अज़ीज़
नाज़रीन मेरे हमक़दम साथिओं और मेरे हमख़याल सहाफी दोस्तों,
Zuber Ahmed
Khan
मेरा
आज का मज़मून हिन्दुस्तानी अवाम में बढ़ती हुई फ़िर्क़ापरस्ती और संगीन से संगीन जुर्म
करने की एक आम आदत पे मुश्तमिल है. इस नए दौर
के मोदी के हिन्दुस्तान में अवाम में एक अलग ही ज़हर और हद दर्जे के गुस्से को देख सकता
हूँ. जो गाहे बा गाहे क़त्ल, अस्मतदरी, गिरोह
गरदाना अस्मतदरी, डकैती और तमाम क़िस्म के संगीन जुर्म की शक्ल में निकल कर आ रहा है. मोदी इंतेज़ामिया अवाम के इस क़िस्म की कैफियत को
हलके में ले रही है और दानिशमंदों, सहाफियों, सियासतदाओं की तज़वीज़ पे अमल करने के बाजए
उनपे उलटे तनक़ीद कर रही है. लेकिन अवाम का
इस तरीक़े का बर्ताव और बे पनाह गुस्सा मोदी इन्तेज़ामियाँ के लिए मुज़िर साबित होगा. बोहोत
मुमकिन है की कल मोदी इंतेज़ामिया के खिलाफ ये ही अवाम बगावत कर डाले जो कभी मोदी के
हुकुम के गुलाम होते थे.
यूं
तो २०१७ से ही धीरे धीरे बीजेपी की साख और हिटलर मोदी की बदकारिओं, बदआमालियों, बदअमनी
बीजेपी और हिन्दू दहशतगर्दों के ख़्वातीनों पे ज़िना बिल जब्र और गिरोह गरदाना ज़िना की
वजह से धूमिल होना और गिरना शुरू हो गई थी.
एहम तरीन बात ये है की बीजेपी के कारिंदे और संघ के दहशतगर्द सिर्फ मुस्लिम
बच्चिओं को ही अपनी हवस का शिकार नहीं बना रहे थे बल्कि उन मज़लूम मासूम बच्चिओं में
एहले हुनूद बल्कि आला ज़ात की ब्रहामिन बच्चियाँ भी शामिल थी जिनकी अस्मत रेज़ी की गई
थी. २०१८ से बीजेपी की साख मज़ीद सख़्त तरीन
खराब होना शुरू हो गई थी जो दिसम्बर आते आते पूरी तरह धूमिल हो चुकी थी. उसके ऊपर दिसम्बर उसके बाद जनवरी २०१९ में इस सहाफी
का एनालिसिस जिसमे बीजेपी को १५० और महाज़ को २२० या २५० से ज़्यदा सीटों पे जीतने के
इमकान हरगिज़ नहीं थे. बीजेपी ने अपनी गिरती हुई साख़ को बरक़रार रखने के लिए पार्लियामेंट के इजलास
के इक़्तेदाम पर पुलवामा अटैक करवा दिया. उसमे
भी हिकमत और ज़हानत की बे पहन कमी थी. इधर पार्लियामेंट
का इजलास ख़त्म हुआ उधर अटैक करवा दिया.
अब
कोई इजलास होना नहीं था फिर हो गया इंतेखाब का एलान ऐसी सूरत में अब हगामी इजलास बुलवाने
की कोई भी सूरते हाल नज़र नहीं आ रही थी लेकिन हवा ऐसी बाँधी के हम पाकिस्तान पे हमला
करेगें और पुलवामा का बदला लेंगे. फिर क्या
था जैसा की ये सहाफी हर वक़्त अपने हर मज़मून में बोलता है की जिस चीज़ में पकिस्तान,
कश्मीर, मुसलमान या इस्लाम का नाम जोड़ दो फिर देखो वो चीज़ कैसी अमल अंगेज़ साबित होती
है और हुआ वही इधर मोदी ने पाकिस्तान पे झूठा, फरेबी अटैक किया उधर अवाम की लहर वापिस
से मोदी के फेवर में बनने लगी. लेकिन उसको
भी सख़्त झटका लगा जब इस सहाफी ने पुलवामा हमले को सरकार की ग़फ़लत और नाहीली का नतीजा
बताया और बालाकोट को उस ग़फ़लत और नाहीली निक्कम्मे पन के ऊपर कफ़न डालने की एक हिकमत. इस सहाफी की रिपोर्ट सही साबित हुई और सरकार की
नाकामी, ग़फ़लत और नाहीली यहाँ पर भी साबित हो गई.
जिससे फिर बीजेपी की साख़ धीरे धीरे ख़त्म होना शुरू हो गई.
फिर
क्या था बीजेपी को अपनी ज़मीन खसकते हुए महसूस होने लगी थी और उसको ये यकीन हो चला था
की जो एनालिसिस इस सहाफी ने की है बीजेपी और महाज़ को तक़रीबन उतनी ही सीटें मिलने वाली
हैं. लेकिन मोदी ठहरा हिटलर ज़ेहनियत का बंदा,
बीजेपी और संघ शिद्दत पसंद दहशतगर्दी पे यक़ीन रखने वाले वो कैसे अपनी हार तस्लीम कर
लेते वो भी जब मुक़ाबिल एक ऐसा सहाफी है जो सिर्फ अपने ज़ुबानी वार से दहशत के हर हर्बे
को नेस्त नाबूत कर रहा है और दुश्मन की हर हिकमत यहाँ तक की मिसाइल, बम फ़िज़ाई तैय्यारे,
फौजी हिकमत सब नाकाफी साबित हो रही है और जंग हार के मोहने पे पहुंच गई. फिर बीजेपी ने हस्बे आदत सहारा लिया जालसाज़ी, फरेब
और झूट की हिकमते अमली का और कर दी इन्तेख़ाब में ई.वी.ऍम. की ज़बरदस्त अदला बदली. मक़सद सिर्फ इस सहाफी के एनालिसिस २३० को झूठा साबित
करना था. हम भी ज़बरदस्त तरीक़े से हंस दिए लो
जी फस गया शिकार खुद अपने ही जाल में. चाहते तो हम भी वही थे की बीजेपी आये जिसका ज़िक्र
इस सहाफी ने अपने एक तबसिरे पे पहले ही दे दिया था की हम क्या चाहते हैं और ख़ुदा क्या
चाहता है.
10 April ·
शांति वान्ति कुछ नहीं लेकिन चाहते तो
हम भी यही हैं, की मोदी आये उससे हमारा काम आसान होगा. क्या काम ओर क्यों हम मोदी को फिर से प्रधान देखना चाहते हैं वो सही वक़्त आने पे पता पड़ेगा. जिसको ये पत्रकार अपने एक लेख कुछ नवंबर या दिसम्बर २०१८ में ही साफ़ कर चूका है. बीजेपी की जीत में भी हमारी जीत है और हार पर भी. बीजेपी की जीत में किस तरह से हमारी जीत है वो सही वक़्त आने पे पता पड़ेगा. अब सवाल बड़ा यही है बंदों के चाहने से क्या होगा. अल्लाहा क्या चाहता है वो तो वक़्त ही बताएगा.
Zuber Ahmed
Khan
शांति वान्ति कुछ नहीं लेकिन चाहते तो हम भी यही हैं, की मोदी आये उससे हमारा काम आसान होगा. क्या काम ओर क्यों हम मोदी को फिर से प्रधान देखना चाहते हैं वो सही वक़्त आने पे पता पड़ेगा. जिसको ये पत्रकार अपने एक लेख कुछ नवंबर या दिसम्बर २०१८ में ही साफ़ कर चूका है. बीजेपी की जीत में भी हमारी जीत है और हार पर भी. बीजेपी की जीत में किस तरह से हमारी जीत है वो सही वक़्त आने पे पता पड़ेगा. अब सवाल बड़ा यही है बंदों के चाहने से क्या होगा. अल्लाहा क्या चाहता है वो तो वक़्त ही बताएगा.
Journalist Zuber Ahmed Khan Apr 10
शांति वान्ति कुछ नहीं लेकिन चाहते तो हम भी यही हैं, की मोदी आये उससे हमारा काम आसान होगा. क्या काम ओर क्यों हम मोदी को फिर से प्रधान देखना चाहते हैं वो सही वक़्त आने पे पता पड़ेगा. जिसको ये पत्रकार अपने एक लेख कुछ नवंबर या दिसम्बर २०१८ में ही साफ़ कर चूका है. बीजेपी की जीत में भी हमारी जीत है और हार पर भी. बीजेपी की जीत में किस तरह से हमारी जीत है वो सही वक़्त आने पे पता पड़ेगा. अब सवाल बाद यही है बंदों के चाहने से क्या होगा. अल्लाहा क्या चाहता है वो तो वक़्त ही बताएगा.
जहाँ
मोदी की हिकमत ३१३ की थी वही मालिके हक़ीक़ी ने उसको ३०३ पे रोक दिया और महाज़ को ३६५
दे दिए. और ना ही बीजेपी और ना ही महाज़ ३१३ के उस जादूई अदद शुमार को हासिल
कर पाए, जिसकी बीजेपी और ख़ास मोदी तवक़्क़ो कर रहा था, बल्कि वो हो गए ३६५. और हम भी वही
चाहते थे फिर शुरू हुआ भारत की मज़ीद तबाही और बर्बादी का सिलसिला जो अभी तक नहीं थमा
है.
बिल
आखिर थोड़ी ताख़ीर के बाद इस बात का इल्म हुआ की हम तो सिर्फ जीत चाहते थे और जो बात
मालिक़े हक़ीक़ी पे छोड़ी थी वो ३६५ चाहता था उस हिसाब से हमारी तो जीत हुई ही सही और मालिके
हक़ीक़ी की हिकमत का भी इल्म हुआ. जिस जीत पे
लंगूर खुशी से फूल रहे थे और लँगूरनियाँ जश्न में डूबी थी अस्ल तो बीजेपी की हार थी
और बीजेपी, मोदी के लिए ये जीत उस जैसी साबित हुई जो जीत के भी हार थी. क्योंकि बीजेपी और मोदी दिल से मायूस थे इसलिए नहीं
की उनको इतनी अज़ीम जीत मिली बल्कि इसलिए की इतनी बड़ी जीत कैसे मिली और हम तो कुछ और
ही चाहते थे लेकिन ये क्या हो गया. क्योंकि मोदी को इल्म हो चूका था की वो जीत के भी
हारा है आगे लंगूरों को होगा जो जश्न मना रहे थे.
यहाँ
पे ये बात फिर से साबित हुई फ़िरों, हिटलर, ज़ालिम के चाहने से क्या होता है वही होता
है जो मंज़ूरे ख़ुदा होता है. लाख शैतानी अमलियात
के ज़ोर पे इंसान अपने आपको ख़ुदा तस्सव्वुर करना शुरू कर दे लेकिन जब उसके गले का फंदा
सख़्त होता है तब उसको एहसास होता है जितनी इज़्ज़त और ताक़त कमाई थी दो पल में बर्बाद
हो गई. बे शक जो करता है मालिके हक़ीक़ी करता
है, जो होता है उसी की मर्ज़ी से होता है हमारे चाहने से कुछ नहीं होता. लेकिन तब तक बोहोत देर हो चुकी होगी.
No comments:
Post a Comment