Wednesday, 18 October 2023

इनके बारे में भी कुछ बोल दो, ना जिगर ना क़ुर्बानी का जज़बा।

अज़ीज़ नाज़रीन,

भारत का अक्सरियत अवाम मौजूदा हालात में जंग का पसमंज़र और तारीख़ जाने बिना इजराइल की हिमायत में खड़ा है।   यह जंग उसूलों की बुनयाद पर फ़लस्तीन पर इजराइल के नाजाइज़ क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ है।  भारत का अक्सरियत अवाम इज़राइल की हिमायत कर रहा है, भले ही उनकी मज़हबी अक़ाइद हिंदुओं के साथ एक जैसे न हों, इज़राइल भारत का नज़दीकी पड़ोसी नहीं है, और ना ही उनकी मादरी ज़ुबान एक है। यहूदी हिब्रू का इस्तेमाल करते हैं जबकि भारतीय हिन्दी का।  लेकिन फिर भी भारत का अक्सरियत तब्क़ा इजराइल के साथ है क्योंकि इजराइल फिलिस्तीन के लोगों पर ज़ुल्म और दहशत कर रहा है।

मैंने बहुत पहले संन २०१८ में अपने मज़मून में ज़िक्र किया था, जब मोदी के इज़राइल दौरे के बाद बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत का दौरा किया था।  मोदी आठ साल के यहूदी लड़के रब्बी मोशे के लिए रोये, जिसके वालिद की नरीमन हाउस हमले में मौत हो गई थी।  मोदी जी अगर आपको इजराइल के लोगों से इतनी मोहब्बत है, इजराइल से सभी यहूदियों को बुला कर गोवा में बसा दें. १९६१ तक गोवा पुर्तगाली नौआबादी  था। भारत की हुकूमत ने फौजी हिकमत इख़्तेयार करने के बाद इस पर कब्ज़ा कर लिया, जिसमें ३००० से ज़ाइद अवाम हलाक हुए थे। क्या भारतीय वैसा बड़ा दिल दिखा पाएंगे जैसा फ़िलिस्तीन के मुसलमानों ने उखाड़े गए यहूदियों के लिए दिखाया था।

मैं उन तमाम लोगों से सीधा सवाल पूछना चाहता हूं जो इज़राइल की तारीफ़ करते हैं और उसके लिए दर्द महसूस करते हैं।  रोहिंग्या मोहाजिरों, बांग्लादेश, पाकिस्तान या म्यांमार से जाइज़ या नाजाइज़ मोहाजिरों पर उनका क्या कहना है।

अब मेरे सवाल के दूसरे हिस्से पर आते हैं। अगर वोह मोहाजिर आहिस्ता आहिस्ता ज़मीन ख़रीदना शुरू कर दें और तिजारती इदारे क़ायम कर लें, इन्तेज़ामियाँ के मामलों में हिस्सा लेना शुरू कर दें।  इतना ही नहीं बिल आख़िर वे हुकूमत क़ायम कर लेते हैं और भारतीयों पर हुकूमत करने लगते हैं। सिर्फ हुकूमत नहीं बल्कि भारतीयों पर ज़ुल्म, तशददुत भी करना शुरू कर दें। उनकी बिजली, पानी और रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी की कमाई में कटौती करना शुरू कर दें।

मामला यहीं खत्म नहीं होगा, अगर ये पनाहगुज़ीन मोहाजिर नौजवानों को ग़ैर क़ानूनी हिकमत से हिरासत में लेकर, बद नियती पर मब्नी मुक़दमे चलाकर या यहां तक ​​कि बिना किसी वजह के उनको क़तल करके भारतीय अक्सरियत की नस्ल कूशी करना शुरू कर देंगे।  यह काफ़ी नहीं है अगर ऐसे ही हालात ७०-८० साल तक रहें, फिर भारतीय क्या करेंगे। क्या आप अब भी उन मोहाजिरों या जाइज़ ना जाइज़ पनाह गुज़ीनों की हिमायत करेगें। 

फ़िलिस्तीन के अवाम के साथ ऐसा ही हो रहा है। फ़िलिस्तीन के मुसलमान इस्लाम की अपनी तालीम की वजह से हमेशा ज़रूरतमंदों की मदद करते हैं और साइल के लिए बड़ा दिल दिखाते हैं। जब हिटलर ने यहूदियों की नस्ल कूशी किया तो उन लुटे-पिटे और कमज़ोर यहूदियों को फ़िलिस्तीन के मुसलमानों ने पनाह दी थी। कुछ अर्से बाद जब उनमें ताकत आ गई तो उन्होंने शरारत करना शुरू कर दिया और साजिश के ज़ारिये फ़लस्तीन के लोगों की ज़मीन और घर हड़पना शुरू कर दिया। वक़्त के साथ इन कमज़ोर यहूदियों ने इन्तेज़ामियाई मामलों में दखल अंदाज़ी कर हिस्सा लेना शुरू कर दिया और १९४८ में ख़ुद को इस जगह का हाकिम होने का एलान कर दिया और इसे इज़राइल नाम दिया गया।

जब जब फ़िलिस्तीन के लोग उनसे कहा कि हमें इज़्ज़त के साथ जीने की आज़ादी चाहिए तो वे उन पर ज़ुल्म, तशददुत कर रहे हैं। अगर यहूदी बिना किसी आलूद और साजिश के साथ साफ़ हाथों से फ़िलिस्तीन आए थे तो वे फ़िलिस्तीनी हुकूमत के ज़ेरे इंतज़ाम बनाये गए कानूनों का तामील क्यों नहीं करते। वे फ़िलिस्तीन के अवाम की तरह क्यों नहीं रहते और क्यों यहुदिओं ने एक नया मुल्क बनाया की दुसरे उनके बनाये हुए क़ानून के ज़ेरे इंतज़ाम काम करें।

क्या भारत का अक्सरियत तबक़ा जो आज इजराइल की हिमायत में खड़ा है यह सब बर्दाश्त कर पायेगा।अगर हाँ तो क्यों हर इन्तेख़ाब में ज़ाफ़रानी तंज़ीम और दीगर इन्तहा पसंद फ़र्ज़ी ख़बरों से अवाम को डराते और भड़काते हैं, "रोहिंगिया ने वोट किया", "रोहिंग्या आ जाएगा", "हम भारत में मौजूद हर बांग्लादेश या रोहिंग्या को बहार निकाल देंगें"।  अगर आप इज़राइल और इज़राइल के अवाम के मफ़ात की हिमायत करते हैं तो आपको बांग्लादेश, मयंमार और पाकिस्तान के क़ानूनी या ग़ैर क़ानूनी मोहाजिरों और पनाह गुज़ीन अवाम की भी हिमायत करना होगा। 

मुझे नहीं लगता कि भारतीयों ख़ास अक्सरियत हिंदुओं, सहाफ़ियों और हूकूमती नुमाइंदों के पास इतना बड़ा जिगर होगा जितना मुसलमानों के पास है। क्या वे इसराइल के यहूदियों को अपनी ज़मीन दे सकते हैं क्योंकि मुसलमानों ने उनके सबसे बुरे दिनों में मदद के लिए हाथ बढ़ाया था। इसी बात का ज़िक्र साबिक़ पाकिस्तानी क्रिकेटर और कप्तान शाहिद अफरीद ने भी किया है जब वो आलमी कप के लिए भारत आए थे।  लगातार मिल रही धमकियों और ट्रोल के चलते जब शाहिद पाकिस्तान पहुंचे तो उनका तास्सुर भारतीय अवाम के लिए बिल्कुल मनफ़ी था।   उन्होंने सहाफ़ी इजलास में कहा कि भारतीयों के पास पाकिस्तानियों और मुसलमानों जितना बड़ा दिल नहीं है।  भारत के सहाफ़ी, अवाम और खेल की अज़ीम हस्तियां भी पाकिस्तान के लिए ज़हरीला रवैया रखती हैं। उनमे मुसलमानों की तरह क़ुर्बानी देने का जज़बा नहीं है। 

आज भारत की फौज पर सहाफ़ी बड़े बड़े क़सीदे लिखतें हैं।  उनकी क़ुर्बानी का ज़िक्र होता है।  फौज की क़ुर्बानी के मुद्दे पर कई मज़मून लिख चूका हूँ।  फ़ौज को हर काम पर मज़बूत तनख़ा मिलती है।   पेंशन, ग्रेचुटी, घर से ले कर घर के सामान तक हर चीज़ पर रियायत मिलती है।  फ़ायदा तो ख़ूब मिलता है तो यह क़ुर्बानी थोड़ी हुई।  यह तो अदला बदली हो गई।  फ़ौज ने अपनी जान को ख़तरे में डाला  बदले में हुकूमत से तगड़ा फ़ायदा लिया।  फिर जंगी महाज़ पर मरने पर लाखों करोड़ों की मदद उनके वारिसों को मिल जातें हैं।  पेट्रोल पम्प के लिए ज़मीन और ना जाने क्या क्या?

क़ुर्बानी वोह जो अपनी जान को ख़तरे में डाल कर अवाम के लिए काम करे और उसका फ़ायदा ख़ुद ना भोगे।  

सहाफ़ी ज़ुबेर की पेशकश

No comments:

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...