Tuesday, 31 March 2020

मिशन (ऑपरेशन) करोना हुआ फेल.


अज़ीज़ नाज़रीन,

जिस बात का शुबा और शक था वही हुई, इस सहाफी को हमखास यक़ीन था की लाक डाउन फेल होगा और करोना के मरीज़ों की तादात बे शुमार बढ़ेगी.  फिर बाद में हुकूमत अपनी नाहेली, गफलत और लापरवाही पर अवाम को ही ज़िम्मेदार ठहराएगी.  वही हुआ.  हुकूमत ने बढ़ते हुए मरीज़ों की तादात को महदूत ना रख पाने के पीछे अवाम को ही ज़िम्मेदार बता दिया. 

कोरोना के मरीजों की तादात में लगातार हो रहे इजाफे के लिए हुकूमत ने अवाम को ही जिम्मेदार ठहराया है. वज़ारत सेहत के मुश्तर्का सेक्रेटरी लव अग्रवाल ने बरोज़ मंगल को एक सहाफती इजलास (प्रेस कॉन्फ्रेंस) करते हुए बताया कि कोरोना से जंग के लिए हम सबको साथ आना होगा. हमें साथ लड़ना होगा. उन्होंने साथ ही ये भी कहा कि लोगों का ताऊन नहीं मिलने से मामले बढ़ रहे हैं.

वज़ारत सेहत के के मुश्तर्का सेक्रेटरी लव अग्रवाल ने कहा कि कुछ हल्क़ों पर अवाम की हिमायत नहीं मिलने से ये केस बढ़ें हैं. कोरोना वायरस के खिलाफ जंग  में हम तभी कामयाब होंगे जब सबका साथ मिलेगा.  उन्होंने कहा कि अवाम लॉकडाउन की हिमायत करें तभी लड़ाई में कामयाबी मिलेगी.

नाज़रीन मोदी हुकूमत की आदत है की कुछ भी अगर ग़लत होता है तो उसका कफ़्फ़ारा वो अवाम से तलब करती है.  जबकी अगर कुछ भी अच्छा होता है चाहे वो अवाम के ताऊन से हो लेकिन उसका सेहरा अपने और अपनी हुकूमत के सर बाँध लेती है. २०१४ में जब मोदी हुकूमत मरकज़ पर काबिज़ हुई थी तब अवाम की तहे दिल से शुक्रगुज़ार हुई थी.  उसके बाद जितने भी इंतेखाब हुए उसमे किसी भी सूबे में या २०१९ में इंतेखाब का सेहरा मोदी हुकूमत, इन्तहा पसंद हिन्दू या बीजेपी के कारिंदों ने उस जीत का सेहरा मुल्क की अवाम की नज़र नहीं किया, बरक्स हर जीत पर बीजेपी तर्जुमान संबित पात्रा हो, मक्कार शाहनवाज़, मक्कार ज़फरुल इस्लाम, गौरव भाटिया हो या कोई मर्कज़ी वज़ीर हो हर कोई मुबाहसे में मोदी हुकूमत के सब का साथ और सबका विकास की वजह से अवाम ने हमको मौक़ा दिया है ऐसे ही अलफ़ाज़ से अपनी हुकूमत का बचाव करते हुए देखे जाते थे. 

अब में उन तमाम बीजेपी के मक्कार और फरेबी तर्जुमानों से पूछना चाहता हूँ जो हुकूमत की ग़फ़लत और गलती को बजाये तस्लीम करने के ये बोलते हुए हुकूमत का बचाव करते हुए देखे जाते थे मोदी हुकूमत सबका साथ सबका विकास पर अमल करती है तो इस ग़फ़लत में अवाम कैसे ज़िम्मेदार हो सकता है.  जिस तरह से ये सहाफी मोदी इंतेज़ामिया के ग़ुब्बारे की हवा २०१४ से हर उस मुद्दे पर ख़ारिज करता रहता है जिसमे की उसको इंतेज़ामिया की शदीद ग़फ़लत और नाहीली दिखती है.  इस मुद्दे पर भी मोदी इंतेज़ामिया शदीद ग़फ़लत कर बैठी उसी वजह से मिशन करोना या ऑपरेशन करोना फेल हुआ. 

नाज़रीन मोदी इंतेज़ामिया की सबसे बड़ी ग़फ़लत यह है की उसमे एक से बड़े एक जाहिल, कम अक़्ल भरे पड़े है जो अपने आपको ज़हीन और तालीमी अफ्ता बोलते नहीं थकते लेकिन ज़हानत ज़र्रा बराबर नहीं चाहे वो वज़ीर तालीम हो, या वज़ीर दाखला हो या वज़ीर  मालियात हों या कोई और आला ओहदेदार. 

दूसरी बात मोदी आज़ाद भारत में शायद पहले ही वज़ीरे आज़म होंगे जो एक जमुहरियाई सरबारह के बजाये हूकूमरान के जैसे काम करते हैं.  वो ना तो कभी अपने मुशीरों से किसी भी मुद्दे पर मुबाहेसा करतें हैं और ना ही किसी दानिशमंद की सलाह मानते हैं.  नोट बंदी से लेकर तो मिशन बालाकोट फ़ैल, NRC सभी मुद्दों पर शदीद गफलत देखी गई है.  

मिशन करोना फेल होने के पीछे भी मोदी की गलत हिकमते अमली ही ज़िम्मेदार है.  जब करोना का वायरस की शिद्दत और दहशत का पता चला था तभी मोदी इन्तेज़ामियाँ को इस बात का इल्म होना चाहिए था की अगर ये वाइरस भारत में आया तो इसके असरात किस क़दर अवाम पर नुमाया होंगे.  उसके लिए अवाम को कम से कम २० दिन पहले से अपने अपने घरों को जाने की हिदायत या हुकूमत की जानिब से ऐलान करवाना था.  लेकिन मरकज़ तो मध्य प्रदेश में एक इक़्तेदार वाली  हुकूमत को तबाह कर के ज़ाफ़रानी परचम लहराने में ज़्यादा तवज्जो और फ़ौक़ियत रखती थी. 

दूसरी बात मोदी हमेशा रात ८ बजे आ कर कुछ भी ऊल जलूल एलान कर देतें हैं की फौरी तोर से ये अमल किया जाए. अब तो उनको रात ८ बजे देख कर दिल में खदशा होता है और शदीद दर्द होने लगता है क्या पता क्या बेक़ूफ़ी वाला एलान कर दें.   

नोट बंदी करते वक़्त रात ८ बजे नमूदार हुए और मुँह फाड़ के चले आये आज रात ८ बाजे फौरी तोर से १००० और ५०० के नोट नहीं चलेंगे.  अब जो शख्स ट्रैन के सफर में है, बस में है दूर दराज़ के इलाक़े में है रात को ८ बजे के बाद कैसे अपने इख़राजात और सारमाये को पूरा किया होगा ये तो वही शख्स जानता होगा जिसने ये तकलीफ भोगी होगी.  वही हाल मिशन करोना की जंग पर जाने से पहले किया. २२ मार्च २०२० को एक दिन का अवामी कर्फ्यू और रात ८ बजे एलान १२ बजे से पूरी तरह से लोक डाउन.  अवाम को इतनी भी मोहलत नहीं दी के वोह अपने अपने घरों में कम से कम राशन तो भर लेते या बैंक से रुपए पैसे तो निकाल लेते. उसके ऊपर घर से दूध, सब्ज़ी लेने जाते हुए अवाम पर पुलिस की बर्बरियत.  किस बे रेहमी से अवाम को पीटा गया है.  पुलिस की मार से कई सो अफ़राद शदीद ज़ख़्मी हो गए.   फिर जो दिहाड़ी मज़दूर हैं जो रोज़ कमाते हैं और रोज़ खाते हैं उनके खाने पीने के लिए हुकूमत ने क्या इक़दाम किया.  या जो अपने घरों से हज़ारों किलोमीटर दूर है उनको घर पहुंचाने के किया इक़दाम किये थे.  इस मुद्दे पर इस सहाफी ने एक ट्वीट किया है.

Zuber Ahmed Khan shared a link.
अब यह दिहाड़ी ओर गरीब मज़दूर कहा जायेगे. सरकार ने 21 दिनों के लॉक डाउन की घोषणा की लेकिन यह निर्णय भी रात 8 बजे आकस्मिक लिया गया जेसा की नोट बंदी का लिया गया था. आज रात 8 बजे से 500 ओर 1000 के नोट बंद. उसी हिसाब तारीख 24 मार्च को अकासमिक 8 बजे मोदी जी प्रकट हूए ओर बोले आज रात 12 बजे से 21 दिनों का लॉक डाउन. लेकिन गरीबों के, दीहाड़ी मज़दूरों के भोजन का किया प्रबंद किया है. जो लोग अपने घरों से कई हज़ार क़िलों मेटर दूर शेहरों मे फस गये है उनको घर सुरक्षित पहुचाने की क्या व्यवस्था की है. रविवार जब एक दिन का जनता कर्फीव था तब बॉमबे के कुछ 10-12 मज़दूरों ने एक वीडिओ सांझा किया था ओर झारखण्ड सरकार से अपील की थी के हम फस गये है हमारे सेठ ने हमे पेसे नही दिये तमाम होटल बंद है हमे हामारे घर बूलाने की व्यवस्था कीजिये हम करोना नेगेटिव है हो सके तो हमारा टेस्ट करवा लीजिये. ऐसे मज़दूर कहा जायगे 21 दिनों तक क्या खायेगे. ऐसे लोगो की तो बाहर निकले तो मौत घर मे रहे तो भूक से मौत. उपर से खाकी आतंक ओर सख्त तरीन मार पीट, बंदूक दिखा कर हलाक करने की धमकी.

मोदी जी इस विपदा को युध का नाम दे रहे हैं. तो क्या उन्होने सेना को इस यूध से लड़ने के लिये हाइ अलर्ट पर रखा है. क्या भारत किसी भी परिस्तिथी से निपटने के लिये तय्यार है. अगर हा तो विस्तापितो को उनके घरों तक क्यों नही भेजा गया. आज मुम्बाई मे 70% जनता बाहर की है बेंगलोर, पूना, नासिक, दिल्ली, बड़ोदा, सूरत, हेदराबाद, कलकत्ता आल गरज़ हर बड़े शेहर मे गावों ओर भारत के दूर दराज़ के इलाक़ों से लोग मेहनत मज़दूरी करने आते हैं. फिर वो सभी लोग अगर निकले तो क्या उनको करोना नही होगा. ए तमाम बाते है जो शक पैदा कर रही है की जो करोना का हव्वा दिखाया जा रहा है वो बोहोत बड़ा चड़ा कर दिखाया जा रहा है उतना नही है.
इस मिशन के फेल होने के पीछे बीजेपी की वही गलत नियत और मुख़लिफ़ीनों को ईज़ा और शदीद जर्ब देने की जो गलीज़ सोच थी वह भी एक एहम वजह बनी.  जब बीजेपी के खुद के आला ओहदे दार वज़ीरे आला मर्कज़ के ऐलान की धज्जिया उड़ा सकतें हैं तो आम अवाम जो अपने एहले ख़ाना से कोसो दूर है वो तो पहले अपनी जान बचाके भागेगा और चाहेगा की अगर मौत आये तो उसके अपनों के बीच आये.

२३ तारीख से लॉक डाउन शुरू हुआ और उसी रोज़ सुबह उत्तर प्रदेश के वज़ीरे आला अपने पूरे लाव लश्कर के साथ राम मंदिर पहुंचे और राम की मूर्ती को नसब किया.  उत्तर प्रदेश के वज़ीरे आला बग़ैर किसी हिफ़ाज़ती मास्क के पंडितों से घिरे हुए देखे गए.  फिर उनका हिफ़ाज़ती अमला और परोकार तंज़ीम के रकून कुल मिला कर १०००-१२०० लोग होंगे.  दूसरी मिसाल इस लॉक डाउन को तोड़ने वालों में बीजेपी के ही दुसरे वज़ीरे आला शिव राज सिंह चौहान.  जिनकी हलफ बरदारी हज़ारों पैरोकारों और वज़ीरों के ज़ेरे सर्पारथी में हुई.  उसके बाद कमो बेश हज़ारों रकूनों,  पार्टी के मुहाफ़िज़ और हमदर्दों की मौजूदगी में फोटो शूट और गुल पोशी.

मोदी इन्तेज़ामियाँ का हगामी हालात में दिए गए हूकूम को फौरी तोर पर अमल में लाया जाए,  तो समझ में आता है.  लेकिन जिस चीज़ का इल्म दिसम्बर २०१९ से हो गया था और मोदी इंतेज़ामिया ने उस पर अमल २२ मार्च २०२० को ८ बजे फौरी तोर से लॉक डाउन की शक्ल में किया तो उसका ख़मयाज़ा आम अवाम इसमें ख़ास गरीब, दिहाड़ी मज़दूर शामिल हैं को तो उठाना ही पड़ा भूख, प्यास, सफर की शदीद तकलीफ, ज़ेहनी तकलीफ बरक्स मिशन के नाकाम होने में एक एहम किरदार अदा किया.    

मोदी सरकार को इस बात का इल्म होना चाहिए जितने अफ़राद करोना के वाइरस से नहीं हलाक हुए वो मोदी इंतेज़ामिया के फौरी लॉक डाउन करने के बाद से हलाक हो चुके हैं.  कम से कम २२ अफ़राद सफर और पैदल चलने के सबब हलाक हो चुके हैं.  इनमे एक मोरेना का रणवीर भी शामिल है जो पैदल ही निकल पड़ा और रस्ते में दिल का दौरा पड़ने से हलाक हुआ. फिर कुछ १२ अफ़राद एक ही रिक्शा में सवार हो गए रस्ते में रिक्शा गर्मी की शिद्दत और इंसानों का बोझ नहीं उठा सकी और टायर फटने के सबब एक अफ़राद हलाक हुआ और ६ घायल.  कम से कम ५० से ज़ाइद अफ़राद पुलिस की बर्बरियत से शदीद ज़ख़्मी हो गए.    

बिहार पटना में सब्ज़ी फ़राहम करने वाले सोनू नाम के ताजिर से पुलिस ने रिश्वात मांगी और ना देने पर उसको गोली मार के ज़ख़्मी कर दिया.  जबकि सब्ज़ी, दूध, दवा, सहाफत और ज़रूरी साज सामान के लिए ये लॉक डाऊन असर अन्दोज़ नहीं था. फिर क्यों सब्ज़ी फरोश को गोली मारी गई.

कुल मिला कर इस सहाफी को मोदी की काम करने का तरीक़ेकार हिकमते अमली बिल्कुल पसंद नहीं आई.  हगामी हालात में या जंग जैसे हालात में फौरी फैसले अमल में लाने के लिए की गई हिकमत तो समझ में आ सकती है लेकिन जब वक़्त की कोई क़ैद ना हो और ग़फ़लत, रकूने असेम्ली की खरीद फ़रोख़्त एक इक़्तेदार वाली हुकूमत को तबाह कर के अपनी हुकूमत क़ायम करना हो तो ऐसे हालात में अवाम कहाँ आपके साथ रहेगा उसको तो पहले अपनी और अपने अहले ख़ाना की जान की परवाह होगी. 

दूसरी बात मोदी के फैसले की धज्जिया खुद आपकी तंज़ीम के आला ओहदेदार वज़ीरे आला उड़ा रहे हैं तो अवाम तो अवाम ही है वो भी गरीब जिसके पास ना ही तालीम है और ना ही पैसा उसको किसी भी फैसले से कोई मतलब नहीं वो तो अपनी ज़िन्दगी में सिर्फ दो वक़्त की रोटी अपने लिए और अपने एहले ख़ाना के लिए देखता है.

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