आज के ज़ालिम बादशाह ने मस्जिद तोड़ के मंदिर बनाया और हमारे बादशाहों ने कोई मंदिर नहीं तोडा. हमको नाज़ है हमारे बादशाहों पे.
सुप्रीम
अदलिया ने अपनी ताक़त और ओहदे के ज़ोर पर मुस्लिम अवाम से ज़मीन तो छीन ली लेकिन उसका
मालिकाना हक़ के दस्तावेज़ और सबूत जो अदलिया में मुनालिका (एनेक्स) हो गए, और जो अब सबूत बन गए हैं, उनको कैसे कोई झुटला पायेगा. तारीख़ में इस सुप्रीम जालसाज़ी, धोखेबाज़ी, डाकाज़नी का सबूत बन चुके हैं, उनको
कैसे फरामोश कर सकोगे की मस्जिद तोड़ के मंदिर तामीर की गई.
मंदिर
ज़रूर बनेगा लेकिन वो मुसलमानों की ख़ैरात और और थाली में छोड़ी हुई झूठन पे बनेगा. राम का मंदिर बनेगा लेकिन उस बाबर की ज़मीन पे बनेगा
जिसको हिन्दू अवाम हमलावर, खुनी दरनिन्दा और ना जाने किन किन अलक़ाब से नवाज़ते थे. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने ज़मीन चाहे सरकार को दी
हो या किसी भी हिन्दू दावेदार को लेकिन वो जाइज़ और इन्साफ के पैमाने पे नहीं दी गई
है. और ये बात सुप्रीम जालसाज़ में साबित और दर्ज हो
गई है की ज़मीन के दस्तावेज़ और सबूतों के हिसाब से उसपे मालिकाना हक़ मुस्लिम अवाम का
है. फिर वो ज़मीन उनके पास बाबर के ज़रिये आई. अब वो ज़मीन किसी को भी दे दो लेकिन हक़ीक़त को कैसे
तब्दील करोगे.
सुप्रीम
कोर्ट ने इस बात को माना है की कोई मंदिर नहीं तोडा गया था. जो मंदिर के आज़ा मिले हैं सुप्रीम कोर्ट में ये
साबित नहीं हो पाय की वो मंदिर के हैं और किस मंदिर के हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने हुकुमनामे में साफ़ अलफ़ाज़
में कहा है की मस्जिद की तामीर के लिए मंदिर नहीं तोडा गया. आगे मज़ीद कहा मस्जिद में मूर्ती रखना गुनाहे अज़ीम
था और सख़्त मज़म्मत की, और १९९२ में मस्जिद को शहीद करने जैसे अमल हिन्दू अवाम के ऊपर
दाग हैं.
मुस्लिम
अवाम को अपने हाकिमों और बादशाहों पे नाज़ हैं की उन्होंने कोई मंदिर नहीं तोडा और ना
ही अपने दौरे बादशाहत में किसी की दिल आज़ारी की और ना ही किसी के साथ ना इंसाफ़ी. लेकिन जब तुम्हारा दौर आया तो क्या क्या खेल खेल
रहा है आज का ज़ालिम, दरिंदा सिफ़त खुनी बादशाह.
हर वक़्त हिन्दू अवाम को अपने राम की पूजा और इबादत करते वक़्त इस बात का सख़्त
मलाल और तशवीश रहेगी की हम मुगल बादशाह की ज़मीन पे मुसलमानों की ख़ैरात पे पूजा कर रहे
हैं. उनको इस बात पे पशेमानी हिस और शर्म सदा महसूस होगी की अपने राम जी को एक डाका डाली हुई ज़मीन पे पाल रहे हैं. असली मर्द वो जो जंग में दुश्मन से जीत हासिल करे
ज़मीन और जायदाद अपने बाजूवे क़ुव्वत पे हासिल करे.
ना की गीदड़ और चील कव्वो की तरह मरे हुए माल पे नज़र रखे और उस को खाये.
सुन्नी
वक़्फ़ बोर्ड को जो ख़ैरात मोदी जैसे ज़ालिम, खुनी, दरिंदे सिफ़त हिटलर से मस्जिद के लिए
मिल रही है उसको हरगिज़ नहीं मंज़ूर करना चाहिए.
क्योंकि अगर मोदी की ख़ैरात मंज़ूर कर ली मतलब सुप्रीम कोर्ट की जालसाज़ी, फरेब
को आप सही और दुरुस्त मानते हो. दूसरी बात आज १००० साल बाद मुस्लिम अवाम को बाबर के नाम से ताने तिशने किये जाते हैं उस ख़ैरात को मंज़ूर करने के बाद मोदी की ख़ैरात बोल के तंग
किया जाता रहेगा.
अल
गरज़ सुप्रीम जालसाज़ ने डाकाज़नी कर के अपने आक़ा और मुहाफ़िज़ दहशतर्गों के हक़ में फैसला
तो सूना दिया लेकिन हिन्दू अपने अज़ीम रहनुमा और राम के मंदिर में जब जब इबादत और उनका
ज़िक्र करने जायेगें उनको इस बात की ख़लिश, सख़्त मलाल और तशवीश रहेगी की हमने एक फ़रीक़ की इबादत
गाह को तोड़ के अपने राम का मंदिर बनाया है. दूसरी बात उनको इस बात का भी मलाल, दुःख और तकलीफ
हर वक़्त रहेगी की हमारे राम जिनकी हम इबादत और पूजा कर रहे हैं वो किसी और की नहीं
बल्कि बाबर की ज़मीन और आज के मुसलमानों की चैरिटी के ऊपर पल रहे हैं.
भले
ही हिन्दू आलीशान राम के मंदिर की तामीर कर डालें लेकिन उनको उस मंदिर में सुकून अमन
का एहसास हरगिज़ ना होगा. कही ना कही उनको ये
बात का मलाल रहेगा की कुछ तो हमने गलत कर दिया.
आज ताक़त और ओहदे के नशे में तुमको इस बात का एहसास ना हो लेकिन आते वक़्त में
वो मंदिर तुमको ख़ौफ़ज़दा करने लगेगा. उस मंदिर
के बजाये हिन्दू अवाम दुसरे राम के मंदिर में जाना पसंद करने लगेंगे.
इस्लाम
मज़हब कभी भी किसी की भी इबादत गाह को तोड़के अपनी इबादत गाह बनाने की इजाजात हरगिज़ नहीं
देता है और ना ही सच्चा मुसलमान किसी की भी इबादत गाह को तोड़ के अपने खुदा की मस्जिद
तामीर करेगा. फिर हिन्दू अवाम ने एहमद शाह
अब्दाली और ओरंगज़ेब जैसे ज़लील क़द्र वली सिफ़त बादशाहों पे झूटी तोहमत लगाईं. कहीं भी तारीख़ में औरग़ज़ेब के मंदिर तोड़ने के कोई
भी सबूत नहीं हैं. और अगर तोडा है तो उसकी
हिकमत थी उस मंदिर में महंत ख़वातीन के साथ बदकारी करता था और बच्चिओं को क़ैद कर के
ज़िना कारी बदकारी शराबखोरी करता था. चोरी और लूट का माल मंदिर में छुपाया करता था. सिर्फ इसलिए तोड़े गए थे कुछ मंदिर क्योंकि अब वो
इबादत के लिए नहीं रहे और गंदे हो गए थे. हिन्दू
अवाम के मज़हबी एतेक़ाद को महंत की अय्याशी की वजह से ज़बरदस्त धक्का लगा था. तो मौजूदा
मंदिर दीगर महंत और आला हिन्दू साधुओं से राब्ता कर के तोड़ दिया गया था और उससे ज़्यादा
बड़ी ज़मीन दौलत और सोना दे कर दूसरा मंदिर अपनी सरपरस्ती में तामीर किया गया था.
इस्लाम
मज़हब में दुसरे मज़हब के खुदाओं को बूरा बोलने का हुकुम नहीं है तो कैसे कोई मुस्लिम
हाकिम और बादशाह दुसरे मज़हब के मंदिरों को तोड़ के उनकी दिल आज़ारी और खुदा के क़ेहर और
जलाल का बाइस होगा. जो भी बातें मंदिरों को
तोड़ने की निस्बत से कही जातीं हैं वो सब झूटी, फरेबी और जालसाज़ी की बुनयाद पे हैं.
सुन्नी
वक़्फ़ बोर्ड से गुज़ारिश है की किसी भी तरीक़े की अब हिकमत इख़्तेयार ना करें ना रिवीव
पेटिशन डालें और ना ही क्रूररेटिव. क्योंकि
फैसला वही होगा जो हो चूका. तारीख़ के सफों
में अब जो चीज़ दर्ज हो गई उसको मज़ीद आगे भेजें.
मुस्लिम अवाम पे जो इलज़ाम तराशी की जाती है की वो दहशतगर्द होतें हैं, ज़ालिम
होते हैं, अनपढ़ जाहिल होतें हैं. मुस्लिम बादशाहों
ने मंदिर तोड़े. उस झूट का पर्दा फाश खुद सुप्रीम
कोर्ट ने कर दिया और उसको मज़ीद आगे की जानिब भेजें. ख़ैर अवाम और दुनिया बढ़ी ही चालाक जगह है वो सब जान
जातें हैं की कौन कितने पानी में है. सभी हिन्दू
और आलमी बरदारी को अभी तक ये इल्म हो चूका होगा की कौन सी क़ौम अमन पसंद होती है और
कौन ख़ून ख़राबे पे यक़ीन रखने वाली.
आज
अगर मोदी भक्त या खुद मोदी कहें की शक्कुल कमर का वाक़िया नहीं हुआ और हम चाँद पे यक़ीन
नहीं रखते क्योंकि वो मुसलमानों का है. हो
सकता है उनकी दहशत की वजह से फिल वक़्त सब हाँ में हाँ मिला लें लेकिन अपने पोशीदा अमल में वो हर वक़्त चाँद को देख
कर ही अपने शोहर की सूरत देखा करेगें.
सभी
मुसलमानों को इस बात पे नाज़ होना चाहिए की उनके दौरे बादशाहत में किसी भी हिन्दू की
कोई भी मज़हबी इबादत गाह को तोड़ के किसी भी मुस्लिम बादशाह ने अपने खुदा की इबादत गाह
नहीं तामीर की और इस बात का भी फख्र होना चाहिए की आज एहले हूनूद के सबसे अज़ीम रहनुमा
और खुदा की इबादत गाहा झूट फरेब मुस्लिम अवाम की मस्जिद को तोड़ के बनाई गई है. इतना सब होने के बाद भी मुस्लिम अमन का पैगाम दे
रहें हैं इससे बड़ी मिसाल मुस्लिम अमन पसंद होतें हैं और इस्लाम अमन का पैगाम देता है
और क्या सबूत मिलेगा.
मुस्लिम
अवाम सिर्फ दिफ़ा करतें हैं किसी भी फ़रीक़ की दिल आज़ारी नहीं. ९ नवंबर को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और शाम ८.३०
मिनिट से ज़बरदस्त आतिशबाज़ी की जाने लगी जो रात १२ बजे तक चालू थी. फैसले के फ़ौरन बाद मुस्लिम जैसे दिखने वाले लोगों
को परेशान किया जाने लगा. फ़िक़रे, ताने तिश्ने
किये जाने लगे. जबकि फैसला मुंसिफाना और हक़
पे मब्नी ना था उस फैसले में जीत मुस्लिम अवाम की ही हुई है और हिन्दू जीत के भी हार
गए. फिर भी मुस्लिम अवाम को परेशान करना ज़बरदस्त
आतिशबाज़ी और इज़हारे खुशी करना क्या ये मुस्लिम अवाम की दिल आज़ारी नहीं है. उसमे सिर्फ और सिर्फ मक़सद मुस्लिम्स को भड़का के
दंगे फसाद करने की मंशा थी.
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