अज़ीज़ नाज़रीन,
जब
से इजराइल की दहशत को हमास ने अपने जंगजू से तोला है और उसके आयरन डॉम को पंचर कर के
उसकी हवा निकाल दी है तब से लंगूर लँगूरनियों और ज़ाफ़रानी बरादरी में अंगार ऐसी लगी है की ज़बरदस्त जलन देखने
को मिल रही है। नाज़ेबा कलेमात के साथ हमास
की किरदार कूशी करना अदना दर्जे की झूठी ख़बरे चलाना और इज़राइल के साथ यकजेहदी दिखाना।
इन
सब में अभिसार शर्मा, आदित्य कुमार जैसे कुछ यू ट्यूब के सहाफ़ी हमास को आतंकवादी बोल
कर मुख़ातिब कर रहे थे। लेकिन यू टियूब के वोह तमाम आला ज़र्फ़ सहाफ़ी लंगूर नहीं हैं। कियोंके उनकी ख़बरों में लंगूर लँगूरनियों की तरह
ज़हर नहीं परोसा जाता है।
ठीक
है उनकी अपनी एक सोच है उसके तहत उनको हक़ है की किसी भी मुद्दे पर अपनी राये रखें। अगरचे हमास को वोह आतंकी बोलतें हैं तो भी ऐसे तमाम
आला ज़र्फ़ सहाफ़ी लंगूरों की जमात का हिस्सा नहीं बन सकते जो सदा ही ज़हर परोसने का काम
करतें हैं।
यू टियूब के आला ज़र्फ़ सहाफ़ियों की तहे दिल से इज़्ज़त करता हूँ जिसमे से ८० फीसद तो ब्राह्मण हैं। ख़ास साक्षी जोशी, प्रज्ञा मिश्रा, अभिसार शर्मा, पीयूरेश शर्मा, प्रसून कुमार वाजपाई और बोहोत से नाम हैं जो बग़ैर ज़हर मिलाये हुकूमत की चाटुकारिता किये बग़ैर हक़ीक़त से आगाह करतें हैं इन सब को दुआ।
इज़राइल को अपनी तहक़ीक़ाती तंज़ीम मोसाद की ज़हानत और आयरन डॉम के ऊपर बोहोत ग़ुरूर था। यही इज़राइल अपनी ज़हानत भारत जैसे मुफ़लिस देशों में बेचता था जो ख़ुद अपने अवाम की हिफ़ाज़त नहीं कर पाया वोह दूसरों की हिफ़ाज़त करने का दावा कर रहा था। एक छोटी सी सूई की नोक ने फुग्गे को ऐसा फोड़ा है की उसकी जलन मिटाये नहीं मिट रही है।
इंसानियत
के मुजाहिद "हमास" और जदीद रावण, जल्लाद, दहशत का सरग़ना उर्फ ज़ालिम तरीन
हिटलर राजा नेतन्याहू के माबेन जंग १९वें दिन में दाख़िल कर गया है। यह महसूस किया जा
रहा है कि यह जंग इस बार तब तक ख़तम नहीं होगा जब तक फ़लस्तीन की पाक सरज़मीन से इज़राइल
की दहशत, बर्बरियत, नाइन्साफ़ी ग़ायब नहीं हो जाती है।
दहशत का सरग़ना नेतन्याहू और अमेरिकी इन्तेज़ामियाँ ने सख़्त अज़्म किया है कि जिस तरह उन्होंने आई.एस.आई.एस. की मौजूदगी को ख़तम किया है, उसी तरह वे हमास को भी ख़त्म कर देंगे। कितना अहमक़ाना मुशाहेदा है। बतौर एक मुसन्निफ़ मैं तमाम आलमी बरादरी को कुछ बातें साफ़ गोई से करना चाहता हूं, जिनमें इज़राइल की दहशत उसका आक़ा अमेरिका और सभी भारतीय ज़ाफ़रानी लंगूर शिद्दत पसंद हिंदू भी शामिल हैं, जो हमास को दहशतगर्द कहकर मुख़ातिब कर रहे हैं और उनका मुवाज़ना आई.एस.आई.एस. से कर रहे हैं। आई.एस.आई.एस. और हमास में बहुत फ़र्क़ है।आई.एस.आई.एस. इजराइल की पैदा कर्दा नतीजा था, वे इंसानियत के क़ातिल थे, उनका जंग को ख़तम करने की कोई हतमी मियाद नहीं थी ना ही कोई हद थी। बल्कि मोमीनों के दिल में शक़ वसवसों में मुब्तेला पैदा करना और आलमी बरादरी को इस्लाम की तालीम से गुमराह करना था। जब इराक़ इस्लामीक ममलेकत है तो किस के साथ अपनी ही हुकूमत और लोगों के साथ उन्होंने जंग लड़ी थी।
जबकि हमास फ़लस्तीन की ज़मीन पर इज़राइल के नाजाइज़ क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा है. यह इज़राइल के ७० साल के दहशत, बर्बरियत, नाइन्साफ़ी, ग़ैर क़ानूनी मुक़दमे, फ़लस्तीनी अवाम की नस्ल कूशी के ख़िलाफ़ उसूलों पर मब्नी जंग है। कोई भी आलमी मुमालिक इस पाक जंग की मुवाज़ना दहशतगर्दी से नहीं कर सकता।
जैसा
कि अमेरिका, इजराइल और भारत का मानना है कि इजराइल के लोगों को दिफ़ा का हक़ है, वही
उसूल फ़लस्तीन के अवाम पर भी लागू होना चाहिए जो ७० सालों से अपनी ज़मीन से बेघर किये
हुए हैं। फ़िलिस्तीन के अवाम को भी बाइज़्ज़त जीने और अपनी दिफ़ा का पूरा हक़ है।
भारतीय
ज़ाफ़रानी मीडिया में मौजूद और शिद्दत पसंद लोग हमास को आतंकवादी बता रहे हैं और उसकी
तुलना आई.एस.आई.एस. से कर रहे हैं। हमास की हिकमते अमली आई.एस.आई.एस. जैसी नहीं हैं, बल्कि
आर.एस.एस. और सभी ज़ाफ़रानी शिद्दत पसंदों की सरगर्मियों की तुलना आई.एस.आई.एस. से की जा सकती
है।
ज़ाफ़रानी
दहशत और आई.एस.आई.एस. के बीच काफ़ी समानताएं हैं। दोनों दहशतगर्द तंज़ीमों में सजा देने का
तरीक़ा एक जैसा है. दोनों आम अवाम पर ज़ुल्म करते हैं। दोनों अपनी ही हुकूमत से लड़ रहे
हैं. चूंकि २०१४ के बाद जब भाजपा ने मर्कज़ और २२ सूबों में हुकूमत क़ायम की तो वतन के
अवाम के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने का कोई मतलब नहीं है। मोदी की क़ियादत में हिंदू राष्ट्रवादी
सरकार बनाने का जो भी हदफ़ था वह पूरा हो गया। लेकिन फिर भी संघ और सभी दीगर ज़ाफ़रानी
दहशतगर्द तंज़ीमों ने अक़लियतों ख़ास कर मुसलमानों, ईसाइयों और सिखों पर लगातार ज़ुल्म
किया, उनका क़त्ल और उनकी अनदेखी की। क्योंकि यह ज़ाफ़रानी हिंदू राष्ट्र क़ायम करना चाहते
हैं, इसलिए वे हर हूकूमाती आला ओहदे पर अपने दहशतगर्द लेफ्टिनेंटों की दरअंदाज़ी (घुसपैठ)
कराते हैं। एवान से रिजर्व बैंक तक, अदलिया से सदर ए जम्हूरिया तक, पुलिस से इन्तेज़ामियाँ
तक, चुनाव आयोग से फौज तक। अगर मर्कज़ में आपके मनपसंद आदमी का क़ब्ज़ा है और ज़ाफ़रानी
तंज़ीम है, २२ सूबों में ज़ाफ़रानी रंग में हैं तो आप किससे जंग कर रहे हैं, क्या अपनी
ही सरकार से नहीं, वह दहशतगर्दी है।
आई.एस.आई.एस. की सरगर्मियों की तुलना हमास से करना बेवक़ूफ़ी है। कोई भी आलमी बरादरी आई.एस. की सरगर्मियों
के साथ नहीं था लेकिन रूस, चीन और ज़्यादातर मग़रिब के साथ सभी मुस्लिम मुमालिक फ़लस्तीन
के मुद्दे की हिमायत कर रहे हैं।
जंग
के आख़िर में इसराइल ख़ुद को इस जंग में तनहा पाएगा। क्योंकि यह जंग हक़ और नाहक़, सही और ग़लत,
दहशत और इंसानियत पर मब्नी है। ७० सालों तक आलमी बरादरी गूंगी तमाशाई बन रह
सकती है, लेकिन अब धीरे-धीरे वे मुल्क जो कभी इज़राइल के साथ थे, इंसानियत और फ़िलिस्तीन
के हित का समर्थन करेंगे। फिलिस्तीन के अवाम की ७० साल की क़ुर्बानी और नस्लकुशी बेकार
नहीं जाएगा। आख़िरकार अमेरिका भी इसरायली नाजाइज़ क़ब्ज़े की मुख़ालेफ़त करेगा.
आलमी
बरादरी में से कोई भी कभी भी गूंगा तमाशबीन नहीं बना रह सकता जब उन्हें फिलिस्तीन के
बेगुनाह अवाम पर दहशत की मनमानी का पता चलेगा।
जब
तमाम आलमी बरादरी इजराइल के दहशत पर दहाड़ेगा तब भारत में शिद्दत पसंद हिंदुओं को माक़ूल
जवाब मिलेगा। पहले हिस्से मरहले में मोदी और
तमाम भक्त मंडली इजराइल के साथ खड़ी थी. आहिस्ता आहिस्ता उनकी ताक़त थकान में तब्दील
हो जाती है। पहले ज़ाफ़रानी हुकूमत ने फिलिस्तीन के साथ एकजेहदी दिखाई, फिर मोदी ने ख़ुद
इजराइल को जारहाना बताया और कहा कि वह फिलिस्तीन के लोगों के साथ हैं और इमदादी मवाद
भेजा। धीरे-धीरे भक्त और ज़ाफ़रानी लोग भी इजराइल
के साथ खड़े होने में थकने लगे और मोदी और आलमी
बरादरी की सफ़ों में बैठने लगे। इंसानियत का साथ देने के अलावा उनके पास कोई
विकल्प नहीं बचा है.
सहाफ़ी
ज़ुबेर की पेशकश
No comments:
Post a Comment