Thursday, 14 November 2019

मुंसिफ ही मेरा क़ातिल निकला

अज़ीज़ नाज़रीन

हाल ही में हुए मुल्के हिन्द में सुप्रीम दहशतगर्दाना हमले, सुप्रीम जालसाज़ी, सुप्रीम डाकाज़नी, हिन्दू सुप्रीम नकबज़नी से आप तमाम हज़रात को वाक़फ़ियत हो चुकी होगी.  इस मोज़ू पे बोहोत से मज़मून इस सहाफी की जानिब से हिंदी और इंग्लिश में शाया किये जा चुके है.  

मुसलमानों के ऊपर इस तरीके की क़ानूनी दहशत से सिर्फ मुस्लिम अवाम के इन्साफ का क़त्ल नहीं हुआ बल्कि हर उस इंसान का क़त्ल हुआ है जो इन्साफ और सुप्रीम कोर्ट पे यक़ीन रखता था. इस सुप्रीम दहशतगर्दाना हमले में बड़ी तादात में सिर्फ मुस्लिम अवाम के इन्साफ के अक़ीदे, एतेमाद और यक़ीन की सुप्रीम हलाकत नहीं हुई बल्कि हर वो इंसान हलाक हुआ है जिन्हे हिन्द की अदलिया पे नाज़ था.  इस दहशतगर्द हमले में अदलिया पर, इन्साफ पर ना सिर्फ मुस्लिम अक़ीदा, एतेमाद और यक़ीन को ज़र्ब पहुंची और इज़ा नहीं हुई बल्कि बोहोत से हिन्दू, क्रिस्टी और सिख हज़रात के दिल को भी धक्का लगा और उनके भी अक़ीदे का क़त्ल हुआ.

इस हिसाब से ये ना सिर्फ मुसलमानों का क़ानूनी क़त्ल है बल्कि मजमूई इंसानियत का क़त्ल है क्योंकि ऐसी दहशत से इन्साफ का क़त्ल हुआ है और दहशतगर्द, मुजरिम और इन्साफ की मजमूई अस्मतदरी (सामूहिक बलात्कार) करने वाला कोई और नहीं बल्कि सुप्रीम दहशतर्द (सुप्रीम कोर्ट) है. 

इन्साफ के इस मजमूई क़त्लो ग़ारत और इस सुप्रीम दहशत पे ना सिर्फ क़ौम और मिल्लत के मुस्लिम बल्कि बोहोत से दुनयावी (सेक्युलर) एहले हुनुद सहाफी, दानिशमंद, तालीम साज़, वुक्ला हज़रात सख़्त परेशान, फ़िक्र मंद, और पशेमान हैं.  क्योंकि उसके साथ काम करने वाले उनके दोस्त एहबाब ख़ास मुस्लिम भले ही उनसे इस सुप्रीम दहशत पर कुछ गुफ्तगू ना करें लेकिन उनको पशेमानी अपनी ही क़ौम के सियासतदांओं से है की उन्होंने राम के नाम पे ऐसी अनहोनी कैसे कर डाली.   

ऐसे हालात में वो अब मुस्लिम दोस्तों से नज़रें मिलाने से कसीर हैं, शर्मिंदगी महसूस कर रहें हैं.  क्योंकि जिस अंदाज़ में मुस्लिम बादशाहों पे इलज़ाम तराशी की जाती थी की उन्होंने मंदिरों को तोड़ के मस्जिदें बनाई, तब जिस हालात में मुस्लिम होते थे आज उसी हालात में सेक्युलर हिन्दू अपने आप को देख रहें हैं.  क्योंकि मंदिर को तोड़ के मस्जिद बनाने के नज़रिये और फरेबी, झूठे फलसफे को सुप्रीम कोर्ट ने फांसी दे दी. मतलत मस्जिद को तोड़ के मंदिर बनाया जा रहा है अब उस ही हालात में हिन्दू सेक्युलर अपने आपको पाते हैं, जिस हालात और शर्मिंदगी का एहसास कभी मुस्लिम अवाम को होता था. 

ख़ैर जो होना था हो गया और इस दहशतगर्द हमले के बाद मेरी तकलीफ आगे आने वाले हालात से है.  फिल वक़त भलें ऐसी बातें हिन्दू शिद्दत पंसद और हिन्दू दहशतगर्दों की जानिब से कही जाय की अब आगे कुछ नहीं होगा और फ़िज़ाओं में मीठा रस घुलेगा.  भलें ही लंगूर और लँगूरनियाँ इस बात का अज़्म कर के सुप्रीम दहशत में हलाक होने वाले इन्साफ के मज़लूमों के ज़ख्मों पे मरहम लगाने की कोशिश करें की अब सुप्रीम दहशतगर्द ने तमाम आगे के मशकूक किस्सों को क़ैद कर दिया है और अब १९४७ के बाद से जो भी मंदिर मस्जिद जिस हालत में थे उसी हालात में रहेगें ये दिल को बहलाने के लिए ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है.  सिर्फ वक़्त की नज़ाकत और मसले की पेचीदगी को देखते हुए ऐसे बयान दिए जा रहे हैं. कहीं इश्तेआल अंगेज़ी भरे बयानात से भारत ज़ेरे नार ना हो जाए.  लेकिन जैसे ही कुछ अरसा गुज़रेगा और इस सुप्रीम दहशतगर्द हमले में इन्साफ की हलाकत की बात ठंडी हो जायेगी हिन्दू दहशतगर्द फिर सांप की तरह अपना फन उठाना शुरू करेगें.  क्योंकि इस सुप्रीम दहशतगर्द हमले में जाहबाक इन्साफ हुआ है ना की हिन्दू दहशतगर्द और बाबरी को शहीद करने वाले दहशतगर्द.  वो अभी तक हयात हैं.   जिसका ज़िक्र ये सहाफी इस दहशतगर्द हमले के बाद अपने ट्वीट में पहले ही कर चूका है.  

  Zuber Ahmed Khan

हा हा हा किस ने बंद किये सुप्रीम कोर्ट ने. हा हा हा भारत मे हिन्दू आतंक के अलावा कायेदा कानून बचा है. दूसरी बात कश्मीर मे तो सविधान था धज्जिया उड़ा दी. तीसरी बात बाबरी मस्जिद की जस की तस स्तिथी बनी रहे ओर सिर्फ पूजा अर्चना की इजाज़त दी थी क्या हूआ. बड़ी लकीर ओर छोटी लकीर ए सब लकीर के फ़कीर है.

जो लंगूर-लँगूरनियाँ इस सुप्रीम जालसाज़ी, डाकाज़नी, लूट मार और दहशत के बाद बोहोत मुतमइन दिख रहें हैं, आगे बाबरी मस्जिद जैसा काशी मथुरा मजिदों के ऊपर कुछ नहीं होगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने फूल स्टॉप लगा दिया.  में कहना चाहता हूँ इस ना इंसाफ़ी से मज़ीद ऐसे किस्से बढ़ेंगे.  क्या जब बाबरी मस्जिद शहीद की गई सुप्रीम कोर्ट की सख़्त हिदायत नहीं थी.  क्या हिन्दू दहशतगर्दों ने हलफनामा नहीं दिया था सुप्रीम कोर्ट में की हम मस्जिद की सूरते हाल जैसी है वैसी ही रखेंगे.  फिर क्या हुआ.  फिर कश्मीर का तो खुद अपना दस्तूर है उसमे दफा ३७० से मुत्तालिक क्या लिखा गया है और भारत के दस्तूर में क्या लिखा गया है और आज के क्या हालात हैं.  कश्मीर को कैसे ग़सब किया गया और भारतीय घुसपैठिये भेजे गए कश्मीर को ख़ून से सुर्ख करने और ग़सब करने के लिए फौजी एक्शन लिया गया.  तो क़ायदे क़ानून की बात दस्तूर और इन्साफ की बातें उस मुल्क़ में अच्छी लगती हैं जो बगैर रवादारी और बगैर किसी तफ़रीक़ के फैसले करता है.  रहा भारत का सवाल वो तो इतना बड़ा इन्साफ पसंद है की जुर्म, अस्मत ज़नी, क़त्ल और फांसी में भी मज़हब, क़ौम देख कर फैसला करता है.

९ नवंबर को मुसलमानों के इन्साफ पे सुप्रीम दहशतगर्द हमला हुआ और ११ नवंबर को उत्तर प्रदेश के एक हिन्दू दहशतगर्द ने बयान दिया की ताज नगर की विवादित इमारत तजो महल है और किसी देवी का मंदिर तोड़ के बनाई गई है.  अभी सिर्फ बयान बाज़ी है आगे चल कर उसको हक़ीक़त में तब्दील कर दिया जाएगा. 

जैसा की हुकूमत अमूमन किसी भी दहशगर्द हमले में अपनी ग़फ़लत और गलती के ऊपर मरहूमीन के नज़दीकी रिश्तेदारों को मुवावज़े की ख़ैरात का कफ़न डाल के अपनी फजीती से बचना चाहती है.  उसी हिसाब से इस ज़ाफ़रानी हुकूमत को अपनी ग़फ़लत और सुप्रीम ना इंसाफ़ी के दहशतगर्द हमलों में मुसलमानों के एतेमाद और इन्साफ की बड़ी तादात में हलाकत के ऊपर ५ एकड़ ज़मीन की भीख, खैरात का कफन डाला जा रहा है.  अब सवाल ये उठता है जब किसी भी दहशतगर्द हमले में हलाक हुए इंसान को कितनी भी बड़ी रक़म लोटा के वापिस नहीं ला सकती उसी हिसाब से इस सुप्रीम दहशतगर्द हमले जालसाज़ी डाकाज़नी में जो इन्साफ और मुसलमानों के एतेमाद का क़त्ल हुआ है वो कितनी भी बड़ी दौलत और मुवावज़ा लोटा नहीं सकता.  दूसरी बात कंपनसेशन दे रहे हो मतलत तुम इस बात को तस्लीम करते हो की तुम ने मुसलमाओं के एतेमाद का इज्तेमाई क़त्ल ख़ून ओ ग़ारत किया है.  और इस क़त्ल और ग़ारत में सब शामिल हैं सुप्रीम जालसाज़, अदलिया निज़ाम, हुकूमत और हिन्दू दहशतगर्द.  नहीं तो ज़मीन का अगर मालिकाना हक़ हिन्दू अवाम के पास होता तो किस बात का मुवावज़ा ज़मीन अपने हक़ीक़ी मालिक के पास पहुंच गई उसपे केसा मुवावज़ा.  और ये मुवावज़ा नहीं है बल्कि मुसलमानों को भीक, ख़ैरात दी जा रही है और ख़रीदा जा रहा है, ताके आगे बेरुन मुल्क मुस्लिम मुल्कों में इस मुद्दे पे आवाज़ ना उठाई जा सके.  इस मुद्दे पे इस सहाफी ने ट्वीट किया है.    
   
   Zuber Ahmed Khan
    9 November at 17:00 · 

अयोध्या फैसला न्याय की हत्या है. क्या सरकार पक्षकार थी उसको कैसे ज़मीन का अधिग्रहण दिया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट से सख़्त गफलत हुई. ये तो वही बात हुई दो पक्षों के खेत और ज़मीन का झगड़ा है और न्यायलय बजाये उसके टाइटल के ऊपर फैसला देने के एक गुंडे डॉन को ज़मीन का हक़ दे दे जो ज़मीन खरीदना चाहता था. सरकार तो कभी पक्षकार रही ही नहीं फिर मोदी जैसे हिटलर और आतंकी मानसिकता को कैसे ज़मीन दी जा सकती है. ऐसे फैसलों से ज़बरदस्त इन्तेशार फैलेगा.

ये फैसला ताबूत में आखिर कील साबित होगा. अब मुसलमानों को बटवारे की जानिब सख्ती से सोचना होगा. उनको वैसे भी इस मुल्क़ में क्या मिला है और क्या दिया है. ना नौकरी है ना तालीम है और ना ही रोज़गार.
जल्द ही मथुरा, काशी और धार की जामी मस्जिदों के ऊपर ऐसे ही हमले होंगे.  फील वक़त हिन्दू शिद्दत पसंद, दहशतगर्द और सयासत दान खामोश हैं क्योंकि गर्म गर्म मामला है तूल पकड़ा तो कुछ भी हो सकता है. हो सकता है मुस्लिम अवाम बटवारे की बात कर दें.  लेकिन जहाँ मामला ठंडा होगा फिर से दीगर मस्जिदें जो टारगेट में हैं उसके तहफ़्फ़ुज़ की धज्जिया उड़ने लगेगी.  इस दहशतगर्द हमले के बाद और इन्साफ की हलाकत हुए १ दिन भी नहीं हुआ था और वज़ीर दिफ़ा राजनाथ सिंह कहतें हैं कश्मीर, ट्रिपल तलाक़, कश्मीर पे ३७० पर किये हुए वादे पूरे किये अब यकसां कानून जल्द पास करेगें.  

इस तरह की कोई भी हिकमत शुरू हो उससे पहले मुस्लिम अवाम को बटवारे का बिगुल फूक देना चाहिए.  वैसे भी इस मुल्क में मुसलमानों को क्या मिला है और दिया है ना रोज़गार, ना तालीम और ना नौकरी.  रही सही कसर उनका जीने का हक़, इन्साफ का हक़ जैसे एहम हुक़ूक़ उनसे छीन लिए गए.

See in English


My faith on Justice assassinated.

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