अज़ीज़
नाज़रीन, ब्रादराने मिल्लते इस्लामियां.
वैसे
तो ये सहाफी काफी मज़मून जिहाद की निस्बत से और हक़ीक़ी जिहाद क्या है उससे आप तमाम अवाम
को वाक़िफ़ कर चूका है और अब तक आप तमाम मुस्लिम, ग़ैर मुस्लिम अवाम को इस बात का बा ख़ूबी
इल्म हो चूका होगा जो ये सहाफी कर रहा है और जो चाहता है, उसमे इसकी अपनी कोई क़ुव्वत और ताक़त नहीं है. जो आज की
तारीख़ में मौजूद सबसे ज़ालिम और दरिंदा सिफ़त बादशाह से जंग की ना सिर्फ बात करे बल्कि
उसको अपने हतमी मरहले तक भी पहुचाये.
ये
क़ुव्वत और ताक़त उसको वलियों और बुज़ुरगाने दीनों के दर और आस्तानों से मिली है. उसने क़ुत्बाए रब्बानी महबूबे सुब्हानी (ग़ौसुल अज़ाम),
ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती (गरीब नवाज़) और निजामुद्दीन ओलिया (मेहबूले इलाही) से माँगा
और मिल गया. जो हज़रात नमाज़ की तरग़ीब करते हैं
और सीधा वाला फलसफा बताते हैं की सिर्फ रूहानी ज़ात अल्ल्हा की ही है और उसी से माँगना
चाहिए तो वो रास्ता भी और उस ज़ात का तार्रुफ़ भी इस ख़ाकसार को उस दर से हुआ जिससे वो
वाबस्ता है. यानी इस ख़ाकसार के पीरो तरीक़त
जल्लालुद्दीन अब्दुल मतीन रेहमतुल्लाह अलैहे और उस रूहानी दर जिससे ये ख़ाकसार वाबस्ता है फिरंगी
महल लखनऊ.
हालांकी
पीरो मुर्शिद सख़्त ख़िलाफ़ थे इन सब बातों के और कभी भी उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं फ़रमाई
जससे की जिहाद की तरग़ीब मिलती होगी. लेकिन
अपनी कैफियत में और वज्द में सही क्या है और ग़लत क्या है इसकी खूब तरग़ीब करते थे. जिसका असर इस ख़ाकसार की ज़िन्दगी पर पढ़ना शुरू हुआ. और धीरे धीरे वो उस ज़ात को तलाशने निकल पड़ा जसको
की कुछ लोग सीधा रास्ता वाला बताते हैं. यानी
कुछ भी मांगो तो सिर्फ अल्लाह की ही ज़ात से मांगों.
इससे
पेश्तर ४ मज़मून शाया किये जा चुके हैं. अल्लाह
के बारगोज़िदा बन्दे इस उन्वान से दो मज़मून और वाक़ियाये कर्बला के नाम से दो मज़मून. जिसमे सीधा अल्लाह से मांगने वालों की सिफ़त और एक
गलीज़ गुनाहों में डूबे हुए मुस्लिम की अल्लाह से मांगने पर क्या हालत होती है उसको बयान किया है.
अल
गरज़ बताने का मक़सद ये ही है की नमाज़ ही अगर हर मसले का हल होती तो इब्लीस ने दोनों
जहाँ में कोई सा ज़र्रा ऐसा नहीं है जहाँ अल्लाह के नाम पर सजदा नहीं किया होगा और
अल्लाह का हुकुम नहीं बजा लाया होगा. लेकिन
सिर्फ एक गुस्ताख़ी और महज़ एक सजदा ना करने के सबब राहे गांजा दरगाह हुआ और सुबह क़यामत
तक लानत का तोग गले में लटका दिया.
कहने
का मक़सद ये ही है अगर अल्लाह का हुकुम आदम को सजदा करने का था तो करो. वहां पर जिद्दत, मिंतक़ और फ़लसफ़ा मत लगाओ क्योंकि
दुनयावी लोग आज के हालात देख कर फैसला करतें हैं जबकी अल्लाह की हिकमत वहां से शुरू
होती है जहाँ बड़े बड़े अक़लमंदों की अक़ल और सोचने समझने की ताक़त ख़त्म हो जाती है. और अक़लमंदों, फ़ल्सफ़ेबाज़ों, दानिशमंदों के नज़दीक हर वो ना मुमकिन सा समझे जाने वाला अमल अल्लाह के नज़दीक मुमकिन हो जाता है. जब अल्लाह तबारको तआला कोई फैसला
कर लेता है तो अब उसको पूरा करने के लिए उसको किसी बशर, शजर या हजर की ज़रुरत नहीं होती
है बरक्स फ़िज़ाओं में हवाओं में अल्लाह का फैसला पूरा करने की कूव्वत और ताक़त फ़राहम कर देता है और यहाँ से अल्लाह का फैसला लेने की हिकमत शुरू हो जाती है. और
एक अदना सी चीटीं या मच्छर को वो कूव्वत फ़राहम की जाती है की वोह वक़्त के सबसे ज़ालिम
और दरिंदा सिफ़त बादशाह को धुल चटाने में कामयाब होती है.
ये
ही असली जिहाद है हर वो काम जो इंसानी नफ़्स को हक़ से ग़ाफ़िल करे तुम उसके खिलाफ जंग
करो. ख़्वाह वो जंग ज़ुबानी हो, क़लम से हो या
फिर अस्लेह से हो. जिहाद में ये ज़रूरी है की
जिहादी अपने नफ़्स के ऊपर काबू कर चूका हो और वो दुनयावी हर उमूर से आजिज़ हो तभी वो
अल्लाह के हूकूम को बजा लाता है.
आज
के लंगूर जिहाद के ऊपर फ़लसफ़ा समझाने की कोशिश कर रहें हैं जिनको अपने पाजामे का नेफा
नाही डालना आता है. जिनको ज़िना और उसके बाद
की गंदगी साफ़ करते नहीं आती है. जिनको तहारत
के उसूल नहीं मालूम हैं जिनको इस्तंजा ठीक से नहीं करते आता है. जिनको ज़िना के बाद की तबाही के बारे में इल्म ना
हो वो आज जिहाद के ऊपर बयान बाज़ी कर रहें हैं.
ऐसे लंगूरों से गुज़ारिश है रातों की तारीकी में किये हुए ज़िना पर पहले तब्सिरा
करें लियाक़त के साथ ज़िनाकारी पर पहले नादिम हों, फिर पाकीज़ा जिहाद पर तब्सिरा और फलसफे
बाज़ी करें. और उसकी पाकीज़गी और हिकमत पर बयान
बाज़ी करें. नहीं तो होगा वही जो होना है तुम
लंगूर और लँगूरनियाँ जो चाहते हो वही होगा लेकिन नतीजा वही निकलेगा जो में और मेरा
रब चाहता है.
हिन्दुस्तान
आज की तारीख़ में सख़्त गिरफ्त में है और मज़ीद तबाही आने वाली है जो पोशीदा है. और कैसी तबाही और कौन सी मुसीबत मुस्तक़बिल में आने
वाली है वो अब बयान नहीं की जायेगी. नहीं तो
कोई भी जुम्मन मियां ये बोल देगा की ये तो अवाम को उकसा रहा है. कोई भी सड़क छाप गाने
वाला ये बोल देगा की डरा रहा है इसकी आदत है.
उस
तबाही से ना सिर्फ शिद्दत पसंद, दहशतगर्द हिन्दू, बीजेपी वाले बचेंगे बरक्स हर वो जुम्मन
मियां मारा जाएगा जो बीजेपी का मुहाफ़िज़ होगा और अवाम के सामने गुमराही की बातें करता
होगा. इन जुम्मन मियांओं में ख़ास शाहनवाज़,
मुख्तार नक़वी, मोहसिन रज़ा, रिज़वी, ज़फरुल इस्लाम जैसे ख़ास नाम हैं जिनके ऊपर इताबे इलाही
आएगा. इसलिए नहीं के वोह हिंदुस्तान की बोली
बोलतें हैं बल्कि हक़ और बातिल की जंग में हक़ बोलने से गुरेज़ करतें हैं और बजाये नाइन्साफ,
क़ातिल, दरिंदों की गलती को तस्लीम करने के उनका बचाओ करतें हैं.
जो
लोग बोलतें हैं डरा रहा है ये तो इसकी आदत है, इस सहाफी ने ०३ फरवरी २० को एक मज़मून हिंदुत्व वादी शक के घेरे में मज़ीद होंगे
बदनाम. लिखा था उसके बाद आलमी बरादरी
में दिल्ली दंगों के बाद हिन्दू दहशतगर्द मज़ीद बदनाम और रूसवा और ज़लील हुए.
ऐसे
जुम्मन मियां तो पहले काटे और घरों से निकाल कर भगाये जायेगें जो हैं तो मुस्लिम लेकिन
उनका हर अमल मुनाफ़िक़ों वाला है. जो हर मुद्दे
पर मुसलमानों को कोसते हैं, मुस्लिम नस्लकुशी पर खुशियां बनातें हैं. किसी का घर बर्बाद होने पर उसकी अज़्वाजी ज़िन्दगी
टूटने पर खुशियां बनातें हैं और बोलते हैं मेरी बद्दुआ के सबब भुगत रहा है. जब उनके घरों पर हमला होगा तो इनकी कोई हिकमत जय
श्री..... का नारा लगाना, पूजा अर्चना करना, अपने आपको बीजेपी का हिंदु या हिंदुस्तानी मुवाफ़िक़
बताना काम ना आएगी. वहीँ जो दाढ़ी वाले हक़ पर
होंगे और सच्चे होंगे वो इन जैसे मुनाफ़िक़ों के सामने से निकल जायेगें और उनको ज़र्रा
बराबर हर्ज और तकलीफ ना होगी.
इन
जैसे ज़मीर फरोशों की वजह से इनके एहले ख़ाना या जो लोग इनसे मुसलीक होंगे और हक़ पर होंगे
लेकिन इन जैसे लोगों की मुनाफ़ेक़त और कुफ्रिया कलेमात, नबूवत का दावा करने जैसे अमल
को जानने के बाद भी इन से क़ता ताल्लुक़ नहीं कर सके उनको भी शदीद तकलीफ और अज़ीयत का सामना
करना पड़ेगा.
जो
मुस्लिम अवाम नीता अम्बानी के ट्वीट को सही और दुरुस्त ठहराते हैं और अमित शाह की मुसलमानों
को हिंदुस्तान से निकालने की हिकमत को सही क़रार देतें हैं, उनको इताबे इलाही से कोई
नहीं बचा सकता है. इस ज़िम्न में नीता अम्बानी
के ट्वीट्स पर पहले ही जवाब दे चूका हूँ.
बोहोत बडिया अब इस अंबानी की तबाही देखोगे आप लोग. इसकी बेगम ने जो ऊल जलूल बकवास की थी उसकी सज़ा मिलेगी. अरब देशो से कमाता है ओर मुस्लिम ओर इस्लाम से इतनी नफरत इतना ज़ेहेर. मेरे अभी 1 मार्च को ही एक आर्टिकल लिखा है उसमे मुकेश अंबानी की बेगम की अय्याशी ओर आवारा गार्दी की ट्वीट पेश किये है. इसका भाई तो पेहले ही दिवालिया हो गया है अब इस मुकेश की बारी है. अगले कुछ सालों मे आप देखोगे की रिलायंस का कोई नाम लेवा नही बचेगा उधोग जगत मे. अरब देशों मे आयिल रिफ़ाइनरी लगाओगे ओर मुसलमानों को तबह करने के लिये आतंकवादिओं को पेसा फराहम करोगे.
नीता अंबानी क्या बोलती थी की 1400 सो साल पेहले तो माइक होते नही थे तो इनका अल्लाहा सुनता केसे था, जो अब ए लोग माइक पर चीख पूकर कर के अल्लाहा को बूलाते है. दूसरा ट्वीट उसने किया था की आल्लहा ने बोला था मक्कार मुसलमानों को सूधारने के लिये एक पेगंबर भेजूगा लेकिन ए नही बताया वो ............ ही होगा. देख नीता ऐसे सूनता है अल्लाहा. मेने उसको 20 फरवरी 2020 को पाक सरज़मीन पाकिस्तान से पैगाम UN concerned on the condition of Muslims in India. भेजा था अरबी मे नही उर्दू मे भी नही बल्कि अग्रेज़ी मे देख कितनी जल्दी उसने सूना ओर तेरे शौहर, देवर को दिवालिया कर दिया. अब नीता अंबानी तेरे को मेरे हरम मे आने से कोई नही बचा सकता. अब मे तेरे को मेरे हरम मे एक बांदी या ग़ुलाम की हेसियत से रखूगा.
ख़ाकसार
के इस ट्वीट पर कुछ जुम्मन मियां मज़ाक़ बना रहे हैं हस रहें हैं. हरम में रखना, गुलाम बनाना मतलत उसके साथ कोई बदफैली
करना नहीं है और ना ही हक़ीक़ी वो मेरे साथ आ कर हम बिस्तर होगी, बरक्स उसको मालिके हक़ीक़ी
की ताक़त कूवत और बुजुर्गाने दीन की उस तब्लीग पर यक़ीन कामिल हो जाएगा जिसकी के वोह मुनकर
थी. आज ख़ाकसार पीराने पीर, गरीब नवाज़, महबूबे
इलाही और अपने पीरो मुर्शिद का ग़ुलाम है मतलब ख़ाकसार उनकी रूहानी क़ुव्वत और ताक़त पर यक़ीन
कामिल रखता है.
बडिया इधर अत्याचार किया उधर सज़ा मिली. दिल्ली मे 70 साला अकबरी बी याद है संघिओं या भूल गये. उनका तो दफन कफन हो गया था लेकिन तुम्हारी माता जी घंटों रोड पर पड़ी रही. ए ही है सज़ा. मेरी बाँधी ओर ग़ुलाम नीता अंबानी बोलती थी अल्लाहा ने कहा था की मक्कार मुसलमानों को सूधारने के लिये एक पेगंबर भेजूगा लेकिन वो ..... होगा ए नही बताया था. मक्कार, कट्टरपंथी, आतंकी हिन्दुओ को सूधारने के लिये सिर्फ एक ही असली जिहादी काफी है. जो आल्लहा ओर उसके रसूल के बताये हिसाब से जिहाद करता है. सोचो अगर तमाम 15 करोड़ मुसलमान असली जिहाद पर आ गये तो 100 करोड़ हिन्दुओं पर भारी होंगे.
Admin ·
बडिया मे दूआ गो हू की इस मनहूस मर्दूत हिन्दुस्तान मुर्दाबाद देश के एक एक संघी काफ़िर आतंकी, बीजेपी वाले ओर कट्टरपंथी काफिरों को करोना हो ओर सब मारे जाये. इन बीजेपी वालों ओर संघी मानसिकता मे वो जुम्मन मिया भी शामिल हैं जो एक टांग लेकर भागतें हैं. इन जुम्मन मियाओं मे नक़वी, शहनवाज़, मोहसिन, रिज़वी ओर बीजेपी का ज़फरुल इस्लाम नाम के आगे सय्याद लगा लेने से कोई नबी ज़ादा नहीं हो जाता और ना ही आले रसूल. वो तमाम लोग शामिल है जो हूकूमत की कमी को बताने या ना इंसाफी को तस्लीम करने के उसको डीफेंड करतें हैं. यही बात संघियों मे है.
आज
कल जुम्मन मियायों का एक शेवा बन गया है जिसको देखो अपने नाम के आगे सय्यद लगा लेता
है. अब जो भी बद फैली इनकी जानिब से होती है
वो सीधा आले रसूल पर उंगली उठाने के लिए संघी दहशतगर्दों के लिए एक सबब होती है. असल में ये लोग फरेबी, धोखे बाज़ और जालसाज़ होतें
हैं. और संघ के अजेंडे पर ही ये लोग अपने नाम
के आगे सय्यद लगाते हैं. सय्यद शाहनवाज़ हुसैन,
सय्यद मुख़्तार अब्बास नक़वी, सय्यद ज़फरुल इस्लाम, सय्यद मोहसिन रज़ा.
अब
नाम के आगे सय्यद लगा लेने से कोई आले रसूल नहीं हो जाता और ना ही उसकी बदफैलियों,
बदआमाल, बदकारिओं, ज़िना कारियों को देखते हुए
भी सिर्फ उसके नाम की अज़मत रखते हुए इन जैसे मुनाफ़िक़ों को कोई भी हक़ पसंद मुसलमान इज़्ज़त
और अज़मत फ़राहम करेगा. और रहा सवाल अल्लाह का
वो तो दिलों के अंदर पोशीदा गंदगी, गर्द, कीचड और पाकिज़िगी से भी वाक़िफ़ है. सही वक़्त पर इन जैसे तमाम मुनाफ़िक़ रूसवा और ज़लील
होंगे, और मारे जायेगे.
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