Wednesday, 27 November 2019

ना इंसाफ़ी तव्वलुद करती है अलगाव, और अलगाव तक़सीम.

राणा पाटिल को खुला ख़त,

अज़ीज़ राणा पाटिल, राणा जी ये तो आपकी बदबख़्ती, नाहीली थी की आपके पास पारस था और आप उसका फायदा नहीं उठा पाए.  बरक्स आप शर पसन्दों, फ़िर्क़ा पसंदों, हासिदों के बहकावे में आते रहे और पारस से फायदा उठाने से क़ासिर रहे. आपको इस बात का एहसास होना चाहिए की ये सहाफी हर उस इंसान के लिए खुशकिस्मत साबित हुआ है जिसने उसके साथ हुसने सुलूक किया है.

लेकिन आपने उन लोगों पे ज़्यादा तवज्जो दी और भरोसा किया जो आपके लिए आस्तीन का सांप थे और उनके बहकावे में आ कर इस सहाफी के ऊपर शिद्दत, जब्र और ज़ुल्म करना आपका आपकी एहलिया, वालिद और वालेदा का मक़सदे ऊला हो गया था.  अब सिलसिले वार उन तमाम लोगों को आपके सामने पेश करना चाहूँगा जिन्होंने इस सहाफी को अपने यहाँ काम पे रखा और फलाह पाई.  

आपके तैरना मेडिकल कॉलेज में इस खाकसार को ०२ जुलाई १९९७ में काम पे रखा गया था.  उस वक़त आपका मेडिकल कॉलेज एम.सी.आई. से रजिस्टर्ड नहीं था, ज्वाइन करने के बाद कुछ १९९८ में  रजिस्टर्ड हो गया.  उसके बाद आपकी कंपनी टेरा एलेक्ट्रोसोफ्ट में काम करने का शर्फ़ हासिल हुआ.  वहां पे जाते ही  आपकी कंपनी ने आई.एस.ओ. रुतबा पाया. हर्मीस इलेक्ट्रॉनिक्स और दीगर नामों से तीन नई कंपनी खोली गई.  कारोबार में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ जो कभी बे पनाह कमज़ोरी का शिकार हो रहा था.  २००४ में आपने अपने पास रॉयल स्टोन में अपना ज़ाती मददगार (PA) की हैसियत से इस ख़ाकसार को रखा.  २००४ में आप वज़ीर मुंतखिब किये गए और आपको ९ ओहदों और जिम्मेदारिओं से सरफ़रोज़ किया गया.

अगर आपने इस ख़ाकसार के साथ गद्दारी नहीं की होती तो आज आप वज़ीरे आला की कुर्सी पे फ़ाइज़ होते, जिसका ज़िक्र २००५ में आपकी वालेदा चन्द्रकला पाटिल से इस सहाफी ने बरोज़ जुमे को आपके एम.अल.सी. के नतीजे के वक़्त कोलाबा में बोला था. आपकी वालेदा बोहोत ही परेशान और फिक्रमंद थी की कहीं राणा हार ना जाए हमने कुछ १ बजे कहा था बाई साहब आप फ़िक्र ना करें दादा ना सिर्फ जीतेगें बल्कि हम उनको मुख्य मंत्री की कुर्सी पे बैठा हुआ देख रहे हैं.  ख़ैर हालात ऐसे हुए की मुख़ालिफ़ों के बहकावे में आ कर आपने गद्दारी करना शुरू कर दी आपके वालिद हमारे ऊपर आतंकी वारदातों में मुलव्विस होने का शक करने लगे.  आपके वालिद, वालेदा पूना जाते हुए अपने पुलिस एस्कॉट समगीर, शिवगण और हवलदार शिंदे को अपनी कार्बाइन बंदूकों के साथ हमारे घर पर भेजे.  मुंबई पुलिस के हद सिर्फ वाशी या बोहोत ही खींचा तो बेलापुर तक ही सिमित थी.  लेकिन आपके वालिद डॉ. पदमसिंह पाटिल अपने पुलिस एस्कॉर्ट टीम की जीप को कलम्बोली तक ले कर आये ताके वो हमारे घर में बंदूकों के साथ घुस सके.  मक़सद सोसाइटी और आस पड़ोस में हमारी बदनामी करवाना थी.   २००७ में बिल आखिर इतना परेशान किया गया की हमको काम से अलहदा होना पड़ा.  

उसके बाद हमने मार्च २०१० में हमारे भाई साहब को ज्वाइन किया और ज्वाइन करने के एक महीने में ही अप्रैल २०१० में उनका अपना खुद का ऑफिस हो गया.  और आज की तारिख में उनके अपने ३ ऑफिस हैं और हाई कोर्ट के नामी वकीलों में तस्सव्वुर किये जातें हैं, और सुप्रीम कोर्ट भी जातें हैं.

उसके बाद मुंब्रा में २०११-१२ में जिस हॉस्पिटल को हमने ज्वाइन किया;  ज्वाइन करने के ६ या ७ महीने के बाद ही वो हॉस्पिटल तीन मंज़िला बन गया और मरीज़ों की भरमार होना शुरू हो गई, २०१ ३ तक हमने यहाँ काम किया.  आज की तारिख में वो हॉस्पिटल मुंब्रा कोसा का एक बड़ा हॉस्पिटल तस्सव्वुर किया जाता है.

ये बात भी वाज़े है की जिस जिस ने आपके बहकावे में आ के कुछ भी गलती की उसका ख़मयाज़ा खुद उसने भोगा है.  आर आर पाटिल आपके बहकावे में आके खूब ऊँट पटांग फैसले करता था.  उसका क्या हाल हुआ, फिर विलास राव देशमुख उनका क्या हाल हुआ.  कांग्रेस बिल आखिर एन.सी.पी. जब तक आपका साथ देते थे और बजाये आपको बहार का रास्ता दिखाने के आपकी जी हुज़ूरी करते थे उनका क्या हाल हुआ था.  फिर वही गलती बीजेपी ने की है, जिसका ज़िक्र अपने ट्वीट में किया है.

Zuber Ahmed Khan

हा हा हा राणा पाटील पदमसिंह पाटील दोनों बाप बेटे ने अन सी पी से गद्दारी कर के भाजपा मे शामिल हूए लेकिन क्या राणा की किस्मत ऐसी पनोति वाली है की जिस ताली मे खाता है छैद उपर वाला मालीक़े हक़ीक़ी अपने आप कर डालता है. असल मे उसको एक बददुआ है. उस ना इंसाफी ओर ज़ुल्म की जो उसने ओर उसके बाप ने इस सहफी के साथ 5 साल तक किये थे. फिर 11 सालों की स्सेर्विस की वाट लगा दी थी तो उसकी वाट अब उपर वाला लगायेगा. महाराष्ट्र इंतेखाब से कुछ 1 महीना क़ब्ल मेने अपने लेख मे ही लिखा है. लेकिन होगा वही जो उपर वाला चाहेगा. राणा हो गया काना.

ख़ैर ये तो अपनी अपनी किस्मत है जो ख़्वाब वज़ीरे आला की कुर्सी पे फ़ाइज़ होने का हमने आपके लिए देखा था वो २०१८ में उद्धव ठाकरे को दे दिया.  क्योंकि जनवरी या फरवरी २०१८ में हमने उसने भी वादा कर लिया था.  जिसका ज़िक्र हम अपने पिछले मज़मून “राम की जीत हुई रावण की हार” में कर चुके हैं. ख़ैर अब पछतावे क्या होये जब चिड़िया चुग गई खैत.

आपके वज़ीरे आला बनने का ख़्वाब तो छोड़ो वज़ीर बनने के अरमानों पे पानी फिर गया, और महाराष्ट्र में दहशत मचाने का आपका खवाब चकनाचूर हो गया.  आपने जद्दो जेहद तो बोहोत की यहाँ तक की अपनी पहचान तंज़ीम सब कुछ दांव पे लगा दिया लेकिन आप अपनी बर्बादी को नहीं रोक पाए. 

फ़क़त
ज़ुबेर अहमद खान
सहाफी

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