अज़ीज़
मरकज़ी वज़ारत रेलवे
वज़ीरे आला राजिस्थान
पाली मारवाड़ रेलवे स्टेशन इन्तेज़ामियाँ
हर साल की तरह इम साल भी ख़ाकसार को ग़रीब नवाज़ के दरबार में हाज़िर होने का शर्फ़ हासिल हुआ। पिछले दो सालों से यह सहाफी अपने मज़हबी वफंद के साथ हर साल के मार्ग से जाने के बजाये पाली मारवाड़ पे थोड़ा वक़्फ़ा गुज़ारने के बाद ख्वाजा की नगरी (अजमेर) की जानिब रवाना होता था। लेकिन कुछ ख़ास बातें जो इस सहाफी ने गुजिश्ता साल महसूस की थी उसमे इम साल ख़ासा इज़ाफ़ा होते हुए महसूस किया है। जिसके लिए रेलवे स्टेशन पाली मारवाड़ और पाली मारवाड़ शहर की इन्तेज़ामियाँ (कलेक्टर) ख़ास मुबारकबाद के हक़दार हैं।
१. रेलवे स्टेशन और उसकी कारवाँ सराय पर साफ़ सफाई, तहारतख़ाने, ग़ुसलख़ाने में पानी वग़ैरा का बेहतरीन एहतेमाम।
२. पाली मारवाड़ रेलवे स्टेशन और दीगर हल्क़ों में इस सहाफी का बावजूद टोपी और अरबी लिबास होने अवाम का खुले ज़हन और दिल से खैर मक़दम करना।
३. स्टेशन से नज़दीक मस्जिद जिससे जाते वक़्त क़ब्ल अज़ सुबह और लौटते वक़्त असर, मग़रिब और ईशा की नमाज़ तर्क होने का खदशा और मलाल ना हुआ।
इस सहाफी ने अपने ही अंदाज़ में शहर की अवाम से मस्जिद में क़ब्ल अज़ सुबह की बा आवाज़े बुलंद अज़ान से तकलीफ के बारे में दरयाफ्त किया। तमाम ताजिरों और होटल वालों का कहना था हमें इससे कोई तकलीफ ना होती है। बल्कि हम तो इस अज़ान की आवाज़ से जल्दी उठ जातें हैं और अपने होटल वग़ैरा में खाना पकाने और दीगर कामों में जल्दी जल्दी मशगूल हो जातें हैं।
इस सहाफी के अरबी लिबास और टोपी दाढ़ी को देख कर कोई भी यह गुमान ना कर सकता था की यह शख़्स एक सहाफी है और जो कुछ भी बातें हो रहीं हैं वह लायानी और महज़ लफ़्फ़ाज़ी ज़ुबानी जमा खर्च नहीं है बल्कि उसके ऊपर अपने मज़मूनों के ज़रिये हूकूमते हिन्द को आगाही देगा। जो अच्छी बातें हैं उनपर मुबारकबाद और जो ना ज़ेबा तास्सुरात हैं उन पर तनक़ीद के अक़्स नुमाया होंगें।
एक बात जो ख़ास महसूस की है उसको ग़रीब नवाज़ की करामत कहा जाएगा या इन्तेज़ामियाँ का कुछ अमल दख़ल समझने से क़ासिर हूँ। सुबह के क़रीब ३ बज कर ३० मिनिट पर जब गाडी पहुंची तो मौसम की दर्जे हरारत करीबन ११-१२ डिग्री सिन्टीग्रेट सर्द रही होगी। वफंद के एक अफ़राद को ग़ुस्ल की हाजत थी लेकिन पानी इतनी सर्दी में भी मोतदिल (गुनगुना) था, जबकी वोह ऊपर की टंकी से आ रहा था। ऐसे गुनगुने पानी से उनको ग़ुस्ल करने में किसी किस्म की दुशवारी नहीं आई। वहीँ मस्जिद के नलों का पानी खासा ठंडा था। जब मोतदिल (गुनगुना) पानी की वजह स्टेशन पर मौजूद आला एहलेकार से दरयाफ्त की तो उन्होंने बताया की हमारे यहाँ बोरिंग है और हम पानी ऊपर चढ़ा देतें हैं। लेकिन सवाल यही बड़ा है बोरिंग है भी तो रात भर टंकी में रहने के बाद पानी कैसे गुनगुना रहा और मस्जिद के नलों का पानी कैसे ठंडा हो गया। क्योंकि स्टेशन पर मौजूद ओहदेदार साफ़ सफाई पानी वग़ैरा का बेहतर एहतेमाम कर सकतें हैं लेकिन दर्जे हरारत ११-१२ डिग्री में उसको बग़ैर किसी इंसानी अमल के हीटर लगा कर या आग जला कर गर्म नहीं कर सकते। ख़ैर वजह चाहे कुछ भी हो हर कारे ख़ैर का सेहरा इन्तेज़ामियाँ के सर ही होता है। अब जो एहले तरीक़त होते हैं वोह बुज़ुर्गों की कश्फ़ और करामात को बाखूबी भांप लेते हैं।
पानी के गुनगुने या मोतदिल रहने में ज़्यादा इमकान ग़रीब नवाज़ की करामात के नज़र आतें
हैं, क्योंकि वोह नहीं चाहतें
होंगे की वफंद का एक आला अराकीन उनके शहर में ग़ुस्ल की हाजत में दाख़िल हो दूसरी वजह
उसकी नमाज़ तर्क हो।
कुल मिला कर इस सहाफी को पाली मारवाड़ रेलवे स्टेशन इन्तेज़ामियाँ और शहर की इन्तेज़ामियाँ को मुबारकबाद देने में ज़र्रा बराबर हिचकिचाहट नहीं है, जिसके वोह हक़दार हैं। सुबह का तमाम काम पुर सुकून और हस्बे मंशा मुकम्मल होने के सबब पाली मारवाड़ शहर और सूबे राजिस्थान के लिए दिल से दुआ निकली। दूसरी एक और बात जो राजिस्थान में महसूस की वोह किसी करामात से कम नहीं है. चारों जानिब रेगिस्थान है लेकिन फिर भी पानी की कहीं भी कोई कमी नहीं दिखी। नलों से पानी ऐसे बहता है जैसे दरिया का तेज़ बहाव. वहीँ जो इलाक़े साहिल पर हैं, ख़ास बम्बई वहां पर एक एक बूंद पानी के लिए अवाम को तरसना पड़ता है। जो इलाक़े दरिया के साहिल पर बसे हैं उन साहिली इलाक़ों पर ऊपर वाले की लानत कह सकतें हैं जो वहां पर पानी की क़िल्लत है लेकिन रेगिस्तान में ग़रीब नवाज़ का करम, की पानी ऐसे बहता है जैसे की दरिया।
अगर शहर का अवाम पुर सुकून है, हर चीज़ की फ़राग़त है तो उसका सेहरा पाक साफ़ और शफ़्फ़ाफ़ इन्तेज़ामियाँ के सर पर होता है. अगर चीज़ें दुरुस्त हो रहीं हैं तो उसकी शुरूवात कहीं तो किसी एक शख़्स ने की होगी जिसके अच्छे नताइज तमाम अवाम में दिख रहा है. जैसा की इस सहाफी का यक़ीन है और वोह उसपर अमल भी करता है अगर चीज़ों को दुरुस्त
करना है तो सबसे क़ब्ल अपने आपसे शुरूवात करनी होगी। अगर सच्ची और हक़ के रस्ते पर चलना है तो सबसे पहले
अपने आपको उस गंदगी, गलाज़त और कूदूरत से बहार निकालना होगा जो अपने दिलों में पेवस्त कर दी गई है। फिर अपने घर वालों को, मोहल्ला, क़स्बा बस्ती और समाज
धीरे धीरे चीज़ें दुरुस्त होंगी।
सच्चाई और हक़ के रस्ते पर चलते हुए बोहोत सी दुशवारियाँ, तकलीफ का सामना करना
पड़ता है, हर मौक़े पर हक़ और नाहक़
के दरमियान अपने नफ़्स से जंग करना होती है।
जो शख्स नफ़्स के जंजाल में फस गया और ग़लत फैसले कर लिए वही गुमराह है। और जिसने नफ़्स को शक्सित दे दी और इन्साफ का दामन
थामे रखा हक़ और ना हक़ के दरमियान जंग में हक़ का साथ दिया वही फलाह पाता है और कामयाब
है।
सीधा सा फलसफा है मंज़िल को वही फ़ौजी हासिल करतें हैं जिनका घोडा तंदुरस्त हो और उस पर सवार हो कर वोह तमाम रुकावटों, और बाधाओं को पार करते हैं। वहीँ एक शख़्स घोड़े को अपने कन्धों पर लाद कर भाग रहा है तो कैसे मंज़िल पर पहुंचेगा वोह तो वक़्ते मुक़र्र से पहले ही थक जाएगा, एक तो रुकावटों का सामना करना दूसरा कन्धों पर सवार सवारी, दो गुनी तकलीफ और मशक़्क़त, डबल इंजीन की तकलीफ कभी कामयाब नहीं होती है।
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