Tuesday, 5 November 2019

हमसायों तुम कब आवोगे.

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज ये सहाफी अपनी बात दो क़दीम कहानियों से शुरू करेगा और हालाते हाजरा में इन दोनों कहानियों के ज़रिये आज की हुकूमते हिन्द पे उनका क्या असर होता है बताने की कोशिश करेगा.   

पहली कहानी

किसी मुल्क में एक शख़्स रहता था, वो निहायत ही बुद्धू, अनपढ़ और गवार किस्म का था.  जो बात उसको अच्छी लगती वो वही करता था, चाहे कोई कितना भी उसको बोले के इस काम को करने में बड़ी परेशानी उठानी पड़ेगी या तकलीफ तुमको हो जायेगी.   उस बुद्धू को अवाम चाचा तेली बोल के ख़िताब करते थे.  उस चाचा तेली नाम के शख़्स के कुछ चमचे, पैरोकार और लंगूर-लँगूरनिओं की तरह उसके ग़ुलाम थे जो उसके बिगड़े काम को भी हर वक़्त सराहते रहते थे. क्या जल्द फैसला करतें हैं, क्या सख़्त मिज़ाज है, जो कहतें है वो करतें हैं वग़ैरा वग़ैरा.  उस चाचा तेली को अपनी तनक़ीद, कमी बताने वाले या सच्ची बात कहने वाले क़त्तई पसंद ना थे.

एक रोज़ चाचा तेली एक बड़े से दरख़्त पे बैठे उसी डाल को काट रहे थे जिसपे वह बैठे हुए थे.  एक दानिशमंद का उधर से गुज़र हुआ  उसने देखा की चाचा तेली उसी डाल को काट रहा है जिसपे वह बैठा है.  उन्होंने उसको समझाइश की अरे, चाचा तेली ये किया कर रहे हो जिस डाल पे बैठे हो उसी को काट रहे हो, तुम गिर जाओगे.  चाचा तेली ठहरा झूटी और फरेबी बातों पे यक़ीन करने वाला एक ऐसा अहमक़ और जाहिल जो अपने आस पास फिरने वाले चापलूस लोगों की बातों पे ज़्यादा तवज्जो देता था भलें ही वो झूट और फरेब पे मुनस्सिर हों बजाये दानिशमंदों और अक़ल्मंदों की तन्क़ीदी बातों के.  चाचा तेली को यक़ीन था की जब इतना क़वी, बड़ा और ताक़तवर दरख़्त है उसकी एक डाल को काटने से मैं कैसे गिर सकता हूँ.  अब हुआ वही जो उस दानिशमंद ने उस अहमक़ को नसीहत की थी.  डाल को पूरी तरह से काटते ही चाचा तेली धड़ाम से डाल के साथ नीचे आ गिरा.

नीचे गिरते ही चाचा तेली आग बबूला हो गया और अपने चमचो और चापलूसों को हुकुम दिया वो देखो उस शख़्स को पकड़ो उसने बद्दुआ दी इसलिए में गिर गया.  अब तमाम चापलूस, चमचे, लंगूर-लँगूरनियाँ और ग़ुलाम पहुंच उस दानिशमंद के सर हो गए और उसको चाचा तेली समेत खूब खरी खोटी सुनाने लगे तुमने कहा इस वजह से चाचा गिर गया अगर तुम नहीं बोलते तो वो इतने क़वी और घने बड़े दरख़्त से कैसे गिर सकता था.   

जब दानिशमंद ने चाचा तेली और उसके चमचो चापलूसों को डेमो दे कर बताया की मेरे बोलने से नहीं बल्कि ये तो नियम है अगर तुम जिस जगह पर बैठे हो और उसकी बुनयादी जोड़ को काट रहे हो तो जोड़ के कटते ही डाल तने से अलग हो जायेगी और डाल गिरते ही तुम भी गिर जाओगे.  ख़ैर चाचा तेली को अपनी ग़फ़लत और बेवकूफी का अंदाजा हुआ.  लेकिन वो ठहरा सख़्त मिज़ाज और मग़रूर वो खामोश हो गया और दिल ही दिल में अपने आपको कोसने लगा.
 
दूसरी कहानी

एक बड़ाई था उसके पास एक मुर्गी थी जो रोज़ एक सोने का अंडा देती थी.  उस अंडे को बड़ाई बेच के पैसे जमा करने लगा.  थोड़े दिनों में बड़ाई खूब अमीर हो गया.  बड़ाई दिन बा दिन अमीर पे अमीर होता चला गया.  अब उसके चापलूस, चमचे और चाटूकार भी उसकी शोहरत और ओहदे को देख कर बढ़ने लगे.  उस बड़ाई का एक मदगार था जो निहायत ही आवारा, ज़ालिम, गुंडा और जल्लाद फितरत था वो किसी भी मसले पे अवाम को मार काट डालता था, बात बात पे खून ख़राबा, खून बहाने की तरग़ीब करता था.  मुर्गी बग़ैर कोई उज्र लिए हर रोज़ उसी हिसाब से एक सोने का अंडा देती रही.  एक दिन बड़ाई के उस जल्लाद, ज़ालिम, ख़ूनी मददगार ने बड़ाई के ज़हन में लालच डाला ये रोज़ रोज़ का एक अंडा पाने के बजाये क्यों ना हम मुर्गी का सर एक है झटके में धड़ से अलग कर के उसके सारे अंडे निकाल लें और मज़ीद अमीर बन जाए. बड़ाई भी निहायत ही लालची और एहसान फरामोश था जिस मुर्गी ने उसको सालों साल एक सोने का अंडा दिया जिसकी वजह से उसको इतनी इज़्ज़त, शोहरत मिली और इतने ऊँचे ओहदे पे फ़ाइज़ हुआ उसने छूरा हाथ में उठाया और बग़ैर किसी के इल्म में लाये ख़ामोशी से एक ही झटके में मुर्गी का सर धड़ से अलग कर दिया.  ७ मिनिट में मुर्गी मर गई.  अब उसने मुर्गी का पेट फाड़ा और चाहा की सारे अंडे निकाल लूँ.   लेकिन उसमे से फ़ौरन एक काला नाग निकला देखते ही देखते वो एक निहायत ही बड़ा अज़दह बन गया और बड़ाई को पूरा का पूरा निगल गया.  असल में मुर्गी बड़ाई के लिए एक अज़ीम नेमत थी और वो अजिन्नाह में से थी.  

कहानी का ख़ुलासा

पहली कहानी: 

इंसान को कभी भी अपने आपको बोहोत ही ज़्यादा अक़लमंद नहीं तस्लीम करना चाहिए.  गलती इंसान से ही होती है जो गलती ना करे वो सिर्फ और सिर्फ रेहमान होता है.  दूसरी बात दानिशमंदों की नसीहत को गौर करना चाहिए क्योंकि अगर दानिशमंदों दूरन्देशों की बात पे अमल किया जाएगा तो कभी ठोकर नहीं लगेगी.  बिलफ़र्ज़ चाचा तेली की तरह नसीहत को गौर ना किया और धड़ाम से गिर गए तो ऐसी सूरत में बजाये चमचो, चापलूसों और लंगूरों को पीछे लगाने के तनक़ीद करने वालों की बात को गौर किया जाना चाहिए.  क्योंकि अगर गलती हुई थी, तो उसकी तलाफ़ी भी होना चाहिए और अगर तन्क़ीदीओं की तनक़ीद पे तवज्जो देने के बजाये लंगूर और लँगूरनिओं को पीछे लगा रहे हो मतलब अपनी गलती तस्लीम ही नहीं कर रहे हो.  ऐसी सूरत में मज़ीद गिरोगे और गिरते ही जाओगे और हो सकता है अगर नहीं सम्भले तो इतनी पस्ती में चले जाओगे के फिर ऊपर आना मुश्किल होगा. 

दूसरी कहानी

इंसान को कभी भी लालच और ज़्यादा पाने की हाविस में उस चीज़ को क़ुर्बान नहीं करना चाहिए जो उसको हर वक़्त फायदा देती है.  यहाँ मुर्गी कश्मीर का वो हिस्सा है जो आजकल भारत के धड़ से अलग हो चूका है.  अब जो आज कल काला नाग बन चूका है और जल्द ही अज़दह की शक्ल इख़्तियार करने वाला है.

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