Thursday, 2 April 2020

में भी तब्लीग़ी, में भी घर में छुपा हूँ.

अज़ीज़ नाज़रीन, अस्सलामो अलैकुम.

जिस हिसाब से शिद्दत पसंद हिन्दू, संघी और अक़ीदत मंदों (भक्तों) ने तब्लीग़ी जमात को ले कर गलत मोहीम चलाई है. "करोना जिहाद" आप तमाम से गुज़ारिश है ट्वीटर, फेस बुक, इंस्टा और तमाम सोशल मीडया पर ये मोहीम चलाये.  इस सहाफी के तमाम सोशल मीडिया अकाउंट ब्लॉक हैं. इसीलिए आपसे गुज़ारिश है, नहीं तो ये सहाफी अकेला ही काफी है.  और मेरे लिए मेरा अल्लाह काफी है.

में भी तब्लीग़ी, में भी जमाती, में भी अपने घर में छुपा हुआ हूँ.

आज जो मुल्क के हालात हैं उससे आप तमामी हज़रात बा खूबी वाक़िफ़ होंगे.  जब ना सिर्फ मुल्के हिन्द बल्कि निस्फ़ से ज़ाइद दुनिया में जब एक वबाई वारयस ने तबाही मचा रखी थी तब ना सिर्फ तामाम आलम में अपने अपने मुल्कों में अवाम एक साथ आये बल्कि मुल्के हिन्द में भी तमाम हिन्दू, सिख, जैन, बोध, पारसी, खिच्चन, मुस्लिम अपने तमाम क़ौमी और मज़हबी इख्तेलाफ़ात दर किनार कर के एक साथ आये.  सभी ने ग़रीब, मज़दूर और वबा से मुत्तासिर, फसे हुए अवाम को घरों की जानिब जाते वक़्त खुले दिल से ताऊन किया. 

लेकिन लॉक डाउन को फौरी अमल में लाने की हिकमत और इस तरह की ग़ैर ज़िम्मेदार, नाहेल और ग़फ़लती कारगरदेगी से हूकूमते हिन्द को सख्त मलामत की गई.  इस कुदरती वबा के पीछे कुछ अवाम (इन कुछ में ये सहाफी भी शामिल है) शिद्दत पसंदों, संघी दहशतगर्दों, बीजीपी और हूकूमते हिन्द की मुस्लिम अवाम के साथ ज़ालिमाना, ना इंसाफ़ी और फ़िरक़ावारना ज़ेहनियत के सबब क़ुदरत का ज़वाल क़रार दे रहे थे.  चंद अफ़राद मुट्ठी भर, (इन चंद में मुट्ठी भर में) ये सहाफी भी शामिल है, कश्मीर में ज़ुल्म, ज्यात्ति, लॉक डाउन का ये क़ुदरती बदल हैं. 

फिर यहाँ से ये क़ुदरती वबा या बला हूकूमती वबा में तब्दील हो गई और हूकूमते हिन्द ने अपने ऊपर लान तान करने वालों को इस वबा का ज़िम्मेदार मान लिया. अब हूकूमते हिन्द ने ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर और लँगूरनियों के ज़रिये जामात को बदनाम करना शुरू किया.  जबकि जहाँ तक इस सहाफी का तजुर्बा है जमाती तो ख़ालिस क़ानून के पेकर होतें हैं.  वतन परस्त होतें हैं.  कोई भी जमाती कभी भी ऐसा कोई काम नहीं करता जिससे मज़हबे इस्लाम पर आंच आये और जमात का नाम बदनाम हो.

लेकिन ये नसीहत और सीख है जमातिओं के लिए भी.  जब मुक़ाबिल ज़ालिम हो जब जंग ज़ालिम के साथ हो तो तमाम क़ाइदे क़ानून सिर्फ और सिर्फ मज़लूम पर ही लादे जातें हैं.  और ऐसा ही हुआ.  जो जामात हूकूमते हिन्द के पैग़ाम जो जहाँ है वही रहे पर अमल करती है, वह लंगूर और लँगूरनियों की जमात के लिए छूपे हुए हो जातें हैं.  और जो हुकूमत के लॉक डाउन का पैग़ाम तोड़ कर तमाम मुल्क भर में अपने अपने घरों से सैकड़ों पर निकल जातें हैं ताली और थाली बजाते है या मंदिरों में छुप जातें हैं वो फस गए हो जातें हैं. 

दूसरी बात मरकज़ निजामुद्दीन की तब्लीग़ी जमात ने ना सिर्फ हूकूमते हिन्द के पैग़ाम जो जहाँ है वही रहे को इज़्ज़त दी और हुकमत के पैग़ाम को माना बल्कि निकलने की हिकमत भी इख़्तेयार की और पुलिस के आला तरीन ओहदेदारों और हुकूमत को इसके लिए इत्तेला भी की यहाँ तक की गाडी नंबर और ड्राइवर का नाम मोबाइल नंबर तक फ़राहम किया लेकिन हुकूमत के दिलो दिमाग में तो गंदगी, गलीज़ आलूद भर चूका था ऐसा क़तरा जो उमूमन नापाक होता है और ख़ारिज होने पर मुसलमान के ऊपर ग़ुस्ल फ़र्ज़ हो जाता है, और उस जगह को पाक करना होता है.   

मौलाना साद को लंगूरों ने बदनाम किया था उनके ऊपर दिल्ली हुकूमत ने कारवाही का हूकूम दिया है.  लेकिन मौलाना साहब मिल ही नहीं रहें हैं.

हूकूमते हिन्द को पैग़ाम. 

तुम मरते मर जाओगे, तुम शिद्दत पसंदों की लाशें गिर जायेगी लेकिन तुम मौलाना साहब की परछाई तक को नहीं छु सकोगे. जो अल्लाह के वली होतें हैं अल्लाह के ख़ास बन्दे होतें हैं उन पर अल्लाह की ख़ास नज़रे करम भी होती है.  मौलाना अज़हर मसूद, हाफिज सईद, ज़ाकिर नाइक भूल गए क्या या फिर याद दिला दूँ.  किस क़दर जूते मारे हैं इस सहाफी ने इन मौलानाओं के ऊपर तुमको.  तुम लोग इनको अपने यहाँ ले कर आने वाले थे कैसी मट्टी पलीद हुई.  अब तुम्हारे खुद के देश भारत में रहने वाले मौलानाओं पर तुम्हारी मट्टी पलीद होगी.  जैसे जैसे इनको इज़ा और बदनाम करने के लिए आगे बढ़ते जाओगे वैसे वैसे मज़ीद अन्धकार और गिरफ्त में आते जाओगे.  और तुम लोग बडोगे ना चाहते हुए भी बडोगे.  और जब बिल्कुल बर्बाद हो जाओगे और कुछ हाथ नहीं लगेगा. तब पछताने के आलावा कुछ नहीं होगा.  रेत को मुठ्ठी में भर कर पानी आने पर, कैसे रेत धीरे धीरे हाथ से गिरती जाती है, वैसा ही हाल तुम्हारा होने वाला है.  अब जो जुम्मन मौलाना है वसीम रिज़वी उसको गिरफ्तार कर सकते हो.  ऐसे छोला छाप मौलाना को गिरफ्तार कर लो.  वो सभी जुम्मन होंगे.  जो अल्लाह और उसके नबी की अज़मत कम और भारत की अज़मत ज़्यादा बताते हैं.  जो इस्लाम की अज़मत कम और कुफ्र की अज़मत ज़्यादा बताते हैं.  जो हक़ की अज़मत कम और बातिल की अज़मत ज़्यादा बताते हैं.  जो इन्साफ की अज़मत कम और ना इन्साफ की अज़मत ज़्यादा बताते हैं.  जो हक़ और बातिल की जंग में जो इन्साफ और ना इंसाफ़ी की जंग में जो इंसानियत के लिए ज़ालिम के साथ जंग में दबे अलफ़ाज़ में ज़ालिम की तरफदारी और माफ़ करने जैसे फलसफे पर ज़ोर देतें हैं.  ठीक है माफ़ करना चाहिए लेकिन कब जब इंसान वक़्त रहते माफ़ी मांगे.  रौज़े जज़ा में क्या कोई माफ़ी काम आएगी.  क्या फ़िरोन को माफ़ी नसीब हुई थी.  अगर उनको नहीं हुई तो हम कौन होतें हैं अल्लाह के क़वानीन तब्दील करने वाले.  और पस ऐसे ही फरेबी झूठे जालसाज़ मौलाना जो दरअसल संघी होंगे, शिद्दत पसंद हिन्दू होंगे लेकिन लिबास उन्होंने हमारा पहना होगा ज़ुबान हमारी इख्तियार की होगी वही पकडे जायेगें.

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