Friday, 11 October 2019

हिंदुस्तान मुर्दों का देश बन; हो गया मुर्दिस्तान


आगरा ११ अक्टूबर २०१९: आज के मज़मून का आगाज़ तीन बड़ी हलाक़तों से करता हूँ.  पहली ख़बर उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर में एक सड़क हादसे में मरने वाले कमो बेश १० अफ़राद की हलाक़त के निस्बत से है.  ७ की शिनाख्त हो चुकी है हलाक़शुदा अवाम में १ खातून और ३ मासूम बच्चे भी शामिल हैं.  ये सभी जम्मू से वैष्णोदेवी मंदिर की ज़ियारत कर के लौट रहे थे.  मोहनपुरा के इन ५६ ग्रुप वाले अफ़राद ने तमाम हिन्दू पाकीज़ा जगहों की ज़ियारत का सिलसिला शुरू किया था.  ज़ियारत का ये सिलसिला ०३ अक्टूबर को शुरू हुआ था.  बरोज़ जुमे को वापसी में ये लोग गाँधी घाट के नज़दीक आगरा मुरादाबाद हाईवे पे सुब २.३० बजे पहुंचे और आराम की नियत से वही रुक गए.   थकान की वजह से सभी ज़ायरीन बस से उतर के फर्श पर ही सो गए.  ४ बजे एक तेज़ रफ़्तार आती हुई बस उन सब को कुचल के चली गई.  इस हादसे में एक ही खानदान के ४ अफ़राद को मिला के कुल १० अफ़राद जांबाहक हुए हैं.  

दूसरी ख़बर हादसे से नहीं बल्कि क़त्ल से जुडी है बरहाल है तो हलाक़त ही और इस सहाफी के मुर्दिस्तान के फलसफे को मज़ीद सख्त कर रही है. त्रिपुरा में एक १५ साला मासूम नवी जमात के तालिबे इल्म को उसके हॉस्टल वार्डन ने इस क़दर पीटा की वो हलाक हो गया.  खबर होली क्रॉस स्कूल के १५ साला हैप्पी दुब्बारामा की हलाकत से जुडी हुई है.  मक़तूल की वालेदा राजमाला दुब्बारामा ने इलज़ाम तराशी की है की उसके फ़रज़न्द की हलाकत के लिए हॉस्टल वार्डन बुलचंग हालम ज़िम्मेदार है.  बक़ौल राजमाला उसके बेटे को २५ सितम्बर को दुर्गा पूजा में जाने की वजह से पीटा गया था.  राजमाला के कहने के मुताबिक़ हैप्पी को उसकी तबियत ख़राब होने की शिकायत पे २ अक्टूबर को हॉस्पिटल में दाखिल किया गया था.  और ६ अक्टूबर को वो हलाक़ हो गया.  पुलिस मज़ीद मामले की तहक़ीक़ात और राजमाला के दावों की सच्चाई की तफ्तीश कर रही है.  अभी तक किसी भी अफ़राद की गिरतारी नहीं हुई है.  हादसे में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आना बाक़ी है फील वक़्त ज़ख्मो या अंदरूनी मार के कोई सबूत नहीं मिले हैं.

तीसरी खबर बेरुन मुल्क़ हलाक़ होने वाले हिंदुस्तानी के ऊपर मुश्तमिल है.  जो इस सहाफी के इस दावे को मज़ीद पुख़्ता करती है की हिन्दुस्तानी अब बेरुन मुल्क़ में भी मेहफ़ूज़ नहीं रहे.  २०१४ के बाद आम हिन्दुस्तानी भारत को छोड़ के बहार के मुल्कों में बड़ी तादात में जा रहे है.  इस खबर को मज़ीद दो हिस्सों में तक़सीम करेंगे एक तहाफुज़ और दूसरा मौत के डर से जो हिन्दुस्तानी भाग रहें हैं मौत उसके पीछे पीछे उनके पास तक पहुंच जा रही है.

पहले हिस्से में बात करतें हैं मध्य प्रदेश के छतरपुर की सॉफ्टवेयर इंजीनियर प्रज्ञा पालीवाल की जो थाईलैंड में एक सड़क हादसे में हलाक हो गई.  प्रज्ञा की जसत की घर वापसी के लिए दिक़्क़तें पेश आ रही हैं.  इस सिलसिले में वज़ीरे अज़ाम और वज़ीरे ख़ारजा से मदद मांगी गई है.  वज़ीरे ख़ारजा जय शंकर ने इस मसले पे ट्वीट किया है की भारतीय सफारत ख़ाना मरहूम के रिश्तेदारों से राब्ता क़ायम किये हुए है.  प्रज्ञा पालीवाल की ११ अक्टूबर को थाईलैंड के फुकेट शहर में एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी. रिश्तेदारों के पास पासपोर्ट ना होने की वजह से जसत की घर वापसी में ताख़ीर हो रही है और कोई भी बेरुन मुल्क ना जा पाया.

ऐसी ही खबर का दूसरा रुख देख लेते हैं.  पालीवाल हादसे का शिकार हुई वही दूसरी जानिब तहफूज़ के खौफ से परेशान  अमेरिका के केरलीफोर्निया में सेंट क्रूज़ में भारत का टेक्नोलॉजिस्ट तुषार अत्रे ३ ओक्टोबर को अगवाह कर के मौत के घाट उतार दिया गया.  उसकी जसत बी.ऍम.डब्लू से मिली थी.  पुलिस के मुताबिक़ डिजिटल मार्केटिंग कंपनी के मालिक तुषार अत्रे को उनके बंगले से किसी ना वाक़िफ़ अनासिरों ने अगवाह कर लिया था और उनको क़त्ल कर दिया.    पुलिस ने क़त्ल की वजह डकैती और लूट पाट को बताया था.
सहाफी जुबेर का हालाते हाजरा पे नज़रिया

मुगलिया सल्तनत में जो कभी सोने की चिड़िया तस्सव्वुर किया जाता था आज के इस दौरे ज़ाफ़रानी में हिन्दुस्तान बन गया है मुर्दिस्तान.  हर रोज़ २० से २५ लोगों की हलाकत की खबर अगर ख़बरनामे में शाया ना की जाए तो वो दिन सबसे मेहफ़ूज़ माना जा सकता है. ये तो वो मौतें हैं जिनपे सहाफियों की नज़र पड़ी और वो बन गई खबरनामे की सुर्खियां ऐसी पोशीदा और ना वाक़िफ़ मौतों का तो तज़किरा भी नहीं होता जिनको किसी भी खबरनामे में मेहफ़ूज़ न किया जा सका होगा.  और ऐसे लोग बगैर हुकूमत के गौर और फ़िक्र के शमशान की ज़ीनत बन जाते होंगे. 
 
बिल आख़िर क्या नतीजा अखज़ किया जाए आसमानी आफ़ात हों हादसे हो या बढ़ती हुई क़त्ल खून रेज़ी की तादात उसमे हुकूमत को आप हज़रात किस जानिब पाते हैं.  क्या आपको नहीं लगता हुकूमत से कुछ तो गलत हो रहा है.  किया वजह है क़ायनात का निज़ाम एक दम तबाह कुन नतीजे पे पहुंच गया और मालिक़े हक़ीक़ी सख्त नाराज़ दिख रहा है.  कुछ तो गलत हुकूमत से भी हुआ होगा.  जो बरसात कभी किसानों को सुकून और अवाम को राहत फ़राहम करती थी वो काहे को खौफ ज़दा करने लगी.  बिहार हो या महाराष्ट्र, उत्तराखंड हो गुजरात सभी जगह खूब बरसे बादल और तबाही का मंज़र आप खुद ही देख सकतें हैं.  

मालिके हक़ीक़ी ने इस दुनिया का निज़ाम हक़ और इन्साफ करने वालों के लिए सुकून और राहत के रूप में और ना इन्साफ, ज़हरीले, फ़िरक़ापरस्त, दोगले, दहशतगर्द, ज़ालिम, शिद्दत पसंद लोगों के लिए तबाही और बर्बादी के रूप में बना दिया है.
इस तरह की तबाही वाली बरसात शायद जब से इस सहाफी ने होश संभाला है नहीं देखी होगी.  और अगर देखी है तो वो सिर्फ और सिर्फ अज़ाब की शक्ल में देखी है जो आज कल हिन्दुस्तान के ऊपर बरस रहा है.  ये अज़ाब ही है.  अब चाहे लंगूर और लँगूरनियाँ संबित और और पंडित के साथ मिल के कश्मीर के सहाफी का मज़ाक़ बनाएं लेकिन सच्चाई से कब तक मुँह छुपाओगे अब बात सिर्फ हिन्दुस्तान की नहीं रही अब जहाँ जहाँ हिन्दुस्तानी अवाम है ख़ास हिन्दू और मुनाफ़िक़ हलाक़ हो रहे हैं.

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