हैदराबाद
जहाँ हक़ और बातिन की इस जंग में
दिफ़ाई फौजी एक के बाद एक हिन्दू दहशतगर्दों के क़िलों को फतह करते जा रहें हैं वही मुस्लिम
रियासत दक्खन के निज़ाम की दारुल ख़िलाफ़ा हैदराबाद
में एक पुलिस चौकी पर हिन्दू दहशतगर्द आर.एस.एस. के क़ब्ज़े की खबरें आ रही हैं. ऐसी ख़बरे सोशल मीडिया पर हिन्दू दहशतगर्दों के हथियारों
के साथ तसावीरों के वायरल होने के बाद आना शुरू हुई. जैसे ही सोशल मीडिया से ख़बरें निकल कर मीडिया की
सूर्खिया बनी, इस पर तनाज़िया खड़ा हो गया है।
इन्तेज़ामियाँ के होश फ़ाख्ता हैं और उसने आनन फानन में वहां के पुलिस महकमे के
इंस्पेक्टर को हटा दिया है। आला ओहदेदारों ने जब बात का बतंगड़ बना तो ये कह कर लीपा
पोती करना शुरू कर दी है कि दहशतगर्दों को इसकी इजाजात नहीं दी गई थी, मज़ीद अफसर ने
कहा हमने दहशतगर्दों से हाथ जोड़ कर चले जाने की इल्तेजा की थी। वहीं, हिन्दू दहशतगर्द
स्पोक पर्सन ने इन खबरों को झूठी बात बताते हुए सिरे से ख़ारिज कर दिया कि उसने कहा
की दहशतगर्द पुलिस चौकी पर अवाम की शिनाख़्त खत की तफ्तीश कर रहे थे।
हिन्दू दहशतगर्द जमात संघ ने इस
मुद्दे पर कहा कि ऐसी खबरें 'अदना दर्जे और ख़ुद ग़र्ज़ी' से मुत्तासिर हैं। सोशल मीडिया
पर शेयर की जा रही तस्वीरों में आर.एस.एस. के दहशतगर्द कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान
यदाद्री भोंगीर जिले में एक चौकी पर हथियारों के साथ तैनात दिखाई दे रहे हैं। सोशल
मीडिया पर कई अफ़रादों ने इसपर सख़्त एतेराज़ दर्ज करवाया हैं। उन्होंने पूछा कि 'लाठी
लिए' आरएसएस के दहशतगर्दों को को चौकी से गुजरने वाले वाहन सवार लोगों के कागज जांचने
की इजाज़त किसने दी।
वज़ीरे आला से जवाब तलब
अवाम ने ऐसे फरेबी अनासिरों के खिलाफ
मामला दर्ज करने की भी मांग की है। मजलिस बचाओ तहरीक पार्टी के तर्जुमान अमजद उल्ला
खान ने एक बयान में वज़ीरे आला चंद्रशेखर राव से इस मामले पर वज़ाहत की मांगा की है।
उन्होंने पूछा कि क्या यह टीआरएस सरकार की नरम हिंदुत्व की हिकमत है या फिर आर.एस.एस.
मुवाफ़िक़ तेलंगाना सरकार के आला ओहदेदार अपनी मर्जी से ऐसा ना ज़ेबा और वाहियात काम कर
रहे हैं।
हालांकि पुलिस ने कहा कि गुजिश्ता हफ्ते कॉलेज के कुछ तुलबा के साथ दहशतगर्दों
ने सादे कपड़ों में कुछ चौकियों पर ख़ाने और पानी की तक़सीम करने में पुलिस की मदद की
पेशकश की थी। अब मसले की अंदर जा कर ये एहसास हो रहा है की इन तुलबा के साथ दहशतगर्दों
ने पुलिस चौकी में अपनी पैठ बना ली थी. फिर
जो तुलबा ज़रूरतमंदों में जारूरी एशिया तक़सीम कर रहे थे उसमे ये दहशतगर्द घुसपैठियों
के जैसे घूस गए. और जब सब कुछ उनके क़ब्ज़े में
आ गया उन्होंने पुलिस चौकी पर धावा बोल दिया.
जिसकी तस्दीक़ पुलिस के एक आला ओहदेदार की ज़ुबानी से हो रहा है जिन्होंने कहा
कि अचानक वे सब ९ अप्रैल को दहशतगर्द आर.एस.एस. की ड्रेस में आए और फिर उन्होंने चौकी
को अपने क़ब्ज़े में ले कर नजदीक कुछ तस्वीरें भी लीं।
पुलिस स्टेशन कूप (बगावत) को देखते हुए ओहदेदारों के होश फ़ाख्ता हैं और उनसे कुछ भी
कहने की नहीं बन रही है. एक ओहदेदार ने कहा कि पुलिस इंस्पेक्टर (अलायर चौकी के तहत
आने वाली चौकी के इंचार्ज) को फौरी तौर से दूसरी जगह भेज दिया गया और इस कूप (बगावत)
की इत्तेला हेड कवाटर को दे दी गई है। उन्होंने कहा कि इस बगावत के सिलसिले में कोई
मामला दर्ज नहीं किया गया है। सूबे तेलंगाना का हिन्दू दहशतगर्दों का एरिया कमेंडेन्ट
के. रमेश ने कहा कि दहशतगर्द इन्तेज़ामियाँ के कामकाज में दखल नहीं देते और पूरी तरह
इजाज़त मिलने के बाद ही अपना काम करते हैं।
सहाफी ज़ुबैर की इस मुद्दे पर नुक़्ता ऐ नज़र
पुलिस स्टेशन पर हिन्दू दहशतगर्दों की हथियारों के साथ तैनाती पर दो चीज़े निकल
कर सामने आ रहीं हैं. एक या तो हिन्दू दहशतगर्द
कूप (बगावत) में पुलिस की भी मिली भगत थी जिसकी वजह से एक चौकी हुकूमत को गवानी पड़ी
और उसपे आज दहशतगर्दों का क़ब्ज़ा है. दूसरी बात दहशतगर्दों ने इस चौकी को हथियारों के साथ हुकूमत के ज़ेरे इंतज़ाम पुलिस वालों को बड़ी तादात में हलाक कर के हासिल की है. क्योंकि जैसा की हिन्दू दहशतगर्दों का एरिया कमेंडेन्ट के. रमेश ने कहा की दहशतगर्द बग़ैर इजज़ात हुकूमत के काम काज को मुत्तासिर नहीं करते. तो ऐसी सूरत में हुकूमत और पुलिस की मिली भगत के साफ़ इमकान नज़र आ रहें हैं. पुलिस स्टेशन पर हिन्दू दहशतगर्दों की
तैनाती की इजाज़त किस अफसर ने दी. और क्या
वोह इजाज़त ज़ुबानी थी या तहरीरी. फिर ऐसी बगावत
में सरकारी हुक्काम के शामिल होना मतलब वतन के साथ गद्दारी. फिर ऐसे ओहदेदारों के खिलाफ वतन के साथ गद्दारी
का मुक़दमा दर्ज होना चाहिए.
फिर हुकूमत के काम काज में दहशतगर्दों का क्या किरदार हो सकता है. सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम अवाम के खिलाफ़ दहशत, जब्र
और बर्बरियत करना. क्योंकि इस बात की तस्दीक़
ख़ुद हिन्दू दहशतगर्द स्पोक पर्सन कर रहा है
की दहशतगर्द पुलिस चौकी पर अवाम की शिनाख़्त ख़त की तस्दीक़ कर रहे थे. अब सवाल ये ही उठता है की किस ने इन देशतगर्दों
को हथियारों के साथ मुस्लिम अक्सरियत वाले इलाक़ों में शिनाख़्त करने की इजाज़त दी है. क्या ये दहशतगर्द आई.पी.अस. या आई.ऐ.अस. इम्तेहान
को पास कर के पुलिस स्टेशन पर तैनात हुए हैं.
अगर नहीं तो हुकूमत के महकमे में मदाखलत करने की इनकी क्या हैसियत और औक़ात है. क्या ये हुकूमत के काम काज को मुत्तासिर नहीं कर
रहें हैं. फिर दहशतगर्दों के हथियारों के साथ
मौजूदगी में कैसे कोई सरकारी अमला ग़ैर जानिबदार, मुनसेफाना तोर पर काम कर सकेगा.
और यह ही वजह है की २३ मार्च के बाद अवाम के ऊपर सख़्त तरीन बर्बरियत और दहशत
देखी गई. बुर्का पोश मुस्लिम खातून अपने ६
माह के बच्चे के साथ हाथ में हॉस्पिटल का पेपर, लेकिन वो इन जैसे खाकी गुंडों की बर्बरियत
का शिकार हो रही है. दूसरी बात अगर बात लॉक
डाउन की है, तो मार पीट करने और दहशत फ़ैलाने के पीछे की हिकमत क्या है. हुकूमत ने इन देशतगर्दों को आवारा कुत्तों की टोली
के जैसे अवाम के ऊपर छोड़ दिया है. ऐसे ही
अनासिर सब्ज़ी और फ्रूट मंडिओं में जा कर दहशत मचा रहें हैं. और नाम पूछ कर ताजिरों के साथ मार पीट कर रहें हैं. अगर फ़िरोज़ या ज़ाकिर हुआ तो उसके फल और सब्ज़ी फेक
दी जाती है वहीँ बनवारी या पटवर्धन रहा तो उसको इजाज़त दी जाती है. ऐसा करने के पीछे इन देशतगर्दों की हिकमत यह होती
है की करोना का वबाल आया हुआ है तुम घर में बैठों. तो क्या करोना सिर्फ मुस्लिम ताजिरों को जकडेगा
और हिन्दुओं को नहीं. ऐसे किस्सों से साफ़
ज़ाहिर हो रहा है करोना तो सिर्फ बहाना है.
हुकूमत को अपने किसी बड़े अजेंडे को हासिल करना है. और मरकज़ की बोली आज तमाम वज़ीरे आला बोल रहें हैं
जो केजरीवाल कल तक मुस्लिम मुहाफ़िज़ बना फिरता था मुस्लिम अवाम के वोट के ऊपर अपना इक़्तेदार
हासिल किया वोह भी एक तरफा बोली बोल रहा है.
मर्कज़ सामाजिक दूरी इख़्तेयार करने की बात करता है लेकिन क्या वजह है की उस हूकूम की अनदेखी ख़ुद बीजेपी के आला ओहदेदार रकूने असेंबली, वज़ीरे आला और शिद्दत पसंद अवाम ख़ुद करतें हैं. मस्जिदों में नमाज़ तर्क कर दी गई लेकिन मंदिरों में खुले आम आरती पूजा हो रही है. महावीर जयंती ०६ अप्रैल को मध्य प्रदेश के एक मंदिर में खुले आम हज़ारों की तादात में हुजूम जमा हुआ फिर किसी मुद्दे पर दो फ़रीक़ों में बेहेस हो गई और खूब कुशतम पछाड़ा (नूरा कुश्ती) हुई. ऐसे ही अनासिर सामाजिक दूरी की धज्जिया उड़ा रहें हैं, और पुलिस की मदाख़लत पर मंदिरों के पुजारी अपने अक़ीदत मंदों के साथ हमलरेज़ हो रहे हैं. अब ऐसे विडिओ और ख़बरें हुकूमत की जानकारी के लिए शाया किये जातें हैं तो मज़ीद ग़फ़लत इख़्तेयार कर के हुकूमत निजामुद्दीन, जमात, तब्लीगी पर हमलरेज़ हो जाती है. और अपने पालतू ज़ाफ़रानी मीडिया के जानवरों को जो असली मुद्दे हैं उनसे ज़हन हटाने के लिए ला लायानी मुद्दे झूट, फरेब की बुनयाद पर हाथ में दे देती है.
कुल मिला कर वाइरस करोना का जिन्न या
हव्वा जो हुकूमत दिखा रही है उसके पीछे की हिकमत कुछ और है. और हुकूमत तमाम हिन्द के अवाम को क़ैद कर के अपने
किसी बोहोत ही बड़े अजेंडे की जानिब गामज़न है और उसको पूरा करने की उधेड़ बून में है. जिसकी तीन
वजह बताना चाहूंगा.
१. क्योंकि अगर करोना एक बीमारी है तो उसके पीछे
बर्बरियत मचाने की क्या हिकमत है.
२.
मुस्लिम ताजिरों को घर जाने और हिन्दू ताजिरों
को काम करने की इजाज़त देने की क्या वजह हो सकती है.
३. तीसरी चीज़ क्या तमाम सामाजिक दूरी सिर्फ मुस्लिम
अवाम के लिए ही है. क्योंकि हिन्दू तो मज़हबी
इज्लासों में भी शरीक हो रहें हैं (राम मूर्ती नसब), हिन्दू तो सियासी हलकों में भी
शरीक हो रहें हैं (हलफ बरदारी), हिन्दू तो शादी पार्टी में भी शरीक हो रहें हैं, (कर्णाटक), हिन्दू
तो बर्थडे (बरियानी) पार्टी में भी शरीक हो रहे हैं (कर्णाटक). मज़े की बात तो यह है की ऐ सभी किसी और जमात से नहीं और ना ही किसी ख़ास मज़हब
“मुस्लिम” से है बल्कि एक ही जमात से हैं.
"ज़ाफ़रानी" और मज़हब शिद्दत
पसंदी. उसके ऊपर मज़ीद मोदी जी की जानिब से
ताली बाज़, दिया बाज़ तमाम हिन्द में रोडों पर निकल कर आतें हैं. तो यह बात साफ़ ज़ाहिर हो रही है हाथी के दांत ख़ाने
के और दिखाने के और.



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