़े ताजिर, सियससतदाँ पकडे गए हैं जो की राम मंदिर के नाम पर पर्चियां बटवा कर करोड़ों रूपये की जालसाज़ी कर रहे थे और वोह पैसा अपने ज़ाती मफ़ात और इख़राजात के लिए इस्तेमाल कर रहें थे। यह तो वोह मामलें हैं जो पुलिस और इन्तेज़ामियाँ के इल्म में आ गए, कई ऐसे पोशीदा भगवा काने दज्जाल ताजिर लेडीज़ सलवार सूट और नाड़े वाले बाबा होंगे जो की राम मंदिर के नाम पर करोड़ों रूपये हज़म कर चुके होंगे।
इस कड़ी में जनाब राज साहब ठाकरे राम के नाम का विर्द कर रहें हैं, अब देखना यही होगा जिस राज ठाकरे को मराठी मानूस भूल गए, और मराठी अस्मिता की बात भी उनको इक़्तेदार में नहीं रख सकी तो क्या सियासी राम उनकी हिफाज़त कर सकेगें। वोह भी ऐसे वक़्त जब अक़ीदत मंद महज़ इंतेखाब को नज़र में रख कर भगवान की पनाह में पहुंचने की बात करता है। भगवान भी आज कल एक दम पेशावर हो चुके हैं, जो उनको याद करता है उसको ही वोह देतें हैं। वोह भी सोचतें होंगे जो सालों बरसों में कभी मेरी चौखट पर नहीं आया आज एक दम से मेरा ख़याल कैसे आया फिर ऐसे अक़ीदत मंद को भगवान भी अपनी मंदिर के बहार उतने ही वक़्त इंतज़ार करवायेगें जितना वक़्त उसने उनके मंदिर की याद करने में लिया है।
जी हाँ नाज़रीन महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के सदर जनाब राज ठाकरे ने मार्च के महीने में बाबरपुर (अजोध्या) जाने का एलान किया है। अब मसला वही है क्या राज ठाकरे अपनी अक़ीदत और मज़हबी रिवायात को पूरा करने के लिए बाबरपुर में राम लल्ला के दीदार करने जा रहें हैं या अपना सियासी उल्लू दुरुस्त करने जा रहें हैं। क्योंकि अगर अक़ीदत और मज़हबी काम करने जा रहें हैं तो पोशीदा इबादत करना चाहिए था जिसमे सिवाए उनके और भगवान के दरमियान तीसरा कोई भी शख्स मौजूद ना हो। अपना हाल सुनाना था अपनी कैफियत और इश्क़ भगवान पर ज़ाहिर करना था और लोट आना था। लेकिन यह क्या यहाँ तो राज ठाकरे बाबरपुर में राम लल्ला के दीदार करने जा रहें हैं ऐसे इश्तेहारात और मज़मूनों की तंज़ीम नव निर्माण सेना की जानिब से आंधी आई हुई है।
फिर यह राज साहब अयोध्या कितनी बार गए, आज राम मंदिर का मसला १९९२ से लाइम लाइट में आया था। तब से ले कर और आला अदालत के फैसले तक कितनी मर्तबा यह हज़रत राज साहब बाबरपुर का दौरा करने गए। और अगर गए थे तो क्या हर बार इसी तरीक़े से उनकी तंज़ीम की जानिब से ऐसा ही धुँवा धार इश्तेहार किया जाता था। अगर नहीं तो इस बार क्यों?? मतलब साफ़ है यह मज़हबी दौरा नहीं है बल्कि सियासी है, फिर बात तो वही निकल कर सामने आती है जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपने एक मज़मून में किया है जिसका उन्वान है “यह सियासी राम है”।
राज ठाकरे का बाबरपुर का दौरा महज़ मज़हबी नहीं है बल्कि ख़ालिस सियासी दौरा है। क्योंकि जिस हिसाब से उनकी तंज़ीम बढ़ चढ़ कर दौरे को अवाम के रू बरू पेश कर रही है और हर अवामी हल्क़े में राज ठाकरे राम लल्ला के दीदार करने मार्च में बाबरपुर जाने वाले हैं ऐसा एलान करती फिर रही है, उससे यह दौरा महज़ मज़हबी नहीं है बल्कि इसके सियासी मक़सद को पूरा करने और हिंदुत्व की सियासत करना है।
दूसरी बात अगर यह दौरा मज़हबी होता तो राज ठाकरे की दहशतगर्द तंज़ीम विहिपी
से मिलने की कोई ठोस वजह समझ में नहीं आती है।
नाज़रीन ऐसा कहतें हैं सियासत एक ऐसी लौंडी है जिसको ना तजुर्बेकार अगर ज़बरदस्ती अपने हरम में रखने की कोशिश करेंगें तो वोह बरहना कर डालेगी। दूसरी चीज़ सियासत में वही इंसान नाकाम होता है जो अपने उसूलों के साथ ग़द्दारी करता है। अगर एक इंसान के लिए कोई चीज़ दुरुस्त है तो दुसरे के लिए वही चीज़ ग़लत कैसे हो सकती है। अवाम एक बार धोखा खा सकता है दो बार खा सकता है लेकिन बार बार नहीं और ऐसी ही ग़द्दार तंज़ीमे आज कल भारत में बरहना हो कर नंगी घूम रहीं हैं। जो गौहत्या, गौ तस्करी, लव जिहाद, वतन परस्ती, मस्तूरात, अकलियतों, किसानों के बारे में बड़ी बड़ी तक़रीरें करते थे लेकिन हक़ीक़त में अपनी तिजोरी और ताजिरों के पेट भरने में लगे थे।
में देश नहीं मिटने दूंगा, में देश नहीं झुकने दूंगा
आज बेरुन मुल्क अवाम थू थू कर रहें हैं, हर ख़ासो आम को भारत में हो रहे मज़ालिम, इंसानी हुक़ूक़ की ख़िलाफ़वर्ज़ी, इन्साफ का क़त्ले आम, मज़हबी आज़ादी, किसानों और मस्तूरातों की बेहुरमती जैसे मुद्दों पर बोलने की हिम्मत मिल गई है। वह क्यों, क्योंकि हुकूमत नाहेल निकम्मी है.
बोहोत हुआ नारी पर वार अब की बार ………… सरकार
नाज़रीन खाली जगह आप खुद ही इन अलफ़ाज़ में से जो भी माक़ूल लगे भर दीजिये
जनखा (नामर्द, नपुंसक)
ग़द्दार
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