Saturday, 13 April 2019

अल्लाह के बरगोज़ीदा बन्दे. (वाक़ियाए कर्बला) २रा - हिस्सा


                                                                                         पेज १ का बाक़िया ..... 

हज़रते महविया ने खिलाफत की बैत ली और खलीफा बन गए. यहाँ ये बात वाज़े करता चलूँ की अगर हुसैन को इक़्तेदार हासिल करना मक़सद होता और इस्लामिक खलीफा का लक़ब लेना होता तो तो २० साल हज़रते महविया खलीफा के फ़राइज़ को अंजाम देते रहे. कभी भी आपने हज़रते महाविया की खिलाफत की मुख़ालेफ़त नहीं की और उनको खलीफा तस्लीम किया. और ये दौर इस्लामिक खिलाफत का सुनहरा दौर है.  इन २० सालों में कोई क़िताल कोई खाना जंगी कोई बद अमनी नहीं हुई.  इस्लाम को खूब फरोग मिली, खुतूत और फ़तवाफ़ का सिलसिला खूब आगे बढ़ा.  नए मुल्क फतह इस्लाम हुए.  जब हज़रते महाविया को हुसैन इब्ने अली ने खलीफा ऐ वक़त तस्लीम कर लिया था तो उनका मक़सद इक़्तेदार हासिल करना नहीं था ये बात साफ़ हो जाती है.

फिर कर्बला की जंग क्यों हुई

हज़रते महाविया के पर्दा करने के बाद ६० हिजरी में यज़ीद मलून खिलाफते इस्लामिया के तख़्त पे गद्दी नशीन हुआ और फ़राइज़ को इंजाम देने लगा.  हालांकि हज़रते महाविया के हयाते ज़िन्दगी में वली ऐ एहद की जो बैत यज़ीद के लिए ली गई थी अब खिलाफत की बैत के लिए यज़ीद ने मुस्लिम रियासतों को तलब किया.  फिर जिन पांच अफ़राद जिसमे हुसैन इब्ने अली भी शामिल थे जिन्होंने यज़ीद की वली ऐ एहद की बैत को इक़रार किया था, उन्ही लोगों ने खिलाफत को भी क़ुबूल नहीं किया. क्योंकि यज़ीद एक बदबख्त और एहले बैत और खानदाने नबूवत से आला दर्जे का बुग्ज़, कीना और हसद रखने वाला शख्स था.  फिर उसने नए नए फतवे देना शुरू कर दिए.  शराब हलाल कर दी.  और बेहेन भाई का निकाह जाइज़ करार कर दिया.   फिर हज़रते इमाम हुसैन केसर ओ किसरा की गलत रिवायत जो शुरू हुई थी उसके भी खिलाफ थे.

यज़ीद एक बदकार शख्स था और अपने अमले बद का, बदकारिओं का खुद ज़िम्मेदार था. वो फ़ासिक़ और फ़ाजिर था वो दीने इस्लाम की हुदूत का मुनकिर हुआ. मक्का और मदीना की बे हुरमती कर के कुफ्र का मुर्तकिब हो गया और बईमान, बदबख्त बन के जहन्नुम का ईंधन जा बना.  इब्ने असीर और दिगर बड़ी बड़ी मोतबर क़ुत्बे तवारीख़ में उसके सियाह कारनामों के तज़किरे मौजूद हैं.  यज़ीद ज़ानी था शराबी था और मुसलमानों से ख़ास एहले बैत और खानदाने नबूअत से आला दर्जे का बुग्ज़ और कीना रखने वाला मालून शख़्स था. बिन्ते ईनब के साथ शेहरे मक्का और शेहरे मेहबूब मदीना मुन्नाववारा में जो उसकी बदमाशियाँ है उससे सभी नाज़रीन खूब वाकिफ होंगें. उसने शेहरे मक्का में बैठ के शराब पी और शराब के बारे में नमाज़ में जाते हुए हज़रते हुसैन के सामने कसीदे पढ़े और आप हज़रते हुसैन अलैहिसलाम को भी नौश फरमाने के लिए मदु किया.  उन्होंने यज़ीद की इन सियाह कारनामों को खुद अपने चश्मे नूर से देखा था यानी खुद अपनी आखों से देखा था.  हज़रते अब्दुल्लाह फरमातें हैं हमने उसकी सियाह करतूतों की वजह से उसपे ख़ुरूज किया और हमें शुबा हुआ कहीं उसकी बदकारिओं की वजह से आसमान से पत्थर ना बरसने लगें.

सिर्फ वाक़िये कर्बला ही नहीं यज़ीद ने मदीना मुन्नावारा में ७०० सहाबा ऐ रसूल को शहीद किया १०,००० ताबेईन को क़त्ल किया.  और ३०० नौजवान जोशीदा ख़्वातीनों की आबरू रेज़ी करवाई, और काबा तुल्लाह पे यज़ीद ने संगबारी की.  तमाम मताफ़ पत्थरों से भर गया था. तीन दिन तक मस्जिदे नबवी में ना अज़ान हुई, ना इक़ामत और ना नमाज़ अदा की गई.  ७ दिन तक मस्जिदे नबवी में यज़ीद के घोड़े बंधे रहे. मिम्बरे रसूल की हुरमत पामाल कर दी गई.

हज़रते हुसैन रज़ि अल्लाहो अन्हा को वलीद बिन उतबा ने बुला के कहा तुम यज़ीद की हाथ पे बैत कर लो.  हज़रते हुसैन ने कहा ये किसी भी सूरत मुमकिन नहीं है.  में उस जैसे ज़ालिम फ़ासिक़, फ़ाजिर, शराबी और मुसलमानों के कातिल शख़्स पे बैत करूँ जो मेरे नाना के लाये हुए दीन और शरीयत को पामाल कर रहा है, और हुसैन इब्ने अली ऐसे शख़्स की बैत से इंकार करता है.  हुसैन इब्ने अली को मलऊन यज़ीद के चेहरे से ख़िलाफ़ते इस्लामिया का नक़ाब निकाल कर उसको बरहना करना था और लोगों को बतलाना था ये वही शख्स है जिसके बारे में मेरे नाना और नबी अलहेसलाम ने पहले ही खबर दी थी की बनु उम्मय्या का एक ज़ालिम शख़्स मेरी सुन्नत को बदलेगा और वो ज़ालिम शख़्स ये ही है.

हज़रते हुसैन का अगर इक़्तेदार ही लेना मक़सद होता तो यज़ीद की बैत करने की सूरत में जिन मरआत से नवाज़ा जा रहा था, जिसको सुन के बड़े से बड़े वक़्त के बादशाह के पैरों में लर्ज़िश और जुम्बिश आ जाती.  लेकिन हज़रते हुसैन ने फ़रमाया ये दुनिया की शान ओ शौकत तख़्त और ताज क्या चीज़ हैं जिनकी मसनद मेहबूब की गली में लगी हो वो तख़्ते सिकन्दरी पे थूका भी नहीं करते.  मुझे इन तख़्तो ताज की परवाह नहीं में तो कलेमाते हक़ के इलाह के लिए मैदाने अमल में आया हूँ.  आपने मुक़ामे बैज़ा पे ख़ुत्बा देते हुए फ़रमाया लोगों में जानता हूँ की मेरे साथ क्या होने वाला है, बावजूद में मैदान में इसलिए जा रहा हूँ "वालेकुम फी हा उस्वा"  के मेरी ज़िन्दगी तुम्हारे लिए एक नमूना बन जाए.  आपने अपनी ज़िन्दगी को सुबह क़यामत तक आने वाली नस्लों को एक नमूना क़रार दिया.  इस सहाफी को इस बात को मन्ज़रे आम पे लाने में ज़र्रा बराबर शक और शुबा नहीं की जब कभी भी ज़ुल्म, शिद्दत, ज़ब्र, तशद्दुत के खिलाफ कोई भी तहरीक शुरू होगी उनका रहबर और क़ायद हुसैन इब्ने अली होगा, और वो कभी भी नाकाम नहीं होगी, फिल वक़्त दुनियाँ को वो तहरीक नाकाम दिखेगी लेकिन उसके दूरन्देश नताइज कामयाब होंगें. 

कर्बला का वाक़िया असल में अल्लाह तबारक ताला को शैतान को एक ज़र्ब अज़ब था और दिखाना मक़सद था की सब्र तहम्मुल और अल्लाह की रज़ा में अपनी रज़ा ना सिर्फ पैगम्बरों नबियों को हासिल होती है बल्कि कई सालों बाद उनके जा नशीन और अहले बैत में भी वो कश्फ़ और पैगम्बरों वाली सिफ़त पाई जाती है.   हज़रते अय्यूब अलैहिसलाम का सब्रे जमील हज़रते इब्राहिम ख़लील उल्लाह और इस्माइल ज़बीह उल्लाह का इम्तेहान मशहूर है जिन्होंने अल्लाह की मर्ज़ी में अपनी मर्ज़ी शामिल की और सरे तस्लीम हुए.   अल्लाह अज़्ज़वजल ने आप हज़रते अय्यूब अलैहे सलाम को हर तरह की नेमतों से सरफ़रोज़ किया था. बे पनाह नूरानी सूरत अता फ़रमाई, औलाद अता फ़रमाई, बे पनाह माल, बे शुमार मवेशी, खेत और बाग़ात अता फरमाए.   लेकिन जब अल्लाह तबारक तआला ने आपका इम्तेहान लेना चाहा और आज़माइश में डाला तो आपका घर गिर पड़ा. उसमे दब के आपके तमाम फ़रज़न्द फौत हो गए तमाम मवेशी, चोपाहे, बकरियाँ, ऊँट दब के मारे गए.  खेतियाँ बाग़ात सब बर्बाद हो गए.  बिल ग़र्ज़  आप सय्यदना अय्यूब अलैहिसलाम के पास ज़ाहिरन कुछ भी बाकी ना रहा. बावजूद इतनी बर्बादी और हलाकत के आप अल्लाह तबारक रब्बे क़दीर का शुक्र अदा करते और हम्दे इलाही बजा लाते अल्लाह का शुक्र बजाते रहे.  बावजूद दुनयावी साजो सामान की बर्बादी के मज़ीद आज़माइश में अल्लाह ने उनको मुब्तेला किया.   अब आप खुद अलील हो गए, और जस्मे पाक पर अबले पड़ गए.  यहाँ तक की बीमारी के चलते आपने दुनियाँ से अलहदगी इख्तियार कर ली और किनाराकश हो गए. और साल्हा साल उस बीमारी में मुब्तेला रह कर बे पनाह शिद्दत और अज़ीयत बर्दाश्त करते रहे.   जब आप हज़रते अय्यूब अलयहे सलातो वस्लाम अल्लाह के इम्तेहान में कामयाब रहे तो अल्लाह के हुकुम से आपने अल्लाह की बारगाहे रहीमी  में दुआ की और अल्लाह ने उनको शिफा अता फ़रमाई.  पारा १७ सूरा अम्बिया आयत ८३ में जिसका ज़िक्र मिलता है.  जब इम्तेहान में कामयाब हुए तो अब अल्लाह की नेमतों की बारी थी.  अल्लाह तबारक ताला ने आपको मज़ीद नूरानीयत अता की आपकी तमाम ओलाद को ज़िंदा फार्मा दिया, आपकी ज़ौजा को वापिस जवानी अता की तमाम हलाक शुदा मवेशी, चोपहे, ऊँट सब ज़िंदा हो गए, मालो असबाब जो बर्बाद हो गया था वो सब ना सिर्फ मिल गया बल्कि अब पहले से कई गुना ज़्यादा अता किया गया.

बिल आखिर ऊपर बयान किये हुए दो वाक़ियों से इस सहाफी का शोहदाए कर्बला के सब्र के मरहले को बयान करना मक़सदे ऊला है.  ताके शैतान मरदूत रोज़ाये जज़ा को अल्लाह तबारक तल्हा के हुज़ूर कुछ उज्र या दरख्वास्त दाखिल ना कर सके.  ऐ बारी ताला जिनका तूने इम्तेहान लिया या आज़माइश ली वो सब तो पैगम्बर थे और उनको ख़ास किस्म की रूहानियत रहती है.  इसीलिए अल्लाह ने कर्बल को एहले इस्लाम और इंसानियत के लिए एक मिसाल बना दिया और शैतान के लिए लानत.  ना सिर्फ पैगम्बर बल्कि अल्लाह के बारगोज़ेदा बन्दे भी उसकी दी हुई आज़माइश और इम्तेहान में कामयाब होतें हैं.  यहाँ ये बात वाज़े करता चलूँ की हज़रते हुसैन को तमाम कुव्वत, बुज़ुर्गी, रूहानियत, उसत, इस्तेतात होने के बावजूद आप ने कभी अपनी रूहानी फैज़ का इस्तेमाल नहीं किया.  और शैतान को दिखा दिया बावजूद तमाम ताक़त होने के में अल्लाह की रज़ा में राज़ी हूँ.    

कर्बला की जंग सबसे ज़्यादा अज़ीम और इस्लाम को जिन्दा करने वाली जंग थी.  उसकी वज़ाहत ये सहाफी करना चाहता है नबी करीम के हयाते ज़िन्दगी में जितनी भी जंगे लड़ी गई उनकी क़यादत खुद आप सल्लम कर रहे थे. चाहे वो जंगे बद्र, जंगे खंदक, जंगे ओहोद हो या कोई और जंग जिसमे की इस्लाम को फतह मिली थी.  लेकिन जंगे कर्बला नबी के पर्दा करने के बाद सबसे बढ़ी और अज़ीम जंग थी. जिसकी क़यादत नबी ना करते हुए उनके एहले नस्ल कर रही थी.  दूसरी बात इस जंग में यज़ीद मलून और मुनाफ़िक़ों को शयातीन की मदद हासिल थी और हज़रते हुसैन अल्लाह की रज़ा के लिए  और दुनियाँ वालों को तारीख़ में ये दिखाने के लिए लड़ रहे थे की अल्लाह की रज़ा पे सब कुछ क़ुर्बान करना किस को कहतें हैं.

दूसरी बात ये जंग इसलिए भी बोहोत ही ज़्यादा मायने रखती है क्योंकि मुनाफ़िक़ और यज़ीद मलून नुबूवत के खानदान को ख़त्म कर देना चाहता था लेकिन हुआ उसके ठीक उल्टा.  जैनुल आबेदीन जो के कुछ १३ साल के थे और बोहोत ही अलील थे बुखार की वजह से उनसे ठीक से खड़े होते भी नहीं आ रहा था, हालांकि ऐसी हालत में भी वो जंग के मैदान में जाना चाहते थे. लेकिन हज़रते हुसैन के हुकुम बरदारी करते हुए घर पे रुक गए और जैसा की हज़रते हुसैन ने फ़रमाया था की आप से ही नबूवत की नस्ल आगे बढ़ेगी और उनसे खानदाने नबूवत आगे बढ़ा.  और आज दुनियाँ के हर खित्ते में सय्यद ज़ादे और ज़ादियाँ मौजूद हैं.  लेकिन यज़ीद की नस्ल ही खत्म हो गई और आज कोई भी उसका वारिस नहीं बचा. 

किसी शायर ने क्या खूब कहा है क़त्ले हुसैन असल में मग्रे यज़ीद है,  इस्लाम ज़िंदा होता है हर कर्बला के बाद.

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