Tuesday, 8 October 2019

मर्दुम शुमारी, ग़द्दारे क़ौम और रूहानी अलफ़ाज़

अज़ीज़ाने मिल्लते इस्लामियां,

आपसे गुज़ारिश है की पूरे मज़मून का मौताला करें.  जिसमे दानिशमंदों के लिए कुछ नसीहतें हैं एहले कश्फ़ के लिए करामात और बाकमाल हिस्सा, बिल आखिर एहले तरीक़त के लिए रूहानी फैज़ पोशीदा है.   राये शुमारी के मौसम में बोहोत से गद्दार और मुनाफ़िक़ आप लोगों के दरमियान पहुंच के मज़हब, क़ौम और मिल्लत, मुस्लिम मफ़ात और हुक़ूक़ के नाम पे क़ाइद, रहबर और तंज़ीम के लिए बदगुमानी और वस्वसा पैदा करेगें.
  
ऐसे लोग सिर्फ और सिर्फ मज़हब के नाम पे और मुसलमानों की लाशों पे अपना सयासी नफा देखतें हैं.  अगरचे सियासी नफा ना मिला तो मुख़ालफ़ीनों से एक बड़ी रक़म ले कर मुस्लिम तंज़ीम, मुस्लिम नुमाइंदों,  रहबर और सालार को बदनाम करतें हैं.  

जी हाँ मेरा इशारा सिर्फ और सिर्फ उस गद्दार की जानिब है जिसने ना सिर्फ सालारे मिल्लत असदुद्दीन और अकबरुद्दीन ओवेसी पे छींटा कशी की बल्कि रकूने पार्लियमान इम्तियाज़ जलील और रकूने असेंबली वारिस पठान को भी अपनी गंदी गलीज़ और बिकी हुई सोच की आगोश में ले लिया. 

बहर कैफ जिस अंदाज़ में वो हर दूसरे तीसरे दिन एक वीडियो तंज़ीम और सालार को बदनाम करने की निस्बत से शाया करता था उससे शक की सूई उसके ऊपर गहराती गई, के ये शख्स गद्दार है और मुख़ालिफ़ों से मिला हुआ है.  उसके इस किरदार पे इस सहाफी ने अपने व्हाट्स अप ग्रुप और फेस बुक पे एक मज़मून इंग्लिश और हिंदी में शाया किया है और उसको नसीहत की है.  लेकिन मज़ीद उसके ऊपर उल्टा असर हुआ और उसने क़ुरआनी आयात पढ़ना शुरू कर दी जिससे मुस्लिम अवाम और गुमराह हो जाए.  

बिल आखिर इस बात की तस्दीक़ ये वीडियो कर रहा है की ये शख्स मुस्लिम नस्ल कुशी करने वाली तंज़ीम एन.सी.पी. के कांटेक्ट में था.  कांग्रेस, हो एन.सी.पी. हो या फिर कोई और जमात जो सेक्युलर होने का अज़्म और दावा करती है जहाँ कभी भी मुस्लिम मफ़ात की बात आएगी सभी एक हो जायेगें और मुसलमानों को और उनके रहबर को तनहे तनहा छोड़ देंगे.   ये बात तब से ये सहाफी बोल रहा है जब से वो सहाफत की रूहानी दुनिया में आया था.  और सिर्फ ये ज़ुबानी जमा खर्च नहीं है बल्कि उसने ऐसे तमाम हालात और मामलात अपनी ज़िन्दगी में ना सिर्फ महसूस किये हैं, बल्कि उस ज़हरीली सोच की तपिश को खूब भोगा है.  


जिस एन.सी.पी. के लिए ये भाई सालार से गद्दारी कर बैठे उसका किरदार उस तंज़ीम के रेहनुमा शारद पवार की ज़िन्दगी खूब बयान करती है.  जिस वक़्त बाबरी मस्जिद शहीद हो रही थी वो वज़ीरे दिफ़ा था चाहता तो मस्जिद को बचा सकता था.  दूसरी बात जब १९९३ में बम्बई जल रहा था तब भी उसने बतौर वज़ीरे दिफ़ा कुछ भी इक़दाम नहीं किये.  १९९३ में जब वो वज़ीरे आला बना, बॉम्बे रिलीफ फण्ड के चेयरमैन ज़िया उद्दीन बुख़ारी मौलानाओं का एक वफंद ले कर जब उसके पास पहुंचे और बोले की मुस्लिम अवाम की हलाक़त पे आप आप कारवाही का हुकुम काहे को नहीं दे रहे हो तो बोलता है की चंद मुसलमानों को बचाने के लिए क्या में हिन्दू अवाम को मौत के आगोश में डाल दूँ.  उसपे मौलाना साहब भड़क गए और बोले फिर आना मुसलमानों का वोट लेने और उसके ऑफिस से निकल गए.  अभी कुछ ही अर्सा गुज़रा था की इंतेखाब से क़ब्ल मौलाना साहब को शहीद करवा दिया.  उनकी शाहदत के छींटे शरद के ऊपर पड़े लेकिन अपने सी.अम. की रसूख और सयासी कूव्वत की वजह से कोई भी उसका बाल बांका नहीं कर पाया.  लेकिन मालिके हक़ीक़ी तो सब कुछ देख रहा था.  अब उसकी पकड़ शुरू हुई और वो सख़्त तरीन बीमारी में मुब्तेला हुआ जिसकी तकलीफ और सख़्त अज़ीयत आज तक क़ायम है.  फिर आज के हाकिम मोदी के जैसे उसकी अक़ल पे भी पत्थर पढ़ गए और उसने कॉग्रेस से गद्दारी कर डाली.   

एन.सी.पी का साबिक़ वज़ीर राणा पाटिल और उसके वालिद साबिक़ वज़ीरे दाखला महाराष्ट्र पद्मसिंह पाटिल इन दोनों के साथ काम करने के शर्फ़ इस ख़ाकसार को हासिल हुआ है.  जिसका ज़िक्र कई मज़मूनों में किया जा चूका है जिस अंदाज़ में राणा इस्लाम और मुसलमानों का मज़ाक़ बनाता था फिर इस्लामिक कलमा "माशाअल्लाह"  और इस्लाम में अक्सरीयते अज़वाज का मज़ाक बनाता था वो सब चीज़ें इस सहाफी ने मंज़रे आम की हैं.  आखिर कार उसकी ज़हरीली ज़ेहनियत सेक्युलर ज़ेहनियत पे हावी रही और सितम्बर २०१९ को दोनों बाप बेटे भाजपा में दाखिल हो चुके हैं.   

इस सहाफी की सहाफत में आने के पीछे की वजह भी इस्लाम और मुसलमानों की हक़तल्फ़ी ही है.  इस सहाफी को नमाज़ के लिए रोका जाता था और पद्मसिंह पाटिल ने दाढ़ी काटने को कहा था. नमाज़ पढ़ने पे बोलता था ये सब यहाँ नहीं चलेगा. और दाढ़ी पे बोला या तो दाढ़ी रखो या काम करो.  मेने काम को लाथ मारी और दाढ़ी को इख्तियार किया.  और निकल गया जिहाद फी सबिल्लीहा के रास्ते पे.

एजाज़ ख़ान जैसे लफंगे इस्लाम का नाम बदनाम कर रहे हैं और मुसलमानों की लाशों पे अपना पेट भर रहें हैं.  इसकी गिरफ्तारी भी मोदी, अमित और बीजीपी की एक पोशीदा हिकमत हो सकती है.   ताके ये इंसान मुसलमानों का एतेमाद जीत ले फिर हम इसको मुस्लिम वोट कटुआ के जैसे इस्तेमाल करेगें.  अगर इसको इस्लाम और मुसलमानों से इतनी हमदर्दी है तो ये अपने बारे में काहे को बात करता है.  अगर इसका इख़्तेलाफ़ इस्लाम की या मुस्लिम मफ़ात की निस्बत से था तो अपना नाम बीच में काहे को घुसा रहा है, की मेरे को टिकट नहीं दिया इसलिए में तंज़ीम से नाराज़ हूँ.  मेरा भी इख़्तेलाफ़ रहा असद भाई से लेकिन वो पाकिस्तान और मौलाना की जामात की वजह से रहा ना की अपने मफ़ात की वजह से रहा.   

ये शख्स एजाज़ पिछले दो एक सालों से ज़रा ज़्यादा ही मुसलमानों के हक़ में बयान बाज़ी कर रहा था.  ना जाने क्या वजह थी की इसके किसी भी बयान पे कैफियत तारी नहीं होती थी बल्कि कोफ़्त होती थी.  क्योंकि इसके दिल में गंदगी भरी हुई हो सकती होगी.  जो आज खुल के सामने गई की ये आदमी मुख़ालिफ़ों से मिल के तंज़ीम ऍम.आई.ऍम को तबाह करने की निस्बत से आया था.

जिन हज़रात के खून में मुस्लिम वफ़ा होती है और जो मुसलमानों के हक़ के लिए दीवानों की तरह दिन रात जुस्तजू में लगे रहते हैं उनको ना किसी ओहदे की परवाह होती है, ना दुनियाँ के किसी भी साजो सामान की जुस्तजू और ना ही दुनिया की कोई भी हिकमत (दौलत, रुपया,पैसा, औरत) उनको अपने मक़सद से गुमराह कर सकती है.  

हमारे खून में ही मुस्लिम वफ़ा भरी पड़ी है.  हमारे दादा ऐ बुज़ुर्गवार अंग्रेज़ों के ज़माने में उन्होंने मास्टर्स किया और कानून की पढ़ाई की और अंग्रेज़ों के ज़ुल्म और शिद्दत के खिलाफ १९२०-२५ में वो खड़े हुए.  फिर वालिदे मोहतरम हुकूमत के कारिंदे थे लेकिन कभी कोई भी काम मुस्लिम हक़तल्फ़ी का नहीं किया.  कैबिनेट वज़ीरे सेहत मरहूम महेश जोशी को भरी सभा में उन्होंने ग़लतबयानी पे फटकार दिया था. और तब से उनको भी बोहोत अज़ीयत और तकलीफें दी गईं. 

फिर जिस रूहानी दर से ये सहाफी वाबस्ता है उस दर से ये सिफ़त और रौशनी मिली है की कभी भी ज़ुल्म के खिलाफ ख़ामोशी इख़्तियार ना करो और अपनी कुव्वत के हिसाब से चीख पुकार करो.  हमारे दादा पीर वली कामिल मौलाना अब्दुल बारी रेहमतुल्लाह अलैहे जो अंग्रेज़ों के खिलाफ ख़िलाफ़त तहरीक का एक एहम किरदार थे उन्होंने अंग्रेज़ों के हद दर्जे के ज़ुल्म और सितम के खिलाफ एक फ़तवा जारी किया था, की में मुस्लिम खानसामाओं को हुकुम देता हूँ की वो अंग्रेज़ों के खाने में ज़हर मिला दें, रौज़ा ऐ जज़ा को में उनकी किफ़ालत करूंगा.  उनकी गिरफ्तारी का हुकूम हुआ लेकिन अंग्रेज़ फौजी और सिपाही इस हिन्दुस्तान की सरज़मीं को छोड़ के चले गए लेकिन उनको गिरफ्तार ना कर सके.  जिस अंग्रेज़ अफसर को उनको गिरफ्तार करना था उसको ऐसी कर्मात दिखाई के वो गुलामी में गया और अपने हलफनामे में इस बात को दर्ज की है की उन शख्स के अंदर मेने मसीह ईसा को देखा है.  मेरी इतनी हिम्मत और उसत नहीं के में उनको गिरफ्तार कर सकूं में उनको गिरफ्तार नहीं कर सकता और अपना इस्तीफा अंग्रेज़ी हुकूमत को सौप दिया.  

अंग्रेज़ों ने ख़िलाफ़त तहरीक को कमज़ोर करने के लिए तीन मौलानाओं को फोड़ने की कोशिश की थी जिसमे मौलाना अब्दुल बारी भी थे.  लेकिन उन्होंने किसी भी तरह से अंग्रेज़ी हुकूमत के फैसले को नहीं माना.  कुछ थे उस दौर के उन्होंने दबे अलफ़ाज़ में हामी भर दी और कुछ खुल के अंग्रेज़ी हुकूमत के गुलाम हो गए.  लेकिन मौलाना अब्दुल बारी रेहमतुल्लाह की जुस्तजू जारी रही, चाहे कोई उनका साथ दे या ना दे वो अकेले ही तमाम अवाम पे काफी थे.

ऐसी बात नहीं है की इस खाकसार को फोड़ने की कोशिश नहीं की गई और इसके पास बेहतरीन पेशकश नहीं थी.  २०११ में बोहरी अवाम में खातूनों की खतना के ऊपर लिखे हुए एक अंग्रेजी मज़मून पे हिन्दुस्तान टाइम्स से ऑफर था.  फिर कई बार एडिटर ने बुलाया और उनके साथ काम करने के लिए क़रारदार पे दस्तख़त करने की ख्वाहिश ज़ाहिर की लेकिन गुलामी अब पसंद नहीं थी और ना ही मुस्लिम हक़तल्फ़ी के खिलाफ अब कोई समझौता करना था.  बेरुन मुल्क़ बड़ी प्रेस से ऑफर थे तमाम सुहूलियत फ़राहम कर रहे थे वो भी ठुकरा दिया.  बिल आखिर संघ ने फोड़ना चाहा पहले मज़ाक़ बनाया फिर कानूनी कारवाही की धमकी दी गिरफ्तारी की धमकी जान से मारने की धमकी और आखिर पे पैसे का लालच.  जिसका ज़िक्र इसी ब्लॉग पे अपने अंग्रेजी मज़मूनों में पहले ही कर चूका हूँ.  

हाल ही में कुछ एक डेढ़ साल पहले एक नामचीन मीडिया के सहाफी का फोन आया था और उसने धमकाया आपके आर्टिकल्स आई..अस., आई.पी.अस. ने पड़े और आपके ऊपर एक्शन होने वाली है.  उसकी इस बात को हवा में उड़ा दिया गया और मेने कहा में मोदी जैसे इंसान से नहीं डरता और तमाम आर्टिल्स मोदी को ट्वीट करता हूँ तो  आई..अस., आई.पी.अस.  किस खेत की मूली हैं.   

फिर शुरू हुई फोड़ने की कवायत और बीजेपी से राज्य सभा की पेशकश फिर कांग्रेस से टिकट लेकिन सभी पेशकश ठुकरा दिए गए और सारी लंका को ढहा दिया गया.  मुझको इल्म था की पेशकश कुछ नहीं हैं बस मुस्लिम अवाम के गले पे छूरी चलाने की एक गलीज़ हिकमत है होना जाना कुछ भी नहीं है
  
जो लोग दीवाने हो चुके होतें हैं फिर उनको दुनियाँ के किसी साज सामान का ज़ायक़ा लुफ्त अन्दोज़ नहीं कर सकता क्योंकि वो उस ज़ायक़े का मज़ा चख चुके होंतें हैं जो आबे हायत है.  अब उनको कोई भी चीज़ अपने मक़सद से ग़ाफ़िल नहीं कर सकती.  उसमे एक हैं अम.आई.अम. के रहबर और सालार असादुद्दीन.  आप तमाम से पुर खुलूस इल्तेज़ा है की सिर्फ और सिर्फ पतंग के ऊपर ही भरोसा करें.  वैसे तो बोहोत सी मुस्लिम तंज़ीम महाराष्ट्र में वजूद में गई हैं और सब अपने आपको मुस्लिम मफ़ात और उनके हुक़ूक़ के लिए लड़ने वाली बोलती हैं.  नागपुर हो या बंबई कोई मुस्लिम तो कोई अवाम के विकास की बात करतीं हैं लेकिन उनमे से एक में भी ऐसी क़ुव्वत नहीं है की अपना एक अकेला कारकून भी जीतवा सकें.  सभी तंज़ीमे वोट कटुआ साबित होंगी और वो वोट किसी और का नहीं बल्कि मुस्लिम और अक़लियती वोट काटेगी.   
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नोट:  एक ख़ातून को बोहोत ही आला मुक़ाम पे फ़ाइज़ देख सकता हूँ.  उस ख़ातून के तुफेल में दो शख़्स बोहोत ही आला मर्तबा पाएंगे, बोहोत ही बुलुंद मुक़ाम पे फ़ाइज़ होंगे.  एक को पस्त और अदना मेहनत और मशक़्क़त कर के वो ओहदा हासिल होगा, जबकि दुसरे को बे हद मेहनत, तकलीफ और अज़ीयत के बाद वो ओहदा हासिल होगा.  बिल आखिर तीनों बुलंद ओहदे पे फ़ाइज़ होंगे, इज़्ज़त और रुतबा पायेगें.

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