अज़ीज़ नाज़रीन,
किसी भी ज़ालिम, दरिंदे, दहशतगर्द, क़साई, जल्लाद का ज़ुल्म कमज़ोर पर तब तक ही रहता है जब तक उस ज़ालिम की तलवार को कोई इन्साफ पसंद, अमनपसंद उससे ज़्यादा ताक़तवर रोक नहीं देता है। और उस ज़ालिम की तलवार, नाइंसाफी, हक़तल्फ़ी, ज़ुल्म, दहशत, क़त्लो ग़ारत और उसकी हर नाज़ेबा हिकमते अमली का जवाब उसको बाखूबी उसके अपनों के खून से देना होता है। ऐसे ज़ालिम, दरिंदे तब तक ही कमज़ोर को दबाते हैं उन पर शिद्दत करतें हैं जब तक उनके रू बरू उनकी हर हिमाक़त का जवाब कोई उनसे ज़्यादा ताक़तवर आ कर देना शुरू नहीं कर देता है। अब ऐसे ज़ालिमों के सरों पर उनसे ज़्यादा ताक़तवाला मुसल्लद हो जाता है। आज का मजमून यह सहाफी का हूकूमते हिन्द में मौजूद साँपों, ज़ालिमों, गद्दारों, वतन फरोशों (वतन को बेचने वाले) बमुक़ाबिल इन्साफ पसंद, अमन पसंद, हक़बाजानिब शख़्स और उसकी तंज़ीम के दरमियान है। आज के मज़मून का आग़ाज़ यह सहाफी अपने कुछ मख़सूस शेरो शायरी से करना चाहेगा और उस पर फर्जांदाने तौहीद के ग़ुलामों से ख़ास तवज्जो की गुज़ारिश है।
झुकती है दुनिया,
झुकाने वाला चाहिए,
मिटेगी तेरी हस्ती, मिटाने वाला चाहिए।
सुर्ख़ कर दो ज़मीने बातिन
हर जानिब सब्ज़ा उगाने वाला चाहिए।
नाज़रीन जो कभी भी ज़ाफ़रानी तंज़ीम में नहीं हुआ वोह असदउद्दीन की मक़बूलियत उनके ख़ौफ़, उनकी फौजों की यलग़ार
और तंज़ीम के बढ़ते हुए क़दमों के सबब हो रहा है।
ज़ाफ़रानी जनखा पार्टी ने भरुच बल्दिया में ३१ मुस्लिम मेम्बरान को नुमाइंदगी
दी है। वहीँ दूसरी जानिब बिहार में उस बेकार
बेरोज़गार गली के नुक्कड़ (मीडिया इजलास) में झूटी सच्ची फरेबी बातें करने वाले मुस्लिम
को वज़ीर बना दिया। जो कहता था "ताज महल शाहजहां ने बनाया, लेकिन हाथ तो हमारे कटे
थे" इस शख़्स के इस झूट का पर्दा फाश इस सहाफी ने अक्टूबर २०१८ में तारिख के सफों में सबूतों
के साथ ही कर दिया था। आलमगीर औरंगज़ेब जिन्होंने
तमाम हिन्द पर हुकूमत की या शाहजहाँ फिर दोनों बादशाहों की हुकूमत का वक़त दे कर मसले
का दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया था।
ख़ैर यह तो शुरूवात है असद उद्दीन और अकबरुद्दीन जिस तरह से बग़ैर किसी बातिल ताक़त
से ख़ौफ़ ज़दा होने के और बग़ैर किसी लालच के जंग की क़यादत कर रहें हैं तो वोह दिन दूर
नहीं जब इस साहाफी की एक और पेशनगोई हक़ साबित होगी के इन ज़ाफ़रानियों का तारीख़ में महज़
नाम रह जाएगा। जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपनी
उर्दू नज़म माशाल्लाह में किया है।
ماشااللہ
तमाम ऐसे ज़ालिम अनासिर, नाइंसाफ, हक़तल्फ़ी करने वाले, वतन, परचम और आईन की आबरुरेज़ी करने वाले, उसकी अस्मत मट्टी में मिलाने वाले, ग़द्दार नेस्त नाबूत हो जायेगें फ़ना हो जायेगे ख़तम और ज़मीनदोज़ हो जायेगें। मौजूदा दौर का हिटलर और ज़ालिम तरीन हाकिम को अवाम उस ही बेदर्दी और बेक़दरी से मुख़ातिब करेगें जिसका वोह हक़दार है। और पस यह जान लो सख़्त तरीन तबाही, बर्बादी, तूफ़ान, अमवात तुम्हारा मुक्क़द्दर है। अल्लाह ज़ालिमों को पसंद नहीं करता।
नाज़रीन दुबूर फरोश अमित शाह और शैतानी इल्मी वेलू बिल्जी हैदरबाद में बड़ी बड़ी बातें कर के आये थे। दुबूर फरोश बोलता था इस बार मेयर हमारा होगा, पिछवाड़े पर ऐसा ज़ूता छपा की ना ही मेयर और ना ही नायब मेयर की कुर्सी हाथ लगी। अब किस्मत में महज़ ऐवान में हर मुद्दे पर हू हल्ला करने के अलावा कुछ नहीं रहा। जिसके लिए यह ज़ालिम मशहूर हैं। या तो जो नया काम बिहार की सियासत के बाद मिला है, वोह करेंगें मेयर और डिपुटी मेयर के आने से पेश्तर और उनके जाने के बाद दरी चादरे उठाना और कुर्सी लगाना।
नाज़रीन आपको हैदराबाद असेम्ब्ली इंतेख़ाब मालूम हैं, क्या बोल रहा था वेलू बिल्जी मित्रों में आपको विश्वास दिलाता हूँ अगर भारतीय जनखा पार्टी की हैदरबाद में हुकूमत बनी तो ओबेसी बंधुओं को ऐसे ही भागने पर मजबूर होना पड़ेगा जैसा की निज़ाम भागे थे। उसके बाद वोह खुद ही नेपाल भाग गया था, और पाक मजलिस की फोजों से कुछ २०-२५ दिन तक छुपा रहा बाद फिर से नमूदार हुआ और बल्दिया इंतेखाब में फिर आ कर गली के आवारा जानवर की तरह भोंकने लगा। मित्रों में आपको यक़ीन दिलाता हूँ अगर हम हुकूमत में आये तो हैदराबाद का नाम बदल कर भाग्य नगर कर देंगें। फिर पड़ा ज़ूता पहले बड़े भाई ने पेला (धोया) और अब छोटे ने। मतलब असेम्ली इंतेखाब में असद सामने आ गए और वेलू बिल्जी के तमाम फौजी ढेर कर दिए और बल्दिया में अकबर से सामना हुआ और क़िला तो निज़ाम के पास ही रहा जिस क़िले पर वतन से गद्दारी, हक़तलफ़ी, नाइंसाफी, ज़ुल्म, दहशत, क़त्ल, ज़िना का शैतानी ज़ाफ़रानी परचम लहराने की बात करता था वेलु बिल्जी।
नाज़रीन ओवेसी ब्रादरान से अंगार तो उसी बात की है, की उनको ना तो यह ग़द्दार रूपये पैसे, मौत के ख़ौफ़ से, हुकूमत के ज़ेरे इंतज़ाम ग़ुलाम तंज़ीमों से तहक़ीक़ात करने और जेल में भेजने का ख़ौफ़ दिखा कर तोड़ पातें हैं और ना ही शाकिस्त दे पातें हैं। जैसा की कांग्रेस और दिगर मुख़ालिफ़ (Opposition) तंज़ीमों के सरबराहों को अपना ख़ौफ़ दिखा कर हक़ और ना हक़ की जंग में अपने साथ कर लेते हैं। फिर दस्तूर का क़त्ले आम हो या इन्साफ को फ़ासी सभी तंज़ीमें खामोश रहने में ही अपनी भलाई समझती हैं। अगर मुँह खोला तो उनका क़त्ल हो जाएगा। लेकिन यह बात पाक मजलिस के सरबराह ना तो असद में है और ना ही उनके नायब अकबर या किसी और तंज़ीम के नुमाइंदे में देखने में आती है। ख़्वाह वोह मुस्लिम हों या गैर मुस्लिम एक बार तंज़ीम के ज़ेरे सरपरस्ती में आ गए की हो गए निडर बेबाक। और यह अलफ़ाज़, ताक़त और क़ुव्वत उनको किसी पोशीदा रूहानी फैज़ से मिल रही होती है। जो दिखाई तो नहीं देता लेकिन हौसला, हिम्मत और क़ुव्वत खूब देता है।
फिर तीन ज़र्ब जो इन ज़ाफ़रानी गधों, गद्दारों, वतन फरोशों, ज़ालिम, ना इन्साफ, हक़तलफ़ों को असद, अकबर और पाक तंज़ीम के फौजियों ने दिए हैं वोह ता उम्र याद रहेंगें और उसकी तपिश, जलन, अंगार गाहे बगाहे इनकी ज़ुबान से बयान हो ही जाएगी।
१. १५ मिनिट वाला ज़र्ब
२. असेंबली इंतेख़ाब में मित्रों ……. ओबेसी बंधुओं को भी निज़ाम की तरह भागना पडेगा।
३. हैदराबाद बल्दिया में हमारा मेयर होगा।
नाज़रीन यह काम इतना आसान नहीं है,
बरक्स कोई तो रूहानी ताक़त ओवेसी भाइयों पर मेहरबान है। जिसकी वजह से वोह हर महाज़ पर ग़द्दारे वतनों, हक़तल्फ़ों, नाइंसाफों, ज़ालिमों, दरिंदों, दहशतगर्दों से जीत हासिल
कर रहें हैं। अब वोह ताक़त चाहे किसी वली की
अता करदा हो या ख़ुदा की जानिब से अता की हुई इनायत। जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपनी उर्दू नज़म जुस्तजू
में किया है।
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अवामी जिस्म फरोश (रंडी), हिंदुस्तानी प्रोन (देसी माल), लोगों को मुफ्त लुत्फ़ अन्दोज़ करने वाली (free entertainment) वज़ीरे दरिंदा को सीख देती है की अपने वालिद दहशतगर्द, ज़ालिम, दरिंदे पृथ्वी राज की तरह गलती ना करें जिसने मोहतरम मोहम्मद ग़ोरी से हार का सामना किया था। नाज़रीन इस सहाफी को ऐसी रंडियों और लँगूरनियों की बातों और ट्वीट्स पर हँसी आती है। इंसान बोहोत कुछ जाल बिछाता है और बोहोत कुछ ततबीर करता है लेकिन असली ततबीर वही कामयाब होती है जो मेरा रब बनाता है। लाख कोशिश कर लो लेकिन होगा वही जो होना है और जो मेरे रब ने ते कर लिया है। मोहम्मद ग़ोरी पर गरीब नवाज़ मेहरबान थे सो ज़ालिम दरिंदे, कसाई, दहशतगर्द पृथ्वी राज चौहान को शाकिस्त हुई और अब और कोई वली उनके साथ होगा तो मौजूदा हिटलर, ज़ालिम, दरिंदे, क़साई, गौ मांस का कारोबारी को हर जानिब शाकिस्त हो रही है।
वोह वली यहाँ भी होगा, वहां भी, वहां भी होगा और वहां भी। जो तुम्हारे दरमियान हाज़िर और मौजूद भी होगा। और पस यह जान लो वही हक़ है।
जिन ५ बुज़ुर्गों से कल मुख़ातिब हुआ था उनको एक पैग़ाम है, आज बोहोत बेहतर महसूस कर रहा हूँ.
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