Saturday, 28 March 2020

टाइटेनिक डूबेगा ज़रूर

अज़ीज़ नाज़रीन,

आप लोग इस सहाफी को लफ़्फ़ाज़ बोलो, डरा रहा है बोलो या अवाम को उकसा रहा है बोले लेकिन होगा वही जो होना हैइससे पेश्तर तीन चार हिंदी और अंग्रेजी के मज़मूनों में ये सहाफी हिन्दुस्तान को टाइटेनिक जहाज़ से शबी दे चूका है.  इससे पहले एक मज़मून में शेर से शुरूआत की थी.  "ज़ुल्म की टहनी सदा फलती नहीं, नाव कागज़ की कभी चलती नहींनाव मतलब जहाज़ वही टाइटेनिक.

नाज़रीन आपमें से किसी ने टाइटेनिक फिल्म नहीं देखी होगी तो देख लें.  वह फिल्म हक़ीक़ी कुदरती तबाही और आफत पर पर बनी फिल्म है.  आज के बेहद बड़े रक़बे वाले भारत की हालत भी उसी बेहद बड़े जहाज़ टाइटेनिक जैसी हो गई है.  जब वोह ग़र्क़ाब होने वाला था ऐसी ही अफरा तफरी मच गई थी.  उसके ऊपर जहाज़ के हुक्काम और हिफ़ाज़ती अमला कुछ भी कहने और बताने से क़ासिर था. बस हर किसी को ना मायूस सी तस्सल्ली.  सब कुछ ठीक है, हम जल्द ही रवाना होंगे.  बोहोत बढ़िया है कुछ भी परेशानी नहीं है.  वग़ैरा वग़ैरा. बिल्कुल वैसे ही हालात आज कल मुल्क में हो रहे हैं.  किसी ना मालूम परेशानी के ऊपर झूट और फरेब का कफन डाला जा रहा है.  कोई भी सरकारी हुक्काम सही और दुरुस्त बात बताने से क़ासिर है.  जिस तरह से जहाज़ डूबने लगा था सबसे पहले चूहे निकल कर भागे थे.  वही हाल आज टी.वी. पर बड़ी बड़ी बातें करने वाले और हुकूमत की गलती को बजाये तस्लीम करने के उसका बचाव करने वाले संघी, शिद्दत पसंदों का हो गया है.  जो हर मसले पर मुख़ालिफ़ों की सच्ची और हक़ की आवाज़ को घोंट देते थे.  हुकूमत की हर गलती पर अपना उल्टा ही फलसफा पेश करते थे सब ग़ायब हो गए और भाग खड़े हुए.

जहाज़ के बनाने वाले को इतना ग़ुरूर और तकब्बुर था की ये जहाज़ कभी डूब ही नहीं सकता. वैसा ही इस मोदी और उनके चमचो का है की भारत कभी बर्बाद हो ही नहीं सकता. टाइटेनिक का मालिक बोलता था हमने जहाज़ को ऐसे ऐसे साजो सामान से आरास्ता किया है की वो डूबने से पहले ही हज़ार बार सोचेगा ये जहाज़ पूरी तरह मेहफ़ूज़ है. वैसा ही दावा संघी, बीजेपी वाले और शिद्दत पसंद हिन्दू करते थे, भारत की फौज किसी भी हमले से निपटने के लिए पूरी तरह माहिर है. हमारे पास ऐसे ऐसे आला तरीन फौजी अमला है जो किसी भी जंग में फतह हासिल करने के लिए काफी हैं.

बिल आख़िर जान बचाने की तमाम हिकमत नाकाम साबित हुई और कुदरती क़ेहर के सामने एक अज़ीम ज़हाज़ और उसके तमाम क्रू मेंबर, जहाज़ पे सवार तमाम अवाम लाचार साबित हुए. जहाज़ डूबा और उसके साथ डूबे हज़ारों अवाम. सब अपनी मौत को अपने नज़दीक आते हुए देख सकते थे लेकिन क़ुदरत के सामने बे बस और लाचारबस अब जान बचाने की कोई भी सूरत और हिकमत नज़र नहीं आई तो हो गए अश्कबार और भीगी आँखों से अपने गुनाहों का एतेराफ कर लिए की हम ख़तावार हैं हमसे गुनाह हुआ हम तेरी आगोश में रहे हैं हमको माफ़ फार्मा.
जिस तरह का ज़ुल्म और ख़ौफ़नाक माहौल पुलिस वाले पैदा कर रहे हैं उससे उनके अंदर अनजाने खौफ और डर को साफ़ देखा जा सकता हैजिस तरह की बर्बरियत और दहशत मचाई जा रही है उससे उनके दिगामी मर्ज़ और सनक को भी ज़ाहिर कर दिया जो अवाम पर उतर रही हैअब ये सरकारी मुलाज़िम हुकूमत के गुलाम अपने अफसरों से तो सवाल नहीं कर सकते उनको तो जो हूकूम दे दिया उसको बजा लाना है
 
फिर तमाम गुस्सा अवाम पर उतर रहा हैये पुलिस वाले किस के खिलाफ जंग लड़ रहें हैं. अपने खुद के अवाम के साथ या बीमारी फैलाने वाले वायरस के साथफिर जो गरीब अपने घर एहले ख़ाना बच्चो माँ बाप से कोसों मील दूर है वो क्या ऐसे ही अकेले में मरना चाहेगा. "हरगिज़ नहीं", वो तो अपने घर जल्द से जल्द पहुंचना चाहेगाउसके ऊपर इन्तेज़ामियाँ ने तमाम ज़ाराये आमदो रफ़्त मुनतक़ा कर रखी हैऐसी सूरत में अगर कोई निजी टेक्सी, बस या ट्रक में जा रहा है तो उसको उतार कर बे ज़र्ब मारना पीटना ड्राइवर को घसीट कर ट्रक से उतारना और रोड पर लिटा कर बे ज़र्ब मारना जब तक की वो या तो हलाक ना हो जाए या अधमरा ना हो जाएफिर ऐसा करने का हूकूम किस ने दिया हैअवाम को मार पीट और उस हद तक की उसकी रूह परवाज़ हो जाएतो ये किस के ख़िलाफ़ जंग होगी. बिमारी के खिलाफ या अपने खुद के अवाम केस साथ.
 
फिर इस हालत का ज़िम्मेदार कौन हैकिस ने गुनाहे अज़ीम किये जो आज तमाम अवाम को एक अदना बे हद अदना कीड़े ऐसा कीड़ा जो खुली और पोशीदा आँखों से नज़र भी नाही आता है उससे ख़ौफ़ज़दा होना पड़ रहा हैउसके ख़ौफ़ और दहशत ने ना सिर्फ तमाम भारत बल्कि निस्फ़ दुनिया को जैसे जाम लगा दिया और अवाम को घरों में क़ैद होने पर मजबूर कर दिया.  

अब अमेरिका जैसा सुपर पावर ख़ुदा की वहदानियत पर यक़ीन कर रह हैऔर जो कभी नहीं हुआ वो अब हो रहा हैवाइट हाउस में क़ुरान की तिलावत से आगाज़ किया गयाजी हाँ ये वही क़ुरान है जिसकी अज़मत शिद्दत पसंद हिन्दू बे हद अदना दर्जे के कलेमात से कम करतें हैंजिसको आसमानी किताब तस्लीम नहीं करते
जिस ख़ुदा के होने पर इन फ़िरक़ापरस्तों को यक़ीन नहीं था उसके पैग़म्बर नबी सल्ललाहो अलयहे वस्सलम पर यक़ीन नहीं था उनकी अज़मत अब ये मंदिर के पुजारी कर रहें हैंमोदी जी का ख़ुदा के ऊपर यक़ीन तो ऊपर शाया किया जा चूका है
तो ख़ुलासा कलाम यही निकल कर आता है की इंसान कितना भी तरक़्क़ी आफ़ता हो जाए, साइंस कितनी भी महारत हासिल कर ले कितनी भी तजुर्बात कर ले लेकिन कुदरत के ना तो क़ानून को तब्दील कर सकती है, ना ही कुदरत के निज़ाम और ना ही क़ुदरत के ऊपर फतह हासिल कर सकती हैजो सूरज के निकलने और ग़ुरूब होने उसी तरह चाँद के निकलने और ग़ुरूब होने की सिमत है उसी से निकलेंगे और उसी में ग़ुरूब होंगेसाइंस कितनी भी तरक़्क़ी कर ले लेकिन चाँद और सूरत की निकलने और ग़ुरूब होने की सिम्त बदल नहीं सकतीलेकिन मेरा रब बदलेगारौज़ाए जज़ा से कुछ अर्से क़ब्ल सूरज जिस सिम्त में ग़ुरूब होता है उससे निकलेगा और जिधर से उगता है वहां पर ग़ुरूब होगाफिर मौत और ज़िन्दगी पर अभी तक साइंस ने फतह हासिल नहीं की हैमहज़ चाँद सितारों पर चले जाना फतह नहीं होती हैक़ुदरत की हिकमत तो बे इन्तहा बड़ी है.  कोई भी शख़्स उसकी हिकमत का ज़र्रा बारबार नहीं हासिल कर सकता, और ना ही जान सकता है.  

सितारों से आगे जहाँ और भी हैंअभी इश्क़ के इम्तेहान और भी हैं.

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