Sunday, 25 November 2018

बेगानी शादी में शिव सैनिक दिवाना

बीजेपी के बाद लेखक के लेख की पाखंडिओं और फ़रेबीओ की अगली क़िस्त होगी शिव सेना और उसका सरगना उद्धव ठाकरे.  हाल ही में जिस तरह से शिव सेना ने बीजेपी से रामचंद्र का अपहरण कर के अयोध्या को मराठी माणूस से भर डाला और उत्तरभारतीय मुक्त कर डाला उससे शिव सेना की राजनैतिक मंशा साफ़ ज़ाहिर हो रही है.  

बाबरी मस्जिद में जब मूर्तिया रखी गई तब तो शिव सेना का वजूद भी नहीं था.  फिर १९९२ से पहले ये बीजेपी ही थी जिसने अपनी राजनैतिक आकाँक्षाओं को परवान चढाने के लिए रामचद्र नामक सीढ़ी का सहारा लिया था, और आडवाणी प्रधान मंत्री बनने का ख्वाब लिए रथ यात्रा पे सवार हो गया था. फिर २ से लेकर संसद में २८० का आकड़ा भाजपा ने गाहे बगाहे रामचंद्र का नाम ले कर ही पार किया था.  शिव सेना ने भी सोचा होगा जब गुजरात का एक सिंधी और एक चाय वाला रामचंद्र जी के नाम पे समूचे भारत पे राज कर सकता है तो हम क्यों नहीं.

जिस राम चंद्र को राजनैतिक पार्टिया अपने मफ़ात के लिए रोड, गली, नुक्कड़ पे बदनाम कर के अपना उल्लू सीधा कर रहे है, शिव सेना भी उस मानसिकता से अछूती नहीं रही.  शिव सेना ने भी भांप लिया जिसने राम का नाम लिया उसका बेडा पार है.  भले ही राम नाम एकांत में दिव्य शक्ति प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि मिडिया में डिबेट और रोड पे हल करने जैसा मुद्दा ही क्यों न बन जाए.  फिर शुरू की दीगर राजनैतिक पार्टिओं की तरह शिवसेना ने भी राम नाम जपने की कवायत.  लेकिन इस कवायत से ये भी साबित हो गया शिव सेना भी बीजेपी की तरह पाखंडी और मफ़ात परास्त पार्टी है.  जो अपने राजनैतिक फायदे के लिए उत्तर प्रदेश तो क्या पाकिस्तान भी चली जायेगी, और अगर मराठी माणूस और हिन्दू जनता का एक बड़ा तपका आलमगीर औरंगज़ेब को सराहना शुरू कर देगा तो शिवा सेना उनको भी सराहेगी.  

शिव सेना को अपना जनाधार महाराष्ट्र में खिसकता नज़र आ रहा है, और २०१९ में उसकी क्या हैसियत होने वाली है ये बात भांप ली; उद्धव ठाकरे ने सोचा होगा सदन में महाराष्ट्र से नहीं तो उत्तर प्रदेश से संसद चुन के आ जाए तो अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए उत्तर प्रदेश की जानिब कूच कर दिया.   सवाल शिव सेना की मंशा पे तो उठना लाज़मी है. क्योंकि १९९२ से राम मंदिर मुद्दा बे हद गरमाया है और इतने वर्षो में श्री उद्धव ठाकरे इस तरह से अपने पूरे लाव लश्कर, ताम झाम के साथ कितनी मर्तबा अयोध्या गए.  उद्धव को छोड़ो उनके पिता श्री हिन्दू हर्दय सम्राट बाल ठाकरे अपनी हयाते ज़िन्दगी में कितनी बार अजोध्या गए और राम लल्ला के दर्शन किया.

अब ज़रा पीछे की जानिब चलते है ये वही शिव सेना है जो कभी उत्तर भारतीओं के लिए केहर साबित होती थी.  ना तो उनको बंबई में ठेला लगाने दिया जाता था, और ना ही रोज़गार के दुसरे साधन मोहिय्या करने दिए जाते थे.  उद्धव ठाकरे को ये नहीं भूलना चाहिए जब रेलवे के इम्तिहान थे और राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों पे हमला किया था तब एक प्रेस नोट जारी कर के उद्धव ने कहा था मुंबई किसी के बाप की जागीर नहीं है मुंबई में वही रहेगा जो मराठी अस्मिता की बात करेगा. जिसको सभी प्रमुख अखबारों ने छापा था.  फिर ये वही उद्धव ठाकरे है जो कभी हिंदी भाषा के खिलाफ ज़हर उगलते हुए देखे जा सकते थे और महाराष्ट्र में सभी सरकारी दफ्तरों में मराठी अनिवार्य करने में अव्वल थे.  और अब उत्तर प्रदेश से इतना लगाव की हिंदी में जा के भाषण बाज़ी कर रहे है.

लेकिन यहाँ भी उद्धव ठाकरे की दोहरी मानसिकता नज़र आ गई.  चलिए मान लेते है शिव सेना सुप्रीमो को रामचंद्र की बड़ी ही फ़िक्र है, बात राम की हो रही है और रेल गाड़िया समूचे महाराष्ट्र से भर के जा रही है और उनमे सिर्फ शिव सैनिक सवार है.  तो क्या रामचंद्र को शिव सेना ने महदूत कर दिया. क्या रामचंद्र समूचे हिन्दू समाज के लिए भगवान् नहीं है. अगर है तो शिव सेना ने समूचे भारत से हिन्दू जनता को आने का आहवान काहे को नहीं किया.  फिर महाराष्ट्र से भी सिर्फ शिव सैनिक ही काहे को गए, दीगर हिन्दू क्यों नहीं गए.  फिर अगर वो सभी राम भक्त थे तो उन सभी के गले में शिव सेना का गमछा क्या कर रहा था.  मतलब साफ़ है राम के नाम पे राजनैतिक फायदा लेने की मंशा है.

फिर ठीक है अगर शिव सेना को इतना ही रामचंद्र जी से प्यार है और वो किसी भी प्रकार की राजनीति नहीं कर रहे है तो उनको शिवाजी की प्रतिमा की जगह अरब सागर में रामचंद्र जी की मूर्ती बनवाना चाहिए.  मोदी जी ने अपने भगवान् की मूर्ति गुजरात में बनवा दी.  योगी जी ने अपने भगवान रामचंद्र की अयोध्या में सबसे बड़ी मूर्ती बनवाने का एलान किया है.  तो शिव सेना भी ऐसा ही एलान कर दे, के हम राजशाही का खात्मा करते है और शिवाजी की दासता से छुटकारा पा के उसकी जगह रामचंद्र जी की मूर्ती बनवाने का एलान करते है. क्या उद्धव जी इतना साहस रखते है, क्या उनका प्यार दिखावा और राजनीति से प्रेरित नहीं है.

No comments:

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...