काफिर,
कट्टरपंथी, मुनाफ़िक्स, यहूदी, नसारा नबी अखिरूज़मा की शाने बे कस पनाह में बरजस्ता गाली
गलौच करते है और बदकलामी करते हैं. खैर जब उनको नबी पे यकीन ही नहीं और उनकी अज़मत वो
जानते ही नहीं तो ऐसे लोगो की बातों का हालांकि दिल दुखता है मलाल होता है लेकिन कोई
शिकवा नहीं. लेकिन इस नशिस्त में लेखक कुछ
मुस्लिम मौलानाओं के बारे में बात करेगा जो नबी की अज़मत और अफ़ज़लियत को कम करते है.
कुछ मुस्लिम मौलाना ये फतवा देते हैं नबी सल्लाहो
अलैहे वस्सलम की मिलाद और योमे विलादत बनाना, उस दिन की मुबारकबाद देना गलत है, गुनाह
है और कुछ तो हद से ज़्यादा बढ़ जातें है बोलते है कुफ्र है. उनके हिसाब से जो चीज़ हदीस और कुरान से साबित नहीं
बिदअत है और हर बिदअती जहन्नुमी है.
ये
पत्रकार सभी हिन्दू, यहूदी और ईसाई धर्म के दानिशमंदो और ख़ास निचे लिखे मुस्लिम मौलानाओं
से पूछना चाहता है
१. मौलाना
हसन मियाँ साहब फिरंगी मेहली
२. मौलाना
सईद नूरी साहब (राजा अकेडमी)
३. हज़रत अदनान अब्दुल वाली साहब फिरंगी मेहली
३. जनाब
ज़ाकिर नाइक साहब
३. मौलाना
सर्फुद्दीन इल्यासी साहब
४. मौलाना
जमील इल्यासी साहब
६. मौलाना क़ल्बे सादिक साहब
७. मौलाना
क़ल्बे जव्वाद साहब
८. अधिवक्ता इमरान साहब
की
किसी भी देश के राष्ट्रिय पर्व को बनाना और उसमे शामिल होना जुलूस निकालना राष्ट्रिय
गान गाना, राष्ट्रिय पर्व की मुबारकबाद देना अपने डीपी पे उस देश का झंडा वगेरा उस
ख़ास दिन लगाना गलत है और गुनाह है या जाईज़ है.
मेरा
सवाल उन मौलानाओं से एक दम साफ़ और खुल्ला है जो कहते है नबी की मिलाद बनाना, ईद मिलाद
की मुबारकबाद देना, उस दिन नबी की शान में नाते कलाम पढ़ना, अपनी डीपी पे गुम्बदे खिज़रा का फोटो लगाना गलत है,
बिदआत है कुछ पाक के देवबंदी मौलाना कहते है गुन्हा है और कुछ कहते है मकरूह. अगर नबी की मिलाद बनाना गलत है गुन्हा है तो आप उन
मौलानाओं और मुस्लिम लोगो को क्या कहेगे या उसपे क्या फतवा देंगे जो अपने देश के राष्ट्रीय
पर्व ख़ास भारत के १५ अगस्त और २६ जनवरी को ना सिर्फ बनाते है बल्कि तिरंगा झंडा अपने
कपड़ो, डीपी और कभी गालों पे लगा के फख्र महसूस करते हैं. ये लोग १५ अगस्त और २६ जनवरी को जुलूस, सामूहिक
प्रोग्राम तथा झंडा वंदन में भी शरीक होते है.
फिर ये लोग राष्ट्र गान वगेरा भी पड़ते है.
इस
पत्रकार की एक शिया हज़रात, बोरी और एहले हदीस मौलाना साहब से इस मुद्दे पे तवील गुफ्तगू हुई. इस पत्रकार के सवाल पे तीनो मौलाना कहने लगे की
हमें हमारे वतन से प्यार है और उस प्यार को हम उस ख़ास दिन दिखाते है. फिर एहले हदीस और शिया मौलाना इस पत्रकार को अहमक़
समझ के हदीस और क़ुरआन का मफूम समझाने लगे. हदीस में आया है अपने वतन से और जहाँ रहते
हो उस जगह से प्यार करो. पहली बात तो ये की
ऐसी कोई भी हदीस इस पत्रकार की नज़र से नहीं गुज़री हाँ अगर कोई सही, मुसनद हदीस है,
बुखारी शरीफ की हदीस है तो सर आँखों पे, लेकिन अगरचे ये हदीस भी है तो वो दारुल अमन
के लिए है ना की दारुल हर्ब के लिए. और जहाँ
तक भारत का सवाल है वो दारुल हर्ब है, फिर एक मख्सूस दिन ख़ुशी का इज़हार करना जिसका
हदीस और क़ुरआन में कही भी ज़िक्र नहीं मिलता कहाँ तक जाईज़ है फिर क्या ये इस्लामिक तालीम
की खिलाफवर्जी नहीं है. तो चुप.
दूसरा
सवाल इस पत्रकार ने किया ठीक है आपकी बात मान लेते है, आपका अपने वतन के लिए प्यार
बेहद बढ़ गया और आप प्यार में इतने दीवाने हो गए की आपने कौमी तराना गाया, अगरचे उसमे
कुछ अलफ़ाज़ इस्लाम की तालीम की खुली खिलाफ वर्ज़ी करते हैं (भारत
भाग्य विधाता और ना सिर्फ मुस्लिम बल्कि हर इंसानो के भाग्य का विधाता सिर्फ और सिर्फ
अल्लाह है). कपड़ो पे, डीपी पे, और गालो पे तिरंगा भी लगाया और जुलूस में
भी शामिल हुए. तो अगर ये प्यार किसी मुस्लिम
का अपने नबी के लिए हद से बढ़ जाता है उस नबी के लिए जिनके लिए समूची कायनात कायम की
गई , उन नबी के लिए जिनको दुनिया में भेजना ही मकसद अल्लाह का अपने आपको ज़ाहिर करना
था, उन नबी के लिए जिनकी वजह से आप और हम मुसलमान है और वो अपने प्यार का इज़हार नाते
नबी पड़ के करता है तो क्या हर्ज है, अपनी डीपी पे सब्ज़ गुंबद का फोटो रखता है तो क्या
हर्ज है, जुलूस वैगेरा में शामिल होता है जशने ईद मिलाद मनाता है, ईद मिलाद की मुबारकबाद देता है तो क्या हर्ज है.
भाग २ में जारी है ...
Note:-
1. Soon English version of this article
will be publish on http://autonomousjournalist.wordpress.com
खगोशी की हत्या पे इस पत्रकार का आलोचनात्मक लेख.
See in English

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