अज़ीज़ नाज़रीन,
क्या हम २१वी सदी में जी रहें हैं, कभी कभी यह बात सोचने पर मजबूर करती है। हिन्द में रह रहे अकलियतों
ख़ास (मुस्लिम, क्रिस्टी, सिख), दलितों और खुले ज़ेहन, तालीमी आफ़ता बाशिंदों को यह बात अक्सर सोचने पर मजबूर करती होगी, जब अकलियतों, दलितों
को
उनके बुनयादी हक़ जीने की आज़ादी, तालीम की आज़ादी, मज़हबी आज़ादी से महरूम किया जाए।
नाज़रीन मसला हिजाब या बुर्क़ा नहीं है बल्कि वोह ग़लीज़ और गन्दी ज़ेहनियत है जो जहाँ तहाँ झाका ताकी करते रहते हैं। और दूसरों की पलेट में सदा उनको गाये का गोश्त ही दिखता है और हर बुर्क़े या
हिजाब में उनको मुस्लिम ख़ातून ही नज़र आती है। आज कल हिन्दू भी हिजाब करतें हैं.
नाज़रीन हिजाब पर बवाल हो रहा है तो घूंघट में क्यों नहीं। घूंघट तो हरयाणा, शुमाली सूबा, राजिस्थान, गुजरात में हिन्दू सक़ाफ़त (प्रथा) है। हाल ही सहाफ़ी ग़रीब नवाज़ के उर्स से वापसी में पाली मारवाड़ से ट्रैन में बैठा था। उसने देखा जितनी भी राजिस्थानी ख़ातून थी सभी घूंघट लिए हुए थी। एक ख़ास बात जो नज़र में आई एक ख़ातून जो गुलाबी रंग की साड़ी पहने हुई थी, उम्र में ४० के क़रीब होगी और तालीमी आफ़ता दिख रही थी। एक ज़ईफ़ से शख़्स के साथ सफर कर रहीं थी। शायद उनका ससुर होगा। लेकिन उनका घूंगट काफी नीचे था जबकी वोह उम्र के ४० साल पार कर चुकी थी। फिर वोह ख़ातून आला पाम टॉप पर वीडियो चेटिंग करते हुए, व्हाट्सअप, गूगल सर्च और यू ट्यूब पर नग्मे वग़ैरा सुनते हुए देखी जा सकती थी। मतलब वोह अनपढ़ नहीं थी बल्कि तालीमी आफ़ता दिख रही थी। फिर उन्होंने क्यों इतना बड़ा घूँघट ले रखा था।
दूसरी एक और बात जो देखने में आई वोह यह की जब कभी भी रफा
-ए-हाजत के लिए उनको जाना होता फिर घूंघट उठा कर थोड़ी देर दरवाज़े के सामने खड़ी हो कर
एक तवील सांस लेती जैसे की पुर सुकून हो गयी हों।
या तो उनको क़ैद कर के घूंघट पहने पर मजबूर किया गया होगा या फिर उनको उस हाल
में कोफ़्त होती होगी।
लेकिन किसी भी हज़रात ने उनसे गुफ्तगू करने की जुर्रत नहीं
समझी और ना ही उनसे घूंगट लेने का राज़ पूछा।
सभी उसको एक आम रुझान समझ कर चल रहे थे।
वहीँ अगर कोई मुस्लिम ख़ातून उस हाल में होती तो फ़ौरन संघी भगवा आदेश जारी कर
देते। हज़ार इस्लाम दुश्मन उस ख़ातून के मुहाफ़िज़
बन कर खड़े हो जाते। मशकूक नज़र से उस ख़ातून
और उसके अहले ख़ाना को देखना शुरू कर देते।
पुलिस की गश्त बड़ा दी जाती।
एक बार बेस्ट की बस में सफर करने का शरफ़ हासिल हुआ। मोहम्मद अली रोड से वीटी आना था। मेरे साथ में एक बुर्कापोश बच्ची भी बस में चढ़ी, जिसने मस्तूरातों की सीट पर बैठना मुनासिब समझा। क्योंकि उमूमन बुर्क़ा पोश बच्ची को देख कर संघी, ज़ाफ़रानी, शिद्दत पसंद हिन्दू फितरत का आगाज़ कर देतें हैं। लेकिन जैसे ही वोह बैठी की एक नावाक़िफ़ ख़ातून उस बच्ची से सवाल जवाब करने लगी। किस कॉलेज में हो कौन सी जमात में हो क्या बुर्क़े में तुमको गर्मी नहीं लगती क्या यह बुर्का तुमको किसी दबाव में पहनना पड़ता है या अपनी मर्ज़ी से पहनती हो वग़ैरा। क्या मतलब ऐसे सवालों का और क्यों तुम को बुर्क़े से इतनी हसद और जलन हो रही है। और क्यों तुम सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम ख़ातूनों के मुहाफ़िज़ बन बैठे हो। ट्रिपल तलाक़ पर भी ऐसी भी सूरते हाल थी। तमाम हूकूमती नुमाइंदों से ले कर ज़ाफ़रानी कीड़े (लंगूर-लँगूरनियाँ) तक एक सूर में भोंक रहे थे, बीचारि क्या करेगी क्या खायेगी, कैसे ज़िन्दगी बसर करेगी। मोदी जी अपनी अवामी इजलास में इलज़ाम तराशी करते नहीं थकते थे। मेरी मुस्लिम बहनों और बच्चिओं को जो लोग क़ैद कर के रखते हैं सुन लें उनको तालीम दिलाने से कोई रोक नहीं सकता। उनको उनका हक़ दिलाने से कोई रोक नहीं सकता। मोदी जी फिलहाल तो कर्नाटका में जा कर मुस्लिम बच्चिओं को उनका हक़ दिलाओ। उनकी मांग है हिजाब और उनकी तालीम पर जो ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों ने डाका डाला है उस तालीम को वापिस करना।
ऐसे ज़ाफ़रानी अनासिर
तमाम भारत में फैले हुए हैं। जो सिर्फ और सिर्फ
मुस्लिम बच्चिओं और दुख्तराने मिल्लत के ही पीछे लगे होतें हैं। जैसा की कर्नाटका में देखने को मिला। जैसे ही उस बच्ची ने अपनी स्कूटी पार्क की के हो
गए १०० से ज़्यादा ज़ाफ़रानी गुंडे, गुटका बाज़, बैक बन्चेर्स उसके ऊपर हमलावर।
नाज़रीन मुद्दा कर्नाटक के हिजाब का नहीं है बल्कि यह एक फ़िरक़ावारना तनज़िया है। नाज़रीन आपको बेंगलोर का वोह शिफ़ाख़ाना याद है, जहाँ कोविद-१९ जैसी वबा में भी यूनिवर्सिटी में दहशतगर्द, गुटका बाज़, बेक बेंचेर की पैदाइश तेजस्वी सुवारिया ज़हर की नुमाइश करता है। और तमाम मुस्लिम मुलाज़िमों को निकाल देता है यह कह कर की यह लोग वबा फ़ैलाने में मुलव्विस थे। बाद में जब तहक़ीक़ात होती है तो माफ़ी मांग लेता है।
तो मसला नक़ाब या हिजाब नहीं है बल्कि वोह ज़हरीली ज़ेहनियत है जो हमेशा समझती है की मुस्लिम ख़ातून बोहोत ही अज़ीयत में जी रहीं हैं उनको बुर्क़े में दबा कर रखा जाता है कोई हुक़ूक़ फ़राहम नहीं किये जाते वग़ैरा। जबकि घूँघट वाली ख़ातून अगरचे असल में तकलीफ़ में ज़िन्दगी गुज़ार रही होंगी उसको दबा कर रखा जाता होगा तब भी इन दिमाग़ी मुफ़लिसों को कुछ नहीं दिखेगा।
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