भाग १ से जारी......
उसपे
देवबंदी मौलाना कहते हैं ठीक है ये वतन का मामला है लेकिन हम दुनयावी इंसानो की बात
कर रहे हैं. उसके ऊपर इस पत्रकार ने फिर से
सवाल पूछ लिया. क्या वजह है की सऊदी डे बनाया
जाता है और हर तरह के करतब किये जाते है. फौज
की नुमाइश की जाती है. किंग दुबाई का सालगिरह
बनाया जाता है. और उस रोज़ भूर्ज खलीफा कुम्कुमो और आलीशान रौशनी से सरफ़रोज़ हो जाती
है. उस दिन ना सिर्फ किंग की अवाम बल्कि बेरुन
मुल्क बर्तानिया, और अमेरिका से ख़ास मेहमानो का खैर मकदम किया जाता है. किंग पैलेस में पार्टी होती है जहाँ शबाब, शराब
और कबाब की रौनक होती है. नंगा रक्स होता है.
वो चलता है. ओमानी किंग क़ाबूश का योमे
विलादत भी बड़ी धूम धाम से बनाया जाता है. अभी
तक इस पत्रकार के पास ऐसी कोई खबर तो नहीं है की उस रोज़ शबाब और शराब बहती है, लेकिन
उस रोज़ सामूहिक अवकाश ज़रूर रहता है. लेकिन
एक मिलाद जिसमे नाते रसूल पढ़ा जाता है, फरिश्ते खुद रेहमत बरसाते है और अल्लाह उन तमाम
लोगो को अपनी आग़ोशे रेमत में ले लेता है जो नबी की ऐसी रेहमत वाली मिलाद में शामिल
होते है तो वो गलत है. क्या फलसफा क्या है.
सऊदी
किंग के यौमे विलादत पे जश्न मूननकीद किया जाता है. कभी बेरुनी मुमालिकों के सरपरस्तों के योमे विलादत
में शमूलिया दर्ज की जाती है. जिसमे मगरीबी देशो के सरपरस्त अपनी मगरीबी ड्रेस कोड
के साथ मौजूद होते हैं. ऐसे जलसों पे किसी
भी दानिशमंद और उलेमा को एतेराज़ नहीं होता केक काटे जाते है. मगरिबी
तहज़ीब के गुलाम हो कर बाकायदा मर्द औरत एक साथ केक काटते है. जब सऊदी सफीर एक दुसरे देश के सरबराह की सालगिरह
में शामिल हो सकते है और उनके ऊपर कोई फ़तवा नहीं तो मुसलमान को अपने आका का मिलाद मनाने
के ऊपर फतवे क्या जाइज़ हैं.
कर्नाटक
के एक अधिवक्ता इमरान भाई नए नए मुल्ला बने उनके ऊपर भी इस्लाम का भूत सवार हुआ और
देने लगे ऊल जलूल फतवे. किसी ने उनसे एक टीवी डिबेट में सवाल कर लिया क्या ईद ए मिलाद
बनाना जाईज़ है. तो वो सज्जन कहते है आम तोर
पे हम मौलानाओं की जमात ऐसे विवादित सवालों पे ख़ामोशी इख्तियार करना बेहतर समझती है,
लेकिन अगर मालूमात होते हुए भी जवाब नहीं दिया तो वो मेरी रौज़े महशर में पकड़ का बाइस
बनेगे. ये इमरान भाई कहते है ईद मिलाद बनाना
ना जाईज़ है, क्योंकि जो काम नबी ने अपनी हयाते ज़िन्दगी में कभी नहीं किया उनके बाद
सहाबा ने कभी नहीं किया और जिसका ज़िक्र क़ुरआन और हदीस से साबित नहीं होता तो वो सभी
काम बिदअत हैं और में ऐसी ईद की ना तो मुबारकबाद देता हूँ और ना ही बनता हूँ.
आगे
ये इमरान भाई कहते है जो सिर्फ नबी से मोहब्बत करते है वो ईद मिलाद बनाते है और जो
नबी और अल्लाह से मोहब्बत करते है और उसके एहकाम को मानते है वो नहीं बनाते. मेरा सवाल इमरान भाई से है जनाब आपने नबी की मोहब्बत
और अल्लाह की मोहब्त वाले लोगो की तशरीह कर दी लेकिन कुछ बीच वाले भी है. जो ना तो नबी से मोहब्बत करते है और ना अल्लाह से
बल्कि वो अपनी मुल्क खोवाह वो दारुल हर्ब ही क्यों ना हो उससे मोहब्बत करते है और जशने
आज़ादी, जशने जमूहरिया बनाते है ऐसे लोगो के ऊपर भी फतवा ठोंक दीजिये. जशने ईद मिलाद बनाने वाले बिदअती और जो जशने आज़ादी
वगेरा बनाते है और क़ौमी तराना गाते है उनको क्या कहेगे.
देओबंद
एक बोहोत बड़ा इस्लामिक तालीमी और तहज़ीब का मरकज़ है. इस मरकज़ के तहत कई मदरसे और तालीमी इदारे पूरी दुनिया
में चल रहे है. फिर कभी भी इन्होने अपने मदरसों
में ईद मिलाद का प्रोग्राम मुन्नकीद नहीं किया.
लेकिन देओबंद के मदरसों में भारत में
जश्ने आज़ादी और जश्ने जमूरियत पूरे ज़ौक़ और एहतेमाम के साथ बनाई जाती है. इतना ही नहीं सभी तालिबे इल्मों को कौमी परचम के
नीचे बिठाया जाता है. जो हाल भारत का है वही
पाकिस्तान का है. पाकिस्तान में तो उनके परचम
को ये मौलाना अपने हाथों से लहराते है इनको ऐसा करने से कोई परहेज़ नहीं और ना ही फिर
इनका मज़हब खतरे में पड़ता है. लेकिन अगर ईद
मिलाद की बात आई तो इनका मज़हब खतरे में पड़ जाता है और बिदअत, गुनाह के फतवे लगाने लगते
है. पाकिस्तान, हिन्द, बंगलादेश और रूहे ज़मीन
के किसी भी खित्ते में हो कुछ ख़ास मौलानाओं की जामात जश्ने ईद मिलाद बनाने को बिदअत और मना करते है. क्या ये सऊदी और दीगर मुस्लिम हाकिमो और बादशाहों
के जश्न विलादत और उनके देशो के खुसूसी दिनों के ऊपर कोई आलोचना करने और फ़तवा देने
का जज़्बा तथा हिम्मत,कुव्वत रखते है.
फ़तवा (आदेश):
१. हालत का जायज़ा और तमाम फतवो का आकलन करने के
बाद ये पत्रकार इस नतीजे पे पंहुचा है अगर एक मुसलमान का जशने ईद मिलाद बनाना बिदअत
और गलत है तो दारूल हर्ब जैसे देशो की जशने आज़ादी, जशने जमुरिया, बनाना कौमी परचम को
अपना डीपी बनाना, कपड़ो पे लगाना, कोमी परचम लहराना और कौमी तराना गाना, और ऐसे इज्लासों
में शिरकत वा शमूलियत करना हर उस मुसलमान के लिए हराम है और गुनाहे कबीरा है.
२. ऐसे सभी मुसलमान जो ईद मिलाद को बिदअत और गलत
मानते है. ईद मिलाद की मुबारकबाद नहीं देते,
मिलाद में शरीक नहीं होते, नाते रसूल नहीं पड़ते, ईद मिलाद के जुलूस और इजलास का एहतेमाम
नहीं करते और ना ही शिरकत करते हैं. फिर अगर वो अपने वतन के किसी भी क़ौमी इजलास में
शरीक होते है तो वो गुनाहे कबीरा कर रहे है. ख़्वाह वो वतन दारूल अमन ही क्यों ना हो.
अगर वो गलत है तो ये भी गलत है.
३. जो भी मुसलमान ऐसे किसी भी जश्न में शामिल होते
है और कौमी तराना गाते है, कौमी परचम लहराते है और जुलूस वगेरा में शामिल होते है वो
सब जहनुम्मी है और ऐसी महफ़िलो पे उन मुसलमानो के ऊपर अल्लाह और उसके फ़रिश्तो की लानत
है.
४. ये फ़तवा एक आम दुनयावी मुसलमान के ऊपर लागू नहीं
है. अलबत्ता कौमी तराने के उस अलफ़ाज़ (भारत
भाग्य विधाता) को पढ़ने से बचे.
नोट: १. शहज़ादे सलमान ने अक़ाए इनामदार ताजदारे मदीना के मूल इस्लाम को छोड़, अपना नया इस्लाम मज़हब शुरू किया "मोड्रन इस्लाम" जिसमे शामिल है बेहयाई, नंगा पन तो उसका साइड इफ़ेक्ट भी दिखने लगा है. जिसका जीता जागता सबूत है पत्रकार खगोशी के क़त्ल में सऊदी शहज़ादे का शामिल होना.
२. जब जब मुसलमान इस्लामिक क़ानून की खिलाफ़वरज़ी करेंगे तबाही आएगी. इस मुद्दे पे जल्द ही देखिये लेखक का लेख.
3. Soon English version of this article will be publish on http://autonomousjournalist.wordpress.com

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