Tuesday, 15 October 2019

बेशक मज़्ज़म्मत ज़रूरी है, लेकिन वक़्त,मुल्क़ और इंसान सही नहीं है.


ऐ.आई.ऍम के सरबराह जनाब असदुद्दीन ओवेसी की एक अवामी तक़रीर देख रहा था  जिसमे वो मुर्शिदाबाद में हलाक़ हुए एक संघ के दहशतगर्द की मौत की मज़्ज़म्मत कर रहे थे.  बिलकुल सही और दुरुस्त है और ये सहाफी असद भाई की बात की ताईद करता है.  लेकिन उनके बयान में थोड़ी तरमीन करना चाहता है.  उनके मज़्ज़म्मत और एहतेजाज की इज़्ज़ात करता हूँ लेकिन ऐसा मज़्ज़म्मती बयान देने का वक़त, मुल्क़ और शख़्स सही और दुरुस्त नहीं है.  अब जो मुल्क जंग की अज़ीयत झेल रहा है, ख़ाना जंगी चालू है हर जानिब बदअमनी है, इन्तेशार है ख़ालफ़शार है खूं रेज़ी है फिर ऐसे मुल्क में एक दहशतगर्द की मौत पे मज़्ज़म्मत कुछ मायने नहीं रखती है.   फिर ये सवाल दीदी से करने के बजाये मोदी इंतेज़ामिया और हुकूमत से करना होगा की आप लोगों ने मुल्क की क्या हालत कर दी.  हर जानिब मौत का बरहना खेल हो रहा है और ये सब आपकी जालसाज़ी और धोकेबाज़ी से इक़्तेदार हासिल करने की वजह से हो रहा है. 

दूसरी बात ये तो जंग है और जंग में जब दो फौजी आमने सामने आतें हैं तो एक दुसरे की मौत वाक़ेय होना एक आम बात है.  आप किस किस की मौत की मज़्ज़म्मत करेगें.  और कितनी लाशों की मज़्ज़म्मत करेंगे.  फिर ये जंग किसी और ने नहीं बल्कि खुद भारत की जानिब से शुरू की गई है.  २०१९ का वो पार्लियामेंट का इंतेखाब तो आपको मालूम ही होगा, जिसको जंग का रंग दे कर लँगूरनियाँ सख्त तरीन ज़हरीली ज़ुबान और बयान बाज़ी कर रही थी.  

आज पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव (पीएमसी) बैंक के खाताधारक संजय गुलाटी की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई.  उनके कुछ ९० लाख रूपये बैंक में जमा थे.

वहीँ दूसरी जानिब सूबे मध्य प्रदेश के बैतूल में अलोक वर्मा एक बैंक मैनेजर की गाडी के अंदर मौत वाक़े हो गई.  अलोक हाईवे पर बेफिक्र होकर कार चला रहे थे की पलक झपकते ही मौत ने उनको अपनी आगोश में ले लिया.  अलोक अपने तीन मुलाज़िमों के साथ अपनी कार से मुलताई जा रहे थे. तीनों में बातचीत का दौर चल ही रह था कि यकायक एक बड़ा पत्थर चलती कार की छत फाड़ता हुआ अंदर घुसा और कार चला रहे बैंक मैनेजर अशोक वर्मा के सिर पर आ गिरा. पत्थर इतनी तेजी से अशोक के सिर पर गिरा की उनका सिर फट गया और मौके पर ही उनकी दर्दनाक मौत हो गई.   वही आज उत्तराखंड में टेहरी में एक सड़क हादसे में ८ अफ़राद जहांबाक हो गए.  

तीसरी बात मोदी इन्तेज़ामियाँ और दहशतगर्दों को बोहोत ही ग़ुरूर और तकब्बुर आ गया था की हम एक्तेदार में आ गए तो जो मर्ज़ी में आएगा वो करेगें.  खूब ना इंसाफ़ी, ख़ूंरेज़ी, बदअमनी, अस्मतदरी और तमाम तरीक़े के हर उस जुर्म को करेगें जो हुकूमते के ज़ेरे इंतज़ाम दहशत की फेहरिस्त में आता है. फिर इस बार २०१४ से भी ज़ाइद सीटें बीजेपी को उनकी जालसाज़ी वाली हिकमत पे मिली.  बीजेपी को लगा की अब हम तो हाकिम हो गए और मोदी अपने आपको खुदा समझने लगा.  लँगूरनियाँ और लंगूर खुशी से रक़्स करने लगे.  लँगूरनियाँ स्टुडुयों में ही बरहना हो गई और खूब अपने खाकी जांघिये (चड्डी और ब्रा) का खुल के मुज़ाहेरा करने लगी.  उनको महसूस हो रहा था की अब तो फतह और जंग उनके हक़ में ही होगी और मोदी तमाम खित्ते को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील कर देगा.  फिर मोदी और तमाम हिन्दू शिद्दत पसंद फारस से बर्मा बॉर्डर तक भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का वो ख्वाब देखने लगे जो कभी मोदी ने देखा था और जिसके हाकिम कभी आलमगीर औरग़ज़ेब रेहमनतुल्लाह होते थे.

इन सभी अफ़राद ने अपने दिल की कर ली लेकिन ये लोग भूल गए थे की इनके ऊपर भी एक ताक़त बैठी है जो सही वक़त पे बराबर ज़ालिमों, क़ातिलों, दशशतगर्दों, ना इन्साफ हाकिमों को जवाब देती है. फिर शुरू हुई जंग और इस बार अज़ीयत बर्दाश्त करने की बारी हिटलर मोदी, दहशतगर्द अमित और तमाम उन अफ़राद की थी जो कभी मुस्लिम, क्रिस्टी और दलित अवाम के ऊपर जब्र और शिद्दत करते थे. 

फिर तमाम हिन्दू शिद्दत पसंद अपनी जालसाज़ी पे काबिज़ होने की हिकमत को कामयाबी मान रहे थे, नहीं हरगिज़ नहीं, तुमको पार्लियामेंट में ३६५ सीटें तुम्हारी जालसाज़ी की वजह से नहीं मिली हैं बल्कि वो तो तुमको मालिके हक़ीक़ी ने दी हैं.  ताके तुम ये जान सको की पार्लियामेंट में ३/४ अक्सरियत होते हुए मुल्क में हिटलर के जैसे ज़ालिम बादशाह काबिज़ होते हुए, मुल्क का कमो बेश पौने हिस्से पे सिर्फ हिन्दू दहशत का कब्ज़ा होते हुए अक्सरियत अवाम दहशत की हामी होते हुए सिर्फ पाव हिस्सा ही उसका रह गया हो जो दहशतगर्दों, ना इन्साफ, ज़ालिम, जालसाज़, फिरकापरस्तों से जंग करतें हैं फिर भी हार अक्सरियत की ही होती है ना की अकलियतों की होती है, और अकसरियत ये बा खूबी जान सके की बावजूद तमाम कुव्वत, ताक़त, आला किस्म का फौजी अमला इक़्तेदार भी तुमको अपने दिल की नहीं करने देता है.  

क़ादिरे मुतलक़ तुमको दिखाना चाहता था इतनी अज़ीम अक्सरियत के बाद तुम तुम्हारी गफलत, नाकामी और नाहीली का ठीकर किसी और के सर पे ना रख सको की हम इक़्तेदार में ना थे हम अक्सरियत में ना थे हमारे पास राफेल ना था इसलिए भारत की ये हालत हुई और हम जंग हार गए.  इसीलिए महाज़ को ३६५ कर दिए, जबकि मोदी और बीजेपी तो ३१३ चाहते थे. और क़ादिरे मुतलक़ ना तो अज़ीम फौज से और ना ही अक्सरियत से और ना ही ज़ुल्म से ना ही तुम्हारी दौलत और इख़्तेदार से मुत्तासिर होता है वो अगर किसी चीज़ से मुत्तासिर होता है तो वो है हक़ और इन्साफ की आवाज़ बुलंद करने वाले अलमबरदार से और वही आज हिन्दुस्तान के साथ हो रहा है.  जो इलज़ाम कभी संघ, बीजेपी और शिद्दत पसंद हिन्दू अफ़राद ने पाकिस्तान की निस्बस्त से लगाए थे और उसको बदनाम किया था सिर्फ और सिर्फ गलीज़ ज़ेहनियत इख्तियार कर के अब वही सब हिन्दुस्तान के साथ हो रहा है.  

हिंदुस्तान, भारत या इंडिया में हर रोज़ २५ से ३० अफ़राद जहांबाक हो रहे हैं.  कभी कभी ६० से ७० हो जातें हैं तो कुछ दिनों तक कोई हादसा नहीं होता.  बिल आख़िर २५ से ३० का अदद शुमारी हर रोज़ की पूरी हो रही है.   और कभी कभी आंधी तूफ़ान कुदरती क़ेहर के चलते ७०० से ८०० या १००० तक मारे जातें हैं. 

No comments:

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...