लखनऊ
१९ अक्टूबर २०१९ बरोज़ जुमे को भरी दोपहर दिन में कुछ २ बजे के आस पास हिन्दू शिद्दत
पसंद और दहशतगर्द कमलेश तिवारी की गर्दन क़लम कर दी जाती है. भरी दोपहर सरे अवाम सर क़लम करने की इस वारदात से
तीन चीज़ें अपना नुमाया किरदार अदा कर रही हैं.
१. इस क़त्ल से अवाम बदहवास है और आम शहरी को अपने तहफूज़ज
की फ़िक्र होने लगी है.
२ वही शिद्दत पसंद हिन्दू और इस दहशतगर्द के मुवाफ़िक़
सख्त गुस्से और इश्तियाल में हैं.
३.
तीसरी और सबसे एहम और ख़ास बात पुलिस की तफ्तीश तहक़ीक़ात और इस वारदात पे प्रेस और मीडिया
को खिताब करने की हिकमत है.
जहाँ
उत्तर प्रदेश के डी.जी.पी. इस क़त्ल को मुस्लिम अवाम से जोड़ के देख रहें हैं वही इस
सहाफी ने भी अपनी तहक़ीक़ात की है लेकिन उसकी तहक़ीक़ात पुलिस से हट के है. जिसमे उसने पाया है की ये क़त्ल आपसी रंजिश, ज़मीन जायदाद और अज़वाजी
ज़िन्दगी (घरेलू झगडे) से जुड़े हुए मसले की वजह से हुआ है. इस क़त्ल का २०१५ में दहशतगर्द के प्रोफेट सल्लम
के शाने मुबारक में दिए हुए किसी भी बयान से कोई ताल्लुक़ नहीं है.
उत्तर
प्रदेश पुलिस के इतनी जल्द बाज़ी और उजलत में की खोकली और झूटी बयानबाज़ी से दो बातें
वाज़े हो जाती हैं. एक उत्तर प्रदेश पुलिस ने
प्रेस कॉन्फ्रेंस किसी दबाव और सख्त एहतेजाज के बाद अन्नान फानन मुनक़्क़िद कर ली. दूसरी बात उत्तर प्रदेश पुलिस जिसके काम पे हर वक़्त
सवालिया निशान लगते रहें हैं वो कब से इतनी महारत हासिल हो गई और उसका मिज़ाज कब से
इतना दुरुस्त हो गया की क़त्ल हुए २० घटें भी नहीं गुज़रे की ३ मुजरिमों को गिरफ्तार
भी कर लिया उनके काम काज का ठिकाना भी तलाश लिया और उनसे जुर्म भी क़ुबूल करवा लिया. कमाल है.
इस
सहाफी की टीम ने जो तहक़ीक़ात में पाया है उसका लब्बो लुबाब ये निकल के आ रहा है की फ़िज़ा
को मज़ीद ख़राब कर के फ़िरक़ावारना ज़हर और आलूद की अक्सरियत को बड़ा के बाबरी मस्जिद के
हक़ में अगर सुप्रीम अदलिया का फैसला आता है तो सख़्त तरीन फसाद बरपा करने की साजिश है. और ये आलूद इसी वजह से हिन्दू शिद्दत पसंदों के
दिलों दिमाग में भरा जा रहा है और मसले को गलत रंग दे कर पेश किया जा रहा है.
दफा
३७० मंसूख करने के बाद और चंद्रयान की नाकामी के बाद जो कुछ भी हालात बने थे उसके बाद
इस सहाफी ने अपने ताज़ियात और मज़मूनों में खुल के इस बात को मन्ज़रे आम किया था की अभी
ज़ाफ़रानी दहशत दो और हर्बे खेलेगें लेकिन वो सुतली बम साबित होंगे और उनके असरात बिलकुल
कम या ना के बराबर नुमाया होंगे और कुछ ज़्यादा नुकसान नहीं होगा. इसके बाद एक हरबा और खेला जाएगा और वो तो इससे भी
और कमोज़र साबित होगा.
इस
दहशतगर्द की गर्दन क़लम करने में किसी भी मुस्लिम अवाम या मुस्लिम तंज़ीम का कहीं से
कहीं तक कोई हाथ नहीं है. फिर भी अगर पुलिस
के पास ठोस सबूत हैं तो आफ आई आर दिखाए और मुजरिमों को केमेरे के सामने ले कर आएं. उनके एहले खाना से बात चीत करवाए. अब अपनी मज़ीद फजीहत और बदनामी से बचने के लिए हो
सकता है किसी भी मासूम को पकड़ कर आधी ईरान की आधी पाकिस्तान की बात कर के कट पीस कर
के मीडिया में शाया कर दें की देखो हमने क़ातिलों के एहले खाना से बात चीत की और वो
इस हमले से सख्त नाराज़ हैं और वालिद क़ातिल को अपना बेटा तस्सव्वुर नहीं करना चाहता,
बीवी शोहर और भाई उसको भाई नहीं मानता है क्योंकि उसने एक क़तल किया है. लेकिन ऐसी हिकमत का भी पोशीदा राज़ हमें पता है.
जब
तमाम ततबीर ना काम साबित होंगी और साल दो साल गुज़र जायेगें तब वही बात को धीरे से तश्तरी
में रख के पेश कर दी जायेगी जो ये सहाफी कहता है.
क्योंकि पुलिस की तफ्तीश और तहक़ीक़ात भी वही कह रही होंगी जो इस सहाफी की मालूमात
बोल रही है. फिर पुलिस के पास अपने इल्म में
इज़ाफ़े के लिए कुछ भी नहीं बचेगा.
ज़ाफ़रानी
पार्टी पहले ही अपनी साख़ और ऐतेमाद अवाम के सामने खो चुकी है. फिर अगर इस क़त्ल को किसी मुस्लिम ने अंजाम दिया
है तो मज़ीद ज़ाफ़रानी पार्टी के ऊपर इलज़ाम लगेंगे.
पुलिस की कारगरदेगी के ऊपर भी उंगलिया उठेगी. क्योंकि उस दहशतगर्द को पुलिस प्रोटेक्शन मिला हुआ
था, गनर हर वक़्त उसके साथ होता था, उसका ऑफिस जहाँ क़त्ल हुआ वो शहर के बीच में है कोई
जंगल या अतराफ़ का हिस्सा नहीं है. फिर अगर
उसके क़त्ल की मंसूबा बंदी गुजरात में की गई और उत्तर प्रदेश में अंजाम दे दिया गया
तो गुजरात पुलिस फिर उत्तर प्रदेश पुलिस क्या सो रहे थे. आज की तारीख में मरकज़ गुजरात और उत्तर प्रदेश तीनों
जगह ज़ाफ़रानी हुकूमत है फिर भी वो अपने एक एरिया कमेंडेन्ट को नहीं बचा पाए. अगर ये खून २० से २१ साल के तीन मुस्लिम नौ जवानों
ने किया है तो इस सवाल का जवाब तो अब इंतेज़ामिया और खुद पुलिस को देना हैं. जब २० से २१ साल के तीन नौ जावन तुमहारे इलाक़े में
घूस के तुम्हारे सिपे सालार की गर्दन क़लम करने का ना सिर्फ जज़्बा रखते है बल्कि उसको
अंजाम भी दे देतें हैं तो काहे की हुकूमत कर रहे हो आप लोग. जब आप अपने खुद के एरिया कमांडेंट को नहीं मेहफ़ूज़
कर सके तो आम अवाम को क्या तहफ़्फ़ुज़ दोगे. फिर
३७० पाकिस्तान से जंग लड़ने का अज़्म करते हो.
पहले अपने खुफिया महकमे को मुस्तहकम कीजिये की कोई भी परिंदा पर मारने से पहले
आपको और आपके खुफिया महकमे को खबर हो जाए तब जंग के बारे में सोचना.
हमारे
मज़मून इंतेज़ामिया और पुलिस दोनों के लिए आगे के हालात का सबक़ होते हैं. लेकिन अफ़सोस पाकिस्तान उससे फ़ायदा उठाता है और आप
हाथ मलते रह जाते हो.
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