अज़ीज़ नाज़रीन,
लीजिये आ गयी इस सहाफी की तहक़ीक़ाती रिपोर्ट और वोह अपनी हतमी राये रखने के लिए किसी हूकूमती इदारों का ग़ुलाम नहीं है। और ना ही उसको अपनी रिपोर्टिंग शाया करने के लिए किसी ज़ाफ़रानी लंगूर मिडिया हाऊस के एडिटर की इजाज़त की ज़रुरत है। जिस जिस मुद्दे पर लंगूर और लँगूरनियाँ अवाम को गुमराह कर रहे थे हर उस मुद्दे पर सबसे पहली तहक़ीक़ाती रिपोर्ट इस सहाफ़ी ने शाया की बाद में वही चीज़ें मन्ज़रे आम पर आई। चाहे वोह हैदराबाद, सहारंगपुर सिख मुस्लिम दंगा हो, चाहे वोह २६ जनवरी को उठे बवाल का जिसमे एक पवन नाम का आतंकी मारा गया था, चाहे वोह कमलेश की मौत का किस्सा हो चाहे वोह हैदराबाद ज़िना और क़तल का क़िस्सा हो चाहे वोह पठानकोट, उरी और पुलवामा का हमला हो, चाहे वोह दिल्ली हिन्दू दहशतगर्द हमला हो चाहे वोह तब्लीगी जमात पर तोहमत तराशी हो हर मुद्दे पर सबसे पहले तहक़ीक़ाती रिपोर्ट इस सहाफ़ी ने शाया की है जो ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियों से एक दम जुदा होती है। बाद में पता चलता है की इस सहाफ़ी की रिपोर्ट ही दुरुस्त थी। फिर चाहे वोह गुजरात ट्रैन आतिश का मामला हो, चाहे वोह २०१४ से ई वी ऍम टेंपरिंग का मामला उठाने की बात हो। कश्मीर में पत्थर बाज़ों को बदनाम करने का मामला हो।
नाज़रीन हिजाब मुद्दा ज़ाफ़रानी तंज़ीम और उससे मुनसलिक तमाम
दहशतगर्दों की ते शुदा साजिश का नतीजा है।
और यह मसला ५ सूबों में इन्तेख़ाब के देखते हुए ही बोहोत ही बड़े पैमाने पर फैलाया
गया है। हालांकि हिजाब तानाज़िये का आग़ाज़ तो
तब से ही हो गया था जब इन्तेख़ाबी कमीशन ने ५ सूबों में इन्तेख़ाब का एलान कर दिया था। लेकिन उस जिंगरी को हवा आहिस्ता आहिस्ता दी गयी। और जब पहले हल्क़े के इन्तेख़ाब में ज़ाफ़रानी तंज़ीम
को ज़बरदस्त झटका लगा है तब उन्होंने इस मुद्दे को पूरी शिद्दत के साथ उछाल दिया।
अब इन ज़ाफ़रानियों के पास कोई मुद्दा नहीं बचा है, विकास तो
किया नहीं रोज़गार दिए नहीं, मेह्गाई कम नहीं, औरत की अस्मत बची नहीं, जुर्म बड़े हुए
हैं। तो किस मुद्दे पर वोट मांगेगे। रही सही कसर पाकिस्तान, मुसलमान, कश्मीर, मंदिर,
मस्जिद ने भी ठींगा दिखा दिया मतलब अब इन मुद्दों के ऊपर पर अवाम वोट देने को तैयार
नहीं है।
दरअसल एक हिजाब के तनाज़िये को उठा कर उसके कई नफ़े लेने का मक़सद ज़ाहिर हुआ है। पहला मक़सद सियासी नफ़ा लेना है। दूसरा मुस्लिम तुलबात को इल्म की रौशनी से दूर रखना है। जिसके ऊपर इन ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों ने २०१८ से काम का आग़ाज़ किया था। २०१९ में कई मज़मून इस सहाफ़ी ने शाया किये हैं। जिसमे ख़ास है मुसलमानों की तालीम पे ज़ाफ़रानी और शैतानी देहशत.
नाज़रीन जिन ६ बच्चियों को उस्ताद ने हिजाब की वजह से क्लास
से निकाला था और उनका फर्श पर बैठे हुए कॉलेज की सीढ़ियों पर इल्म लेते हुए फोटो सोशल
मीडिया पर वाइरल हुआ था वोह तो सालों से हिजाब में कॉलेज आती जाती थी। कभी कोई दिक़्क़त और परेशानी नहीं हुई, लेकिन क्या
वजह है की इन्तेख़ाब का ऐलान होते ही एक दो दिन के अंदर हिजाब तनज़िये को हवा दी गयी
और उस कॉलेज की ज़ाफ़रानी तंज़ीम बीजेपी की इन्तेज़ामियाँ ने उन बच्चिओं को क्लास में हिजाब
में दाखिल होने से रोका।
अब हुकूमत ने नोटिफिकेशन नाफ़िज़ कर दिया है, फिर जिन मुस्लिम बच्चिओं को हिजाब पहनने की आदत है उनको इल्म और हिजाब में से किसी एक का इन्तेख़ाब करना होगा। क्या यह ज़्याती नहीं है और तुम बड़े औरतों के मुहाफ़िज़ बने फिरते हो, तुम तो उनको लाइल्मी के अंधेरों में ग़र्क़ाब कर रहे हो।
तीसरा शिकार भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है। जिसका ज़िक्र उत्तराखंड के वज़ीरे आला की ज़ुबान पर
आ ही गया। दिल की बात ज़ुबान से निकल ही गयी। उत्तराखंड के वज़ीरे आला पुष्कर धामी एक आवामी जलसे को ख़िताब करते हुए कहतें हैं की अगर हम इक़्तेदार में आये तो एक सां क़ानून नाफ़िज़ करेगें। तो गुजिश्ता इन तमाम सालों में आपने क्या किया अभी
तक कुछ नहीं किया तो इन्तेख़ाबी मरहले में आपको ऐसी नाज़ेबा और वाहियात बातें क्यों याद आई।
और जिस बात का ख़दशा था हुआ वही। आ आई बीजेपी अपनी असली औक़ात पर अपनी दहशतगर्दाना हिकमते अमली ले कर। इन लोगों ने भारत को जब कुछ ना बना सके तो तमाशा बना दिया। चलो कर लो यह हसरत भी पूरी। संघी जिस जिस बात पर खूब हू हल्ला करते थे कश्मीर से ले कर ट्रिपल तलाक़, फिर हज सब्सिडी से ले कर "का" "NRC" उसके बाद मरकज़ का क़ानून जिसमे दिल्ली में बैठा हुआ एक संघी खाकी दहशतगर्द किसी भी मुस्लिम को आतंकवादी ज़ाहिर कर सकता है। तुम्हारी तो संसद में ३८५ सीट्स थी। राज्य सभा में भी इक़्तेदार से सिर्फ ७ सीट्स ही कम थी। उत्तराखंड, हरयाणा, हिमाचल सभी जगह तुम्हारी ही हुकूमत थी। जिस जिस मुद्दे पर संघीयों ने बवाल मचाया हमने कहा कर लो अपने दिल की। सभी मुद्दों पर लब्बैक बोला है, और हुआ वही जो मेरे मालिक ने चाहा है। तो अभी तक क्या सिर्फ भोंक ही रहे थे चौकीदार महोदय जागते रहो। चलो कर लो अपने दिल की। मतलब तबाही तुम्हारे मुक्क़द्दर में ज़बरदस्त लिखी है।
कुछ लंगूर और लँगूरनियों को हिजाब से ईज़ा हो रही है। तो कुछ दिगम्बर सक़ाफ़त का हवाला दे रहें हैं। में उन तमाम लंगूर और लँगूरनियों से सवाल करता हूँ की तुमको हिजाब से इतनी तकलीफ़ हो रही है तो बॉलीवुड में मुस्लिम नाम से बरहना तसवीरे देतीं हैं। पीछे से पूरी बरहना आगे से फटी हुई तुमको उनसे सवाल करने की हिम्मत तो होती नहीं और चलें हैं जो पोशीदा करने की चीज़ है उसको छुपा रही है तो तनक़ीद करने लगे हो।
फिर हुकूमत कौन होती है किसी के ऊपर कोई ऐसा क़ानून लादने
वाली जिसको करने की किसी शख़्स की मर्ज़ी ना हो।
हुकूमत को औरत को इख़्तेयार करने का हक़ देना चाहिए। एक जानिब मोदी और बीजेपी वाले बोल रहें हैं की मुस्लिम
समाज औरत को बुर्क़े में क़ैद कर के अपनी हुकूमत चलाता है फिर तुम भी वही कर रहे हो। तुम जो हिजाब पहनना चाहता है उससे ज़बरदस्ती छीन
रहे हो मतलब तुम भी वही कर रहे हो, नहीं तो इल्म नहीं हासिल कर सकते। मोदी जी आप तो अपनी मुस्लिम बहनों के मुहाफ़िज़ बनते
हो, तो क्यों अपनी बहनों की मर्ज़ी नहीं संभाल रहे। आप अपनी बहनों को उनकी मर्ज़ी से जीने दीजिये। ठीक है जिसको पहनना है पहने जिसको नहीं पहनना है
नहीं पहने। और जिसको बॉलीवुड की मुस्लिम नामों
से नंगी घूमने फिरने की आदत है वोह नंगी घूमे फिर चाहे तालिबान पर तनक़ीद ही क्यों ना
करे लेकिन उसको भारत में आज़ादी है। '
आज भारत में अडल्ट्री जुर्म नहीं रह गया फिर भी बोहोत सी
ऐसी ख़ातून हैं जो अपने शोहर के अलावा किसी ग़ैर मर्द का तस्सव्वुर भी नहीं कर सकती। अब अगर हुकूमत ऐसा क़ानून बना दे की हर औरत को किसी
भी ग़ैर मर्द से रिश्ता रखना ही होगा नहीं तो राशन नहीं मिलेगा सब्ज़ी नहीं मिलेगी, शॉपिंग
मोल में नहीं जा सकते तो ऐसे ऊल जलूल क़ानून बनाओगे तो बवाल होगा।
फिर हर लँगूरनी को अपने जिस्म की नुमाइश करना होगी अपने सियासी
आक़ा और एडिटर को खुश करना होगा नहीं तो काम नहीं कर सकती ऐसा भी हूकूमती क़ानून नाफ़िज़
कर दो फिर देखो जो लँगूरनियाँ आज हिजाब की मुख़ालिफ़ बन के बैठी है सब ख़ामोश हो जाएगी।
टॉनिक वाली बाई की हेकड़ी एक सेकण्ड में
निकल जाएगी।
इस सब के बावजूद मोदी जी और बीजेपी वालों की सयासी बयानबाज़ी
उससे साफ़ ज़ाहिर हो रहा है की यह मुद्दा जान बूझ कर बीजेपी ने अपने सयासी नफ़े के लिए
पेचीदा किया है। हर इन्तेख़ाबी मरहले में कोई
ना कोई ऐसा मुद्दा ले आतें हैं जिससे वोट का बटवारा हो जाए। लेकिन इस बार हालात बोहोत अलग हैं। तमाम अवाम बीजीपी की हर तरीक़ेकार हिकमते आलमी से
सख़्त नाराज़ है।
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