Monday, 8 April 2019

सियासी हालत पे सहाफी जुबेर की नुक़्तए नज़र.


अज़ीज़ नाज़रीन

इस सहाफी ने अपने कई मज़मून इंतेखाबात की निस्बत से कलमबंद किये और जो तजज़िया उसने सियासी जमातों के हवाले से किये थे वो कामो बेश ९० फीसद दुरुस्त और सही साबित हुए. 

इसी हवाले से २०१८ के एक मज़मून में इस सहाफी ने  कुल हिन्द मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन को ना सिर्फ मुस्लिम बल्कि ग़ैर मुस्लिमों में भी एक मक़बूल जमात तस्सव्वुर किया था, और वो जमात मक़बूलियत के पैमाने पे तेज़ी से आगे की जानिब गामज़न थी.  जो नज़रिया इस सहाफी का जनवरी २०१९ तक या यूं कह लीजिये फरवरी के दुसरे और तीसरे हफ्ते तक वही था.  सभी  मज़मून में इस सहाफी ने असदुद्दीन ओवेसी की कुल हिन्द मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन को २०१९ के पार्लिअमानी इंतेखाबात में एक बड़ी जमात बन के उभरने के इमकान था.  ये सहाफी अवाम की मक़बूलियत के पैमाने पे उस जमात को किंग मेकर की हैसियत से तस्सव्वुर कर रहा था.  साथ ही सहाफी ने वाज़े अलफ़ाज़ में इस बात को भी मन्ज़रे आम किया था की ये तजज़िया २०१८ तक के हैं.  जैसे जैसे इस सहाफी के पास फीड बैक आते जायेगें हो सकता है की सियासी जमातों का तास्सुर भी तब्दील होता जाए.  दूसरी बात असदुद्दीन ओवेसी को इस सहाफी ने वज़ीरे आज़म की रेस में एक एहम किरदार माना था क्योंकि अवाम में उनकी मक़बूलियत, सूझ बूझ, तालीम, आईन पे यकीन और अज़्म से वो हिन्दुस्तानी जमुहरियत का एक मक़बूल हिस्सा तस्सवुर किये जाने लगे थे.

लेकिन पुलवामा हादसे के बाद जिस तेज़ी से सियासी उथल पुथल मची अब हालात वैसे नहीं हैं जैसे की होना चाहिए थे.  फिर जिस अंदाज़ में असदुद्दीन ने अपने सियासी नफे के लिए गलीज़ और ओछी ज़ुबानी जमा खर्च की है और जो गंदगी उन्होंने अपने मुँह से निकाली है जिसकी वजह से उनको नफा मिलने के बजाये नुकसान हुआ है और उनकी जमात की मक़बूलियत ख़ास कर के उत्तर प्रदेश में तेज़ी से गिरावट आई है.  अगर कुछ ना बोल के ख़ामोशी इख्तियार की जाती तो हालात कुछ और होते.  फिर अगर बोलना ही था, तो अलफ़ाज़ के दायरे में रह कर बोलना था.  सियासी जमात को कुछ भी बोलने से पहले अपने नफे और नुकसान के बारे में सोचना चाहिए.    

बे इख्तियार और ला महदूत बोलना सिर्फ और सिर्फ हम जैसे सहाफिओं के ऊपर छोड़ देना चाहिए, जिनको ना किसी मक़बूलियत का परवाह ना दुनिया का खौफ और ना ही सियासी नफे नुकसान की फ़िक्र.  फिर अगर वो सियासी जमात मुस्लिम हक़ की बात करती है तो उसको अलफ़ाज़ की अदायगी बोहोत ही सोच समझ के करनी चाहिए, जिसकी वजह से नुकसान जमात के साथ साथ मुस्लिम अवाम का भी होता है.  जिस जमात को ये सहाफी किंग मेकर तस्सुवर कर रहा था और कह रहा था की अवाम को गुमान भी नहीं होगा २०१९ में ऐसी कारगरदेगी कुल हिन्द मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन पेश करेगी, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा.  पुलवामा हादसे की वजह से दोनों हिन्दू और मुस्लिम जमात का नुकसान हुआ है.  जिस अंदाज़ में बीजपी की कारगरदेगी थी के उस हादसे की वजह से वो कम अज़ कम ३०० के ऊपर सीटें जीत लेगी वैसा तो हरगिज़ नहीं होगा.  और जिस अंदाज़ में ए.आई.आम. की मक़बूलियत अवाम के दिलों दिमाग में छा रही थी अब वैसा भी नहीं है. 

औरंगाबाद सीट हो सकता है जीत जाए, सीमांचल में भी हो सकता है तजज़िया मुवाफ़िक़ आएं.  हैदराबाद सीट बिला शुबा मेहफ़ूज़ है कोई खतरा नहीं है.  लेकिन सबसे बड़ा नुकसान जो पार्टी को हुआ है वो है उत्तर प्रदेश. जिन २० सीटों पे ऐ.आई.ऍम. अपने नुमाइंदे उतारने वाली थी उसमे से कम अज़ कम जनवरी २०१९ तक हवा के रुख के हिसाब से १२ से १५ सीटों पे कामयाबी क़दम चूमने को बे क़रार थी. 

जो फरवरी पुलवामा हादसे के बाद सियासी उथल पुथल मची है उसके बाद उत्तर प्रदेश की जिन २० सीटों से इंतेखाबात में पार्टी ने अपनी नुमाइंदगी वापिस ली उन सीटों का फायदा मुस्लिम और दलित अवाम को हो सकता था.  लेकिन मक़बूलियत की गिरती हुई साख की वजह से अब वहां से हाथ पीछे की जानिब खींचने पड़े.

आज के ताज़ा तजज़िये के हिसाब से कांग्रेस पार्टी फिर लीड ले रही है.  कितनी सीट्स जीतेगी ये कहना मुश्किल होगा लेकिन जिस कांग्रेस को कम तर समझ के अंदाजा लगाया जा रहा था और राहुल को पप्पू बोल के मखौल उड़ाया जाता रहा है उनकी मक़बूलियत में खासा इज़ाफ़ा हुआ है. 

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