नई दिल्ली
अज़ीज़ नाज़रीन,
मेरे हमक़दम साथिओं और हमख़याल सहाफिओं
(ख़ास रविश, अभिसार, राणा)
भारत में एक साल में ३०० फीसदी बढ़े कैंसर के मामले, गुजरात सरे फेहरिस्त
इस सहाफी का आज का मज़मून कई चौकाने वाले खुलासे करने वाला है, और इस बात
की तस्दीक़ भी करेगा की पैग़म्बरे इस्लाम पे जिस जिस ने तोहमत लगाईं गन्दी गाली गलोच
की क़ुरान की अज़मत को पामाल किया इस्लाम की हुरमत की धज्जिया उड़ाई उन सब की आज क्या
हालत है.
इस बात को ये सहाफी कई बार मन्ज़रे आम कर चूका है की
इस नए भारत में कुछ भी नया नहीं है. बरक्स
५००० साल पुराना भारत जिसको के संघी आतंकवाद अपने दिल का राम राज्य बोलते है उस वक़्त
में ला कर खड़ा कर दिया है.
बात असल में शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम और नाबीना अकीदतमंदों
की सेहत से जुडी हुई है. जिसका ख़ुलासा भारत
की क़ौमी सेहत प्रोफाइल २०१९ का डाटा कर रहा है. जिस डाटा से वाज़े हो जाता है की भारत
में ख़ास गुजरात में कैंसर के मरीज़ों की अक्सरियत में बे पनाह इज़ाफ़ा हुआ है. साल २०१७ से २०१८ के बीच कॉमन कैंसर जिसमें ओरल
कैंसर, सर्वाइकल कैंसर और ब्रेस्ट कैंसर शामिल हैं, के केसेज ३२४ फीसदी बढ़ गए हैं।
यह मालूमात क़ौमी सेहत प्रोफाइल २०१९ के डेटा से सामने आई है। ये केसेज भारत के मुख़तलिफ़
सूबों के अस्पतालों में दर्ज किए गए हैं। २०१८
में ६.५ करोड़ लोग इन अस्पतालों में स्क्रीनिंग के लिए पहुंचे जिनमें १.६ लाख लोगों को कैंसर निकला जबकि २०१७ में इन केसेज के ३९,६३५ केसेज ही डिटेक्ट हुए थे। हालांकि
एनसीडी क्लीनिक्स में २०१७ से २०१८ तक पहुंचने वाले की संख्या भी डबल हुई। यह पहले
३.५ करोड़ थी जो ६.६ करोड़ तक पहुंच गई।
माहेरिनों का मानना है कि बीमारी के बढ़ने की वजह रोज़
मर्रा की बदलती तर्ज़े ज़िन्दगी है, जिसमें शिद्दत और दबाव में काम करना, खाने-पीने से जुड़ी आदतें, तंबाकू और शराब ख़ोरी शामिल है। २०१८ में सबसे ज्यादा कैंसर के केसेज
गुजरात में मिले, इसके बाद कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना और वेस्ट बंगाल में पाए गए।
गुजरात में २०१७ में ३९३९ कॉमन कैंसर के केसेज थे जो
कि २०१८ तक ७२,१६९ तक पहुंच गए। इसका मतलब
है कि ६८,२३० कैंसर के नए मामले दर्ज किए गए।
यहां एक बात ग़ौर करने वाली है और इबरत नाक है जहाँ
गुजरात में सबसे ज़्यादा कैंसर के मरीज़ों में इज़ाफ़ा हुआ है वहीँ आंध्र प्रदेश और उत्तर
प्रदेश जैसे सूबों में तशख़ीस (डायग्नोस) होने वाले मामलात की फेहरिस्त कम थी वहां भी
२०१८ तक संख्या में काफी उछाल देखा गया। लेकिन
बाद में कैंसर के मामलात में हैरत अंगेज़ कमी दर्ज की गई।
ऐक्शन
कैंसर हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट ऑन्कोलॉजिस्ट डॉक्टर हरप्रीत सिंह कहते हैं, ओरल
कैंसर के लिए सबसे ज्यादा तंबाकूनुमा प्रॉडक्ट्स
जिम्मेदार हैं, खास तौर पर जब इन्हें शराब के साथ लिया जाए तो रिस्क और बढ़ जाता है।
इसके अलावा बैठे रहने वाली लाइफस्टाइल और बढ़ता मोटापा भी हर तरह के कैंसर को बढ़ा
रहा है। ब्रेस्ट कैंसर से बचने के लिए डॉक्टर्स ब्रेस्ट फीडिंग की सलाह भी देते हैं।
हलाते हाजरा पे सहाफी जुबेर की नुक़्ता ऐ नज़र
बिल्कुल सही है ओर इस मुद्दे पे इस सहाफी ने ०७ अगस्त २०१९ को मेरा ख़्वाजा महान. उन्वान से एक मज़मून शाया किया है. उसमे वाज़े अलफ़ाज़ मे इस बात को मंज़रे आम किया है, जो जो पेगंबरे इस्लाम ओर क़ुरान की शान मे गंदी गलीज़ बात करते हैं उनको कैंसर होगा. उस मज़मून से पेहले भी कई बार अपने तब्सिरों मे ये बात मंज़रे आम कर चूका हूँ, की इस्लाम, क़ुरान ओर पेगंबर ओर उनकी अज़वाज पे गंदी गलीज़ बात करने वालों को गाली गलोच करने वालों इस्लाम पे झूट फरेब फ़ैलाने, तोहमत लगाने और ग़लतफहमी फैलाने वालों को केंसेर होगा.
अभी
तो कुछ नही तडप तड़प के मरेंगें. दूसरी बात
क्या वजह है की बॉलीवूड की कई हस्तियां केंसेर जेसी बीमारी से ना सिर्फ ठीक हो जाती
है बल्कि काम पे भी लोट आती है. लेकिन बीजेपी
हिन्दू दहशत फैलाने वालों ओर हिन्दू शिद्दतपसनद मर जाते हैं. चाहे वो विनोद खन्ना हो या जेटली.
इस
ज़िम्न में दो बातें वाज़े करना चाहता हूँ. पहली बात जैसा की इस सहाफी के ऊपर इलज़ाम तराशी की जाती है की वो हिन्दू मज़हब के ख़िलाफ़ ज़हर अंगेशी करता है बदनामी, बदगुमानी फैलाता है और हिन्दुओं से नफरत करता है ऐसा शिद्दत पसंद और दहशतगर्द
बोलतें हैं. वो सही और दुरुस्त नहीं नहीं है. सहाफी दुबे जी सहाफी अभिसार और रविश और बॉलीवुड
आशुतोष राणा और कई दुबे और तिवारी हैं जिनकी साफ़ गोई और हक़बयानी की इज़्ज़त करता हूँ. इस हक़ बयानी में फरेब नहीं है झूट नहीं है और ना
ही किसी मज़हब का मज़ाक झूट और फरेब की बुनयाद पे बनाया जाता है. जैसे की फरेबी और जालसाज़ एक पुरषोत्तम हर वक़्त नबी,
इस्लाम और क़ुरान पे झूट फरेब बोतल रहता है और अवाम में बदगुमानी फैलाता है. बोलता है टोपी वाला छोटे भाई का पैजामा और बड़े भाई
का कुर्ता. दूसरा सबसे बड़ा फरेब और झूट फैलाता
है की इस्लाम नबी के अमन और सादगी के पैग़ाम को देख कर नहीं फैला बल्कि जब उन्होंने
अपनी तलवार उठाई तो देखो सब ख़ौफ़ ज़दा हो कर कैसे इस्लाम में दाख़िल होते चले गए और अभी
तक हो रहे हैं.
दूसरी
बात ये कहना चाहूंगा की जिस तरह से डॉक्टर बोल रहे हैं की रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी और
खान पान में बदलाव की वजह से कैंसर के केसेस बढ़ रहे हैं. में उनसे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता. कोई भी बीमारी का देने वाला और उसमे शिफा देने वाला
सिर्फ और सिर्फ अल्लाह है. यहाँ तक की इस सहाफी
का अज़्म है की बंदूक की गोली और ज़हर का प्याला भी किसी को मार नहीं सकता अगर हुकुम
अल्लाह का नहीं होगा. वहीँ कोई सी भी दवा और
ख़ुराक़ इंसान को शिफा नहीं दे सकती अगर अल्लाह की मर्ज़ी उसको तड़पाने की है. शिफा देना दवा की मशीयत नहीं है और ना ही उसके हाथ
में है बल्कि वो अल्लाह की मर्ज़ी में मुन्नसर है. बढ़ते हुए कैंसर के केसेस को डॉक्टर्स रोज़ मर्रा की तब्दील तर्ज़े ज़िन्दगी को ज़िम्मेदार बता सकतें हैं. क्या वजह है की २०१४ के बाद सड़क हादसात और कुदरती आफ़ात से जहांबाक़ होने वालो की तादात में बे इन्तहा इज़ाफ़ा हुआ है. यहाँ तक की सुप्रीम अदलिया ने सड़क हादसात पे सख़्त मज़म्मत हुकूमत को लानत और इज़हारे तशवीश की है.
इस
पुरषोत्तम जैसे फरेबी जानवर और तमाम हिन्दू शिद्दत पसंदों से में पूछना चाहूँगा की
कोई मुस्लिम या ख़ुद ये सहाफी राम चंद्र के बारे में बोले की उन्होंने बीवी का भगवा
कुर्ता और भाभी का खाकी जांघिया पेहेन के जंग लड़ी तो उनके क़ल्ब को कितनी अज़ीयत होगी. सीता की अग्नि परीक्षा तो मशहूर है कोई बात को फरेब
फैलाने की हिकमत से कहे की सीता के किरदार में खोट था इसलिए उनकी अग्नि परीक्षा ली
गई. तथा रावण और सीता के रिश्ते के बारे में
लव कुश की पैदाइश के बारे में ऊल जलूल झूटी फरेबी बातें करना शुरू करे तो केसा लगेगा.
अगर
कोई भी सच्चा हिन्दू है जो पुरषोत्तम राम और उनके उसूलों पे चलता है तो वो कभी भी दुसरे
मज़हब के नुमाइंदों और नबिओं का मज़ाक़ नहीं बनाएगा.
नबी, इस्लाम, मुसलमान और क़ुरान पे तोहमत लगाने का झूट फरेब फ़ैलाने का और मज़ाक़
बनाने का ये सिलसिला २०१४ से खूब फ़रोग़ पा रहा है.
और यही शिद्दत पसंदी की वजह से हर वो हिन्दू सख़्त गिरफ्त में है जो मुजरिम है.
२०१४
से पहले बावजूद हिन्दू मज़हब की तमाम कमियां और खामियां इस सहाफी को मालूम होने के
उसने कभी भी हिन्दू मज़हब पे ना तो कोई ताना कशी की और ना ही कोई कमी निकाली लेकिन शिद्दत
पसंद हिन्दू हैं के बढ़ते ही चले जा रहे थे. तो उनको उनकी ज़ुबान जो वो समझ सकतें हैं
उसी ज़ुबान में जवाब देना ज़रूरी समझा इसलिए गुज़िश्ता एक डेढ़ साल से जब एक एक कमी और
ख़ामी निकाल के इन फरेबियों और धोखेबाज़ों को बरहना करना शुरू किया तब इनको लगा की हमको
भी कोई हमारी ही ज़ुबान में जवाब दे सकता है.
में
तो इतना ही कहना चाऊँगा की हिन्दू मज़हब की बात कीजिये खुल के कीजिये राम का किरदार
भी रखिये राम मंदिर बनवाने की बात भी कीजिये लेकिन दूसरे मज़हब के नुमाइंदों की लाशों
पे नहीं झूट फरेब और दोहरा माप दंड अपना डाका ज़नी कर के राम के किरदार को बदनाम मत
कीजिये. जो लोग बोलतें हैं की इस्लाम में अल्लाह हो अकबर बोल के मार दिया जाता है तो
वो सभी यहूदी हैं इस्लामिक लिबास और चेहरा अपना कर जो क़त्ले आम करतें हैं. जिस तरह से हिंदुस्तान में हिन्दू शिद्दत पसंद और
दहशतगर्द मुस्लिम लिबास पेहेन कर और दाढ़ी बढ़ा
कर दहशत मचाते हैं और इलज़ाम मुस्लिम अवाम पे लगाते हैं.
इराक़,
अफ़ग़ानिस्तान, सऊदी सब जगह अमेरिका और इजराइल ने अपने नुमाइंदे खड़े किये हुए हैं और
वही सब क़त्लों ग़ारत कर रहे हैं. क्या वजह है
की सद्दाम हुसैन कमो बेश ४० साल से ज़ाइद इराक़ पे क़ाबिज़ थे लेकिन कभी भी इराक़ इतना कमज़ोर
नहीं हुआ और वो मुल्क़ दुनिया का सबसे ज़्यादा माशी हालात से कवी और ताक़तवर मुल्क़ तस्सुवर
किया जाता था. लेकिन आज का इराक़ अमेरिकी भीक
पे ज़िंदा है.
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