Saturday, 10 November 2018

अंगार लगी पिछवाड़े सियाह हुआ दिल...

बीजेपी, हिन्दू आतंकी और कट्टरपंथी हिन्दू, टीपू सुलतान की जयंती पे बवाल मचा रहे है.  हर कट्टरपंथी हिन्दू कांग्रेस के जयंती समारोह के आयोजन पे आग बबूला हो रहा है.  असल में इन हिन्दू कट्टरपंथिओं, आतंकिओं और बीजपी को आग लगी है दिवाली के उस बम और चिराग से जो ६ नवंबर २०१८ को फूटा था और जिसने बीजेपी नामक राक्षस का कर्णाटक से खात्मा कर डाला था.  इस वर्ष का बीजेपी का कर्णाटक में आखिर किला ध्वस्त हो गया और उसको ५ में से सिर्फ एक पे संतोष करना पड़ा.  अब कोई तो वजह चाहिए अपनी हार की ज़लालत और दिल की जलन मिटाने के लिए कोई तो बरनोल रुपी मरहम चाहिए सो टीपू जयंती से अच्छा कौन सा मरहम हो सकता है.  अपने दिल के छालों को दबाने और पिछवाड़े की जलन मिटाने के लिए  बीजेपी, कट्टरपंथी और आतंकी;  कांग्रेस के टीपू की जयंती बनाने के ऊपर निकाल रहे है.   

इन समूचे दिलजलों में मीडिया के कुछ लंगूर भी शामिल है जो दबे लफ़ाज़ में अपना विरोध दर्ज करवा रहे है.  अब इन नपुंसकों को कौन समझाए की आखिर जीत उसी की होती है जो जंग फतह करता है.  कर्नाटका में तुम्हारी ओकात जनता ने दिखा दी रही सही कसर उप चुनाव में तुमको तुम्हारी हैसियत अच्छे से पता चल गई होगी फिर भी बवाल किस के इशारे पे मचा रहे हो, जनता तो तुम्हारे साथ नहीं है, बल्कि टीपू वालों के साथ है.  

ये बीजेपी वाले, कट्टरपंथी और आतंकवादी टीपू की जयंती पे जो बवाल मचा रहे है, ये उन्ही नपुंसक राजाओं के समान है जो अपनी बेहेन बेटीओं की शादी मुस्लिम नवाबो और बादशाहों से सिर्फ अपने राज्य की गरिमा और अपना सम्मान बढ़ाने के लिए कर देते थे.  और जो नहीं करते थे वो ज़लालत और रूसवाई का जाम नौश करते थे जैसे राणा प्रताप, पृथ्वी राज चौहान, शिवाजी भोसले. 

ये बीजेपी वाले, हिन्दू कट्टरपंथी और हिन्दू आतंकी वर्त्तमान में इतिहास दोहरा रहे है कुछ ने अपना मान सम्मान और प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए अपनी बेहेन बेटीयों की शादी मुस्लिम नौ जवानो से कर दी है.  और जिन्होंने नहीं की वह एक हारे हुए नपुंसक राजा की तरह सिर्फ बवाल मचा रहे है और जिस तरह शिवाजी औरंगज़ेब की परछाई से भी डरता था और घबराता था उसको छु भी नहीं पाता था लेकिन अभिमान एक राजा का, तो वो मुगल ख़ज़ाने में रात की तारीकी में लूट मार मचाता था, और सुबह के उजाले में पहाड़ो और गुफाओं में छुप जाता था.  उसको औरंगज़ेब ने पहाड़ी चूहा नाम दिया था.  तो ये लोग भी उन्ही बुजदिल राजाओं के वंशज है. जो सिर्फ बवाल मचाने, लूट मार करने और प्रशासकीय काम काज में अड़चन पैदा करने में यकीन रखते है,  आखिर बाप के गंदे खून और नुत्फे का असर तो औलादों में आता ही है.     

८ नवंबर तक तो एक भी विरोधी नहीं था, लेकिन जैसे ही इस पत्रकार का लेख Worry bells not ending for ruling party.  प्रकाशित हुआ दुसरे ही दिन से सुगबुगाहट शुरू हो गई, मतलब साफ़ है टीपू जयंती का विरोध पहले से ते शुदा कार्यक्रम नहीं था बल्कि हार की ज़लालत की जलन कुछ कम करने का एक बरनोल है.

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