Wednesday, 22 April 2020

हिन्दू शिद्दत पसंदों, दहशतगर्दों के पुराने ट्वीट्स पर अरबों का बवाल.

अज़ीज़ नाज़रीन,

सबसे पहले तो आलमे इस्लाम और तमाम मुसलमानों को रमज़ान शरीफ की आमद पर पुर ख़ुलूस मुबारकबाद पेश करना चाहूंगा.  उसके बाद में दुआ गौ हूँ की सूबे महाराष्ट्र को अल्लाह खूब तर्रकी दे फलाह दे और सूबे के मौजूदा वज़ीरे आला जो निहायत ही मुनसेफाना, ईमानदारी और इन्साफ पसंदी से काम कर रहें है उनके बाज़ूओं को मज़ीद मज़बूत बनाये.  और उनकी जानिब बढ़ने वाली आने वाली हर बला आफत कोसों दूर ही हलाक हो जाए.  

नाज़रीन आज जो मुल्के हिन्द के हालात है और तमाम आलम में एक वबा क़ेहर बरपा कर रही है उसकी सिर्फ और सिर्फ वाहिद वजह है ना इंसाफ़ी और इंसानियत का क़त्ले आम.  जब से इस वबाई वायरस ने मुल्के हिन्द में क़ेहर बरपा करना शुरू किया था और तमाम मग़रिबी मुमालिकों के बाद हर ना इंसाफ़ी और जंग की अज़ीयत देने वाले दादा अब्बा अमेरिका को अपनी आग़ोश में ले लिया था तो सबसे पहले इस सहाफी ने इस बात को मन्ज़रे आम किया की यह खुदा का क़ेहर और अज़ाब है.  लेकिन मुसलमानों के ऊपर नहीं बल्कि ना इन्साफ, क़ातिल, मजमूई क़ातिल और दरिंदा सिफ़त लोगों के ऊपर है.   जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपने मज़मून  मक्का बंद मदीना बंद. में किया है. उसके बाद कुछ चुनिंदा अफ़रादों ने इस बात को तस्लीम करना शुरू किया की ये खुदा का क़ेहर है. 
फिर भी कुछ ज़मीर फरोश हूकूमती गुलाम जिसमे ज़ाफ़रानी लंगूर लँगूरनियाँ और घटिया मुसलमानों का वोह तब्क़ा है जो इस बात को तस्लीम करने को राज़ी नहीं है की यह इताबे इलाही है, हमारे बद अमाल, बदकारियों की सजा है और कुछ नहीं.  ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियाँ अभी तक तब्लीग़ी जमात तक ही महदूत हैं.  इन जाहिलों दिमाग़ी मरीज़ों की जहालत पर अब तो तरस भी नहीं आता. क्योंकि ऐसे अनासिर महज़ जानवरों तक ही महदूत होते हैं. हक़ की आवाज़ इनके कानों तक पहुंच ही नहीं पाती है. जिस तरह से अल्लाह का पहले की उम्मतों के ऊपर अज़ाब से पहले उनके कानों में सीसा पिघला कर डाल दिया जाता था और उसी को हिदायत मिलती थी जो इसके एहल होता था.  बाक़िया सभी ग़र्क़ाब हो जाते थे. वही हाल आज के मुस्लिम माशरे के ऐसे घटिया अनासिरों का है जो मौलाना के भेस में हक़ीक़त में अबू जेहल का किरदार अदा कर रहें हैं.  ऐसे लोग हक़ की बात को तस्लीम करने के बजाये उन लोगों पर तनक़ीद कर रहें हैं जो हक़ की तरग़ीब करतें हैं, जो अँधेरे से रौशनी की जानिब आने की बात करतें हैं.  इस मौजूं पर एक ट्वीट इस सहाफी ने हिंदुस्तान टाइम्स अंग्रेजी ख़बरनामे के एक मज़मून में की थी.
              Zuber Ahmed Khan  3 April at 10:50·

Ghatiya people will omit shit of garbage from mouth. All such types of Ghatiya people who are in fact Jummans. These people are the agents of Hindu Terror who adopted the Muslim costumes just to mislead the Umma. I had stated in my Hindi articulations Mecca Band Madina Band and scolded to Sanghi Terrorists. Now Saudi imposed curfew in two holiest cities of Muslims. Total curfew ban on namaz too. Word to word is proving correct which this Journo stated long back and in my latest Hindi Article Meeca Band Madina Band. Total restriction and prohibitory orders for the people to enter in limits of Masjide haram 
and Madina.
 
आज मग़रिबी मुमालिकों और अमेरिका जैसे अज़ीम सुपर पवार पर जो क़ेहर नाज़िल हुआ है उसका बयान महज़ अलफ़ाज़ की अदाएगी से नहीं होगा, बरक्स आती नस्ले ऐसे अज़ाब से इबरत हासिल करेगी.  क्योंकि जो ज़ुल्म और शिद्दत बुश ने इराक़ पर मचाई थी जिसको करने की कोई भी ज़रुरत नहीं थी लेकिन अपने एहम और तकब्बुर को क़ायम रखने के लिए एक हस्ते खेलते मुल्क को तबाह और बर्बाद कर दिया.  जिसका ज़िक्र २०१० के बाद सहाफत की रूहानी दुनिया में क़दम रखने के बाद कई मज़मूनों में किया है.  और साफ़ अलफ़ाज़ में जॉर्ज बुश और इंग्लैंड के तब के वज़ीरे आज़म टोनी ब्लैयर पर नाम बनाम तनक़ीद की है.  अलाइड फोर्सेज को भी हाशिये पर लिया है.  कई सख़्त तन्क़ीदी मज़मून और हालते इश्तेआल में लिखे हुए २०१५ के हादसे के बाद ऐ.टी.अस. से मशोरा कर के डिलीट कर दिए हैं.  फिर भी काफी सारे अभी भी मौजूद होंगे.     
 
फिर जिस हिसाब से सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम मुमालिकों को अलाइड फोर्सेज तबाह और बर्बाद कर रहे थे उसके पीछे इस्लामोफोबिया का वाइरस काम कर रहा है इस बात को साफ़ तोर पर देखा जा सकता था.  इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, लीबिया, मिस्र, सिरया उसके बाद ईरान पर हमले की तैयारी थी लेकिन ईरान थोड़ा ताक़तवर साबित हुआ सो अमीरिका ने उससे जंग करने की हिमाक़त नहीं की.  जिसका ज़िक्र २०१० के बाद कई एक मज़मूनों में किया जा चूका है. 

अरब मुमालिकों और मुस्लिम वर्ल्ड में मौजूदा वबा का इतना असर नहीं हुआ, जानी तो काफी कम है और जो कुछ भी होंगे उसमे हिन्दुस्तानी हिन्दू ही होंगे लेकिन मुस्लिम नहीं.  माली जो नुकसान हुआ है और लॉक डाउन की मौजूदा हालत हैं वोह भी इसलिए की तमाम मुस्लिम अवाम पर ज़ुल्म सितम होते रहे नबी सल्लम की अज़मत को तार तार किया जाता रहा क़ुरान को आतिशे नार किया जाता रहा लेकिन ये मुल्क बावजूद तमाम क़ुव्वत और माली ताक़त होने के ख़ामोशी की हिकमत पर यक़ीन रखते रहे. 

हिन्दुस्तानी दहशतगर्द संघ, बजरंगदल और वी ही पी से जुड़े हुए उनके स्लिपर सेल तमाम मुस्लिम मुमालिको में फेल गए थे और उनका एजेंडा सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम मुमालिकों की इख़्तेसादि हालात पर चोट पंहुचा कर वहां की तिजारत को अपने हाथों में लेना था और अरबों को अपना गुलाम बना कर जिस तरह से हिंदुस्तान में मुसलमानों का इसतेसाल किया जाता है उसी अंदाज़ में अरबी अवाम का करना था.  इन हिन्दू दहशतगर्दों के अजेंडे में अरबी मस्तूरातों को जिन्सी गुलाम बना कर इनके जिस्म के साथ तमाम भारत के दहशतगर्दों को फरोग करने का मंसूबा था.  क्योंकि जिस अंदाज़ में इस सहाफी के साथ हिन्दू दहशतगर्दों का मुबाहिसा और बहस होती थी उससे उनके दिलों दिमाग में अरब मस्तूरातों के लिए कितना ज़हर भरा है इसका खूब मुज़ाहेरा होता था.   और अरबो की माशी हालात को कैसे तबाह करने की साजिश है वोह सब साफ़ हो जाती थी.  एक नहीं हिन्दुस्तान में तक़रीबन हर हिन्दू हर एक हिन्दू उसी ज़हरीली ज़ेहनियत का है.  २०१४ के बाद अगर सेक्युलर हिन्दू बचे होंगे तो बोहोत कम. शायद १०० में १. जितनों से बेहेस होती सब मुस्लिम, इस्लाम, क़ुरान  और अरबों को गाली देते हुए उनके सख़्त इस्लामी क़ानून का मज़ाक बनाते हुए पाए जाते थे.  जिसका ज़िक्र हर बार इस साहाफी ने अपने इंग्लिश आर्टिकल्स में किया है.  लेकिन मोदी के आने के बाद अरब मज़ीद उस सेहर का शिकार हो गए जो इस शैतानी ताक़त ने उनके दिलों दिगाम पर कर दिया था.  अब तो हिन्दुस्तानी मीडिया में दुबाई में हिंदुस्तानी कागज़ात और मोदी जी की मर्ज़ी के हिसाब से तिजारत शुरू करने के इश्तेहरात रेडिओ मिर्ची और दीगर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में खुले आम शाया होने लगे.

जिस अंदाज़ में भारत में झूटी सच्ची फिल्मे बना कर दुबाई के अरब शेखों को हिन्दुस्तान की मस्तूरातों के साथ जिन्सी ग़ुलामी के झूठे फरेबी खेल को बताया जाता है वही ज़हर हिन्दू दहशतगर्दों की नसों में हिन्दू फिल्मकारों ने भरा था.  और जब भारत की सबसे पहली फिल्म पाकीज़ा सरज़मीन सऊदी अरब में शाया हुई तो इस सहाफी को सख़्त तकलीफ हुई थी.  वो भी उस ज़हरीली ज़ेहनियत अदाकार अक्षय कुमार की थी जो मुसलमानों और इस्लाम से सख़्त नफरत और बुग्ज़ रखता है.

यहाँ तक की ज़ाफ़रानी मीडिया के दिलों दिमाग में इतना ज़हर भरा है की जब ईरान के साथ छाबड पोर्ट को तैयार करने के लिए हूकूमते हिन्द ने मोहायदा किया था तब मिडिया की सुर्खियां बनी थी अब ईरान पर हुआ भारत का क़ब्ज़ा छाबड पोर्ट भारत के क़ब्ज़े में.

बिल आख़िर अरब शेख़ों और मुस्लिम मुमालिकों के अंदर बैदारी आई और हिंद्स्तान के हिन्दू अवाम को जो मुस्लिम मुल्कों से तिजारत करतें हैं कमातें हैं और मुसलमानों के खिलाफ ही बे हद ज़हर और आलूद रखतें हैं.  हर चंद मुस्लिम अवाम को बर्बाद करने की मंसूबा बंदी करतें रहतें हैं, उनको ख़ारिज करने की मोहीम तेज़ हुई.  अरब मुमालिकों  से गुज़ारिश है की हिन्दुस्तान से तमाम तिजारती मुहायदे मुनतक़ा कर देना चाहिए.  और जितने भी हिन्दू ताजिर अरबों से तिजारत करतें हैं उन सबका तिजारती मोहायेदा रद्द कर देना चाहिए.  क्योंकि अरब मुमालिकों में सेक्युलर हिन्दू नहीं बरक्स शिद्दत पसंद ज़ेहनियत ही गए हैं.  और ऐसे अनासिर साजिश के तहत जान बूझ कर अरब मुमालिकों और मुस्लिम मुल्कों में घुसाए गए हैं. इनकी ज़ेहनियत गलीज़ और आलूद से भरी होती है.  सिर्फ मुस्लिम माशी हालत पर हमला कर के वहां पर हिन्दू राष्ट्र क़ायम करना और मुस्लिम मस्तूरातों को जिन्सी गुलाम बनानां.

जहां तक सब्ज़ परचम के नीचे आने वाले हर शख्स को अमान होगी वोह फलसफा सिर्फ हिन्द के लिए है.  हिन्द में जो भी सब्ज़ परचम के नीचे आ गया उसको अमान होगा.  फिर जंग की धुल थमने के बाद फिर से दुसरे मोहायेदे क़ायदे क़ानून बना कर उसपे उस तरीके से अमल करना होगा.     

कुल मिला के मसले का लब्बो लुआब ये निकल कर आता है, जिस बीमारी को हिन्द के ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर और लँगूरनियाँ मुस्लिम अवाम और तब्लीग़ी जमात के ऊपर इलज़ाम तराशी कर रहें हैं वो दर-असल हिन्द और दुनियाँ के इंसानियत और मुसलमानों के खिलाफ ज़ुल्म सितम शिद्दत और दहशत का उस मालिके हक़ीक़ी का जवाब है. 

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