मुल्के
हिंदुस्तान में अभी तक अवाम ख़ास मुसलमानों को सुप्रीम अदलिया के ऊपर बोहोत ग़ुरूर और
एतेमाद था की कुछ भी हो जाए सुप्रीम अदलिया हमारी हक़ तलफी हरगिज़ नहीं करेगी. लेकिन आज का बाबरी मस्जिद पे आया फैसला ना सिर्फ
चौकाने वाला है बल्कि सख़्त मुतास्सिब ज़ेहनियत के साथ दिया हुआ एक तरफा फैसला है. अदलिया के पास अवाम जाता है के उसको इन्साफ मिलेगा. और भारत में एक दफा नहीं बल्कि हज़ार बार ऐसा हुआ
है की अदलिया से मुलसमानों को मायूसी हाथ लगी है.
पहले
अल्लाहाबाद हाई कोर्ट ने मुसलमानों को लूटा और ज़मीन की तक़सीम तीन फ़रीक़ों में कर दी. और अब सुप्रीम अदलिया ने तो हाई कोर्ट से भी बड़ी दहशत मचा डाली. मुसलमानो को बोहोत एतेमाद था की हमको सुप्रीम अदलिया
से इन्साफ मिलेगा क्योंकि ये टाइटल सूट है और सुप्रीम कोर्ट सबूतों के ऊपर के फैसला
देगी. लेकिन ये क्या सुप्रीम कोर्ट तो गुंडों,
मवाली, दादागिरी और दहशतगर्दी में हाई कोर्ट की बाप निकली. उसने तो फ़रीक़ों की पहचान ही बदल डाली और एक तीसरे
फ़रीक़ मरकज़ को ज़मीन का मालिकाना हक़ सौंप डाला.
ये केसा फैसला है.
हिन्दू
अकसरियत से ख़ौफ़ज़दा और मोदी की दहशत से डर कर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है. और ये फैसला मुसलमानों के हुक़ूक़ पर कानून का दहशतगर्दाना
हमला है. इस तरीक़े के फैसलों ने हिन्दू दहशतगर्दों
के लिए नई राह खोल दी है वो अब किसी भी मस्जिद, ख़ानक़ाह, दरगाह पे इसी तरीक़े से रात
की तारीकी में हमला रेज़ होंगे और बाद में वो जगह हिन्दू अवाम को दे दी जायेगी. यहाँ तक की मुस्लिम आबादी वाले मोहल्लों और मुसलमानों
के घरों पे ये दहशतगर्द किसी भी उनके भगवान् की फोटो चस्पा करेगें और बोल देंगे की
देखो हमारे भगवान् इस घर से ज़ाहिर हुए और होगी उस मुसलमान की फ़ज़ीहत और फजीती.
अयोध्या
फैसला इन्साफ का क़त्ल है. क्या सरकार इस केस
में फ़रीक़ की हैसियत से शामिल थी. और अगर शामिल
थी तो कब शामिल हुई. दूसरी बात सरकार कैसे
किसी टाइटल सूट में अपना हक़ और दावा दाख़िल कर सकती है. अगर सरकारी ज़मीन के ऊपर किसी ने ना जाइज़ क़ब्ज़ा किया
है तो सरकार को पूरा हक़ है की उसको फ़ौरन उस जगह से बरदखल किया जाए. फिर आज कमो बेश एक सदी से ज़ाईद सरकार अपनी ज़मीन
को अपने क़ब्ज़े में नहीं ले सकी. दूसरी बात
अगर वो सरकारी ज़मीन थी और सुप्रीम कोर्ट ने उसको हुकुमत को दे दी तो अब उसके ऊपर मंदिर
कैसे तामीर हो सकता है. दस्तूर में हुकूमत
की हैसियत तो दुनयावी (सेक्युलर) है, फिर वो मंदिर की तामीर कैसे करवा सकती है.
आज के फैसले से ये ज़ाहिर हो गया की सरकार की निगरानी में मुस्लिम हुक़ूक़ का क़त्ल हो रहा है. और इस क़त्ले आम में अदलिया, कानून, आर्मी, पुलिस, हुकूमत, सहाफत, और हिन्दू अवाम सब शामिल हैं. और ऐसे फैसलों को कहा जाएगा “रियासत के ज़ेरे एहतेमाम दहशतगर्दी”. आज हिन्दू अवाम को मुस्लिम याद आ रहें हैं. भाई चारे की बातें की जा रही हैं. लेकिन क्या अगर ज़मीन के मालिकाना हक़ पर इन्साफ होता तो उसको हिन्दू अवाम इतने आसानी से हज़म कर जाता. नहीं हरगिज़ नहीं.
सुप्रीम
कोर्ट से सुप्रीम ग़फ़लत हुई. ये तो वही बात हुई दो फ़रीक़ों के खेत और ज़मीन का झगड़ा है
और अदलिया बजाये उसके उनवान (टाइटल) के ऊपर
फैसला देने के एक गुंडे डॉन को ज़मीन का हक़ दे दे जो ज़मीन खरीदना चाहता था. हुकूमत तो
कभी फ़रीक़ रही ही नहीं फिर मोदी जैसे हिटलर और आतंकी ज़ेहनियत को कैसे ज़मीन दी जा सकती
है. ऐसे फैसलों से ज़बरदस्त इन्तेशार फैलेगा.
खैर
इस सहाफी को ग़ैरों से कोई गिला और शिकवा नहीं है, उनका तो काम ही है मुस्लिम अवाम को
तबाह करना. लेकिन इस सहाफी का तो क़ौम और मिल्लत
में जो काली भेड़ें मौजूद हैं जो बिकाऊ और मुनाफ़िक़ाना सोच रखती हैं उनसे गिला है.
सुन्नी
सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन ज़फर फ़ारूक़ी दुसरे कमाल फ़ारूक़ी ऐसे इंसान हैं जो हुकूमत से बोहोत ही
मुत्तासिर हैं. उनकी कई बार टी वी पे गुफ्तगू
और मुबाहिसा को देख चूका हूँ. पहले पहले तो
खूब गर्म जोशी से मुस्लिम अवाम की बात करतें हैं, इस्लाम के परचम के अलम्बरदार होतें
हैं लेकिन गुफ्तगू और मुबाहिसे के इक्तेदाम पर अपनी हतमी राये हुकूमत और हिन्दू और हिंदुस्तान
के हक़ में दे देतें हैं. ये एक बार नहीं बारहा हुआ है. बल्कि अब तो ऐसे लोगों के आगे आने पे
तशवीश और फ़िक्र होने लगती है, की फिल वक़्त ये लोग बड़ी बड़ी बातें कर रहें हैं लेकिन बिल आखिर वही करेगें
जो हुकूमत चाहती है. और हुकूमत की चाटुकारिता
करने लगेंगे.
दूसरा
मौलानाओं की वो जमात है जो बग़ैर ग़ौर और फ़िक्र हुकूमत हिन्द की बोली बोलते हैं और संघ
की चापलूसी करते हैं. बाबरी मस्जिद फैसला आने
के कुछ १ या दो माह क़ब्ल मौलाना अरशद हिन्दू दहशतगर्द से जा कर मिला था. क्या ज़रुरत थी मिलने की और वही सब कवायत पूरी करने
के लिए मिला होगा की बाबरी का फैसला हम हमारे हक़ में ले लेंगे आप लोग मुस्लिम अवाम को
ख़ामोश रखो. मेहमूद बोलता है की मुस्लिम तो
निज़ामे मुस्तुफा क़ायम करना चाहते थे हमने निज़ामे मुस्तुफा और क़ुरान के क़ानून को ठुकरा
दिया और हिन्दू क़ानून की ताईद की और हिंदुस्तान में रहे. ऐसे बयानात का क्या मतलब है. मतलब साफ़ है की ये लोग बाबरी के फैसले से पहले बिक
चुके थे. दूसरा फैसले से कुछ ५ या ७ रोज़ क़ब्ल
मौलानाओं के एक वफंद को मुनाफ़िक़ नक़वी ने अपने घर पे रक़्स करने लिए बुलाया था. तमाम मौलाना पहुंचे और उस मुनाफ़िक़ यज़ीद के हामी
के इर्द गिर्द रक़्स करने लगे. नक़वी ने भी उन
सब से वादा ले लिए की अगर सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम अवाम के ऊपर कानूनी दहशतर्द हमला करती
है तो आप लोग अवाम को खामोश रहने की तरग़ीब करेगें. सभी मौलाना रुपी पतिंगों ने कहा लब्बेक आक़ा जो
हुकूम. और तभी से फ़िज़ाओं में अलग हवा बहने
लगी हम को भाई चारा बना के रखना है. सुप्रीम
कोर्ट का जो भी फैसला होगा हमको हमारा वतन नहीं जलने देना हैं. आपसी भाई चारे को क़ायम रखना है. इतना ही नहीं अब गंगा जमुनी तहज़ीब की बातें होने लगी. फैसला चाहे जो कुछ भी
हो हम को हमरे शहर को खामोश और पूर सुकून माहौल को क़याम रखना है.
इस
सब बातों से ज़ाहिर होता है की फैसला तो पहले ही हो चूका था बस उसकी खाना पूर्ती बाक़ी
थी. क्योंकि वतन और शहर में अमनो अमान क़ायम
रखना सिर्फ मुस्लिम अवाम की ज़िम्मेदारी नहीं है वो तो दुसरे फ़रीक़ की भी है. फिर जिस हिसाब से सिर्फ मुस्लिम नुमाइंदों पर ज़ोर
डाला गया की फ़िज़ा को ख़राब मत होने देना तो साफ़ ज़ाहिर होता है की फैसला मुस्लिम अवाम के ख़िलाफ़ आने वाला है और मुसलमानों का ना हक़ क़त्ल होगा उसपे मौलानाओं पे ज़ोर डाला जा रहा है की अपने अज़ीज़ों, हमसायों और मज़हबी भाईओं के क़त्लो ग़ारत पे कोई आवाज़ बुलंद मत करना. हम वैसा ही करने वाले हैं जैसे
की याक़ूब मेमन को कानूनी दहशत कर के शहीद किया था. क्योंकि अगर क़ानूनी दायरे में फैसला
होता तो अमन क़ायम रखने की ज़िम्मेदारी तो हिन्दू साधू और संतों के ऊपर आईद होती है. और अगर मुंसिफ़ाना होता तो दोनों फ़रीक़ों के नुमाइंदों
को बुला के अमन की गुहार लगानी थी सिर्फ मुस्लिम अवाम से अमान की अपील करना मतलत उनके
साथ ना इंसाफ़ी होने वाली है. और कोई भी फ़रीक़ अपनी हक़ तलफी पे आपे से बहार होगा.
सियासी
हलकों में असद भाई की बोहोत इज़्ज़त करता हूँ और उनकी पार्टी की ताईद भी करता हूँ. असद भाई बोलतें हैं की हमको ५ एकड़ की ख़ैरात नहीं
चाहिए. बिल्कुल सही है ख़ैरात नहीं लेंगें. लेकिन मेरा उनसे भी मुतालबा है, क्या आप इससे
अच्छा कर सकते हो, तो आप ठुकरा दो ख़ैरात. दूसरी बात आपने ज़ाफ़रानी हुकूमत देख ली, दस्तूर जिसने
आपको हुक़ूक़ फ़राहम किये हैं उसकी धज्जियाँ उड़ते हुए देख ली, कश्मीर में फौजी हिकमत और
एक तरफा कारवाही देख ली, बिल आखिर अदलिया ख़ास
सुप्रीम जिसके ऊपर आपको एक चट्टान के जैसा यक़ीन और एतेमाद था उसको भी देख लिया ये दूसरा
मौक़ा है जब सुप्रीम अदलिया ने ना सिर्फ आपके बल्कि उन हज़ारों मुसलमानों के पीठ में
गले लग कर खंजर घोंपा है जिनको उसके ऊपर यक़ीन था की ये हमारी रेहमुमाई एक वालिद के
जैसे और बग़ैर जानिबदार बग़ैर किसी फ़र्क़ और तफ़रीक़ के करेगी. पुलिस और ऐवान का तो क्या कहना वो तो ज़ाफ़रानी ज़हर
से भरे पड़े हैं.
असद
भाई अब अगर आपको ५ एकड़ की ख़ैरात नहीं चाहिए तो वाहिद आखिर रास्ता बचा है बटवारा. एक और मुल्क़ की जानिब सोचने की बारी आ चुकी है. कब तक मुस्लिम हक़तल्फ़ी का जनाज़ा उठाते रहेगें. कब तक ना इंसाफ़ी के बोझ को ढोते रहेगें. २००२ के हिन्दू दहशतगर्द हमलो के तमाम मुजरिमीन
बरी हो गए. एहसान जाफरी की बेवा इन्साफ की
आस में बूढी होती चली गई. इशरत की वालेदा इन्साफ
की आस छोड़ के दावे से ही अलहदा हो गई. कब तक
मुस्लिम अवाम अपनी किस्मत पर साबिर और शाकिर रहेगें कब तक हर जुर्म पे क़ातिल को सजा
होने के बजाये बरी होने पे मशीयते इलाही को जान कर सब्र कर लेंगे. लेकिन अब सब्र का पैमाना लबरेज़ हो चूका है. और अब तो बटवारे की जानिब सोचना पड़ेगा.
बटवारे
की उस हिकमत में मुनाफ़िक़ों, गद्दारों और मुस्लिम दुश्मनों को कोसों दूर रखिये. पाकिस्तान से राब्ता क़ायम करना पड़े तो कोई हर्ज
नहीं अक़वामे मुत्तहिदा की जानिब जाना पड़े तो कोई हर्ज नहीं आलमी अदलिया का बाब खोलना
पड़े तो कोई हर्ज नहीं लेकिन अब मज़ीद मुस्लिम ना इंसाफ़ी हो इससे पहले काउंटर ब्लास्ट
ज़रूरी है.
ये
मुसलमानों के ऊपर कानूनी दहशत है, और इसके दूरंदेश नताइज अच्छे नहीं होंगे.
Supreme Terror Attack on Muslim Mosque.
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