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अल्लाह के हैं और उसकी तरफ़ लौट कर जाना है।
मौलाना जमील साहब और उनके अहल ए ख़ाना का बोहोत बड़ा
ज़र्फ़ है जिस हिसाब से मौलाना साहब बयान कर रहें हैं कोई भी दीन दार ऐसा काम नहीं
कर सकता जिसकी रूस्वाई का बोझ ले कर वोह अपने मालिक ए हक़ीक़ी से
मिले। जब उस बच्चे में अल्लाह की मोहब्बत भरी हुई थी वाल्दैन का
फ़र्माबरदार था ग़रीबों का मसीहा था तो अल्लाह ने उनके तमाम गुनाह तो दुनियां में ही
पाक कर दिए होंगे। फिर अपने पास बुलाने से क़ब्ल उनसे ऐसा काम काहे को
करवाएगा जिसका बोझ अपने नेक बन्दे के सर पर हो।
यह तो आला ज़र्फ़ और मौलाना साहब की रूहानियत है जो अपने होनहार बेटे के क़त्ल
को ख़ुदकशी का नाम दे कर उस क़ातिल को भी बचा लिया जिसने उनके इतने होनहार नेक
फ़र्माबरदार अल्लाह से सच्ची मोहब्बत करने वाले फ़रज़न्द का क़त्ल किया। ख़ास पाकिस्तान की फ़िज़ा खराब ना हो जाए। क़त्ल ए आम ना शुरू हो जाए। आप जैसी रूहानी शख़्सियत का पाकिस्तान पर और उम्मा पर बोहोत बड़ा एहसान हैं।
में सहाफ़ी ज़ुबेर और तमाम ऑटोनोमस जौर्नालिस्ट की टीम मौलाना साहब के दुःख में उनके शाना बा शाना खड़े हैं। अल्लाह मरहूम को जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता करे और मरहूम के अहल ए ख़ाना ख़ास उनके वाल्दैन मौलाना तारिक़ जमील साहब और मरहूम के भाई को सब्र ए जमील अता करे। आमीन।
सहाफ़ी ज़ुबेर की क़लम से पैग़ाम ए ताज़ियत
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