Sunday, 7 April 2019

अल्लाह के बरगोज़ीदा बन्दे.


अज़ीज़ नाज़रीन,

मुसन्निफ़ का आज का मौज़ूं मुल्क में सियासी ख़ुमार होते हुए भी सयासत से अलहदा रूहानी शख्सियात और अल्लाह के बरगोज़ीदा बन्दों के ऊपर मुश्तमिल है.

यूं तो अल्लाह के वलियों की शान और करामात के तो बे इन्तहा किस्से मशहूर हैं, लेकिन उनको देखने और समझने के लिए वैसी ही नज़रें चाहिए.  अब जिन हज़रात को एक मौलाना अज़हर मसूद, खुशदिल सूरत में शैतान, इब्लीस नज़र आता है तो ये उस नज़रे बद की नाहीली है ना की उस मौलाना की, के उसको जिस इंसान में शैतान दिखा असल में वो रेहमान ही था.  

फिर अगर उस इंसान का कोई भी अमल हालाते हाजरा से मुख़तलिफ़ और अलहदा होता है, तो  सभी क्या मोमिन और क्या हिन्दू उस इंसान के दुश्मन बन जातें हैं.  अब इन ग़फ़लती हज़रते इंसान को क्या मालूम जिसकी कही हुई बातों पे वो आज गाली गलोच कर रहें हैं, कल वही एक दर हक़ीक़त में तब्दील हो जाने वाली हैं.  क्योंकि बंदा वो सब आज देख रहा है जो शदीद ग़फ़लत के शिकार हज़रते इंसान नहीं देख सकते.   जब तक इंसान ज़िंदा होता है उसकी अज़मत को हर ख़ास और आम नहीं पहचान पाता है.  क्योंकि उसके कारे ख़ैर पोशीदा अमल अल्लाह की रज़ा पे मुश्तमिल होतें हैं.  लेकिन पर्दा करने के बाद जब उनकी करामातें आम होतीं हैं तो चले जाते है उनके आस्ताने पे मत्था टेकने.

आज के दौर में सल्तनते हिन्द की कुर्सी पे फ़ाइज़ बादशाह और उस दौर के राजा पृत्वी राज और ग़रीब नवाज़ की करामात के बाद शाकिस्त से काफी गहरा ताल्लुक़ है.   ग़रीब नवाज़ के ऊपर उस दौर के हिन्दू शिद्दत पसंद बादशाह पृथ्वीराज चौहान और उसके चेले चमचे (सैनिकों) की भी यही कैफियत थी. जो आज के दौर के बादशाह और उसके चमचों की है. लेकिन उस दौर के बादशाह की हार के बाद आज के दौर का मोदी जैसा बादशाह उनके आस्ताने पे चादर पेश कर रहा है. कश्मीर के गवर्नर श्रीमान मालिक साहब खुद चादर ले कर पूरे फौज फाटे के साथ हाज़िर होतें है और कश्मीर में अमन ओ अमान की दुआ करतें हैं. लेकिन क्या आज जो हालात ग़रीब नवाज़ की मोहब्बत और अमन के पैगाम को ले कर एहले हुनुद के दिलों दिमाग में हैं वही हालात उनके हयाते ज़िन्दगी में थे.  नहीं हरगिज़ नहीं उनको सख्त तरीन अज़ीयत पहुंचाई जाती थी उनका पानी रोक दिया था, फिर आपने पूरे आना सागर जहाँ से शहर को पानी तक़सीम होता था महज़ अपने कटोरे में ले लिया और मुल्क का अवाम प्यासा मरने लगा और बादशाह से गुहार लगाईं हमें इस अज़ीयत से बचाओ और इस फ़कीर को तकलीफ मत दो नहीं तो हम और हमारे बच्चे प्यासे मर जायेगे.  जब बादशाह और उसके फौजी खुद ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ की बारगाह में हाज़िर हुए और मिन्नतें करने लगे तो उन्होंने अपना कटोरा दिया और कहा इस पानी को सागर में डाल दो, जैसे ही कटोरे का पानी सागर में डाला वो पहले की तरह सराबोर हो गया.   

बादशाह अपनी इस ज़लालत का बदला लेना चाहता था लेकिन उसकी हर ततबीर अल्लाह के फ़क़ीर के सामने पस्त हो रही थी, उस दौर के हिन्दू शिद्दत पसंद बादशाह पृथ्वीराज की हर ततबीर ना काम साबित हुई और ग़रीब नवाज़ जो एक सच्चे अल्लाह के वली थे उन्होंने पृथ्वी के हर हर्बे का जवाब बा खूबी दिया.   बिल आख़िर उसने जादूगरों का सरदार जगतपाल जोगी से मदद मांगी और उसने अपनी जादू की ताक़त और कुव्वत से ग़रीब नवाज़ को ख़ौफ़ज़दा करना चाहा और उनके ऊपर जादू के ज़ोर पे बोहोत ही बड़े पत्थर से हमला किया गया.  लेकिन वो हमला भी उस जादूगर का नाकाम साबित हुआ और आप सरकार ग़रीब नवाज़ ने पत्थर से कहा अगर तू अल्लाह के हुकुम से आया है तो मेरे ऊपर गिर जा और अगर शैतानी ताक़त के ज़ोर पे आया है तो में हुकुम देता हूँ वही रुक जा.  इतना सुन के पत्थर वही रुक गया.

जगतपाल शैतानी अमलियात का माहिर था वो ग़रीब नवाज़ को मुतास्सिर और ख़ाइफ़ करने की निस्बत से उड़ता चला गया और पहले आस्मां दुसरे आस्मां तीसरे आस्मां इसी तरह जब सातवे आसमान पे पहुंचने वाला था तो आप ग़रीब नवाज़ ने अपने खड़ाऊ को हुकुम दिया और कहा बोहोत ऊपर चला गया इसको नीचे ले आ. फिर खड़ाऊ उस जादूगर के सर पे बे साख़्ता पड़ती और वो नीचे की जानिब आता जाता जब दुनिया में आया तो ग़रीब नवाज़ के पैर पकड़ लिए और बोला आप ही अल्लाह के सच्चे वली हो में इस्लाम में दाख़िल होना चाहता हूँ.  आप इस्लाम में दाख़िल हुए और आपका नाम ग़रीब नवाज़ ने अब्दुल्लाह बियाबानी रखा.  उसके बाद आप ग़रीब नवाज़ के मुरीदीनों में शामिल हुए.  हिन्दू शिद्दत पसंद बादशाह पृथ्वी की सबसे बड़ी हार तब हुई जब जादूगरों का सरदार जगतपाल जोगी ग़रीब नवाज़ की करामात देख कर इस्लाम में दाखिल हो गया. बिल आख़िर जंग के मैदान में भी जीत ग़रीब नवाज़ की ग़ैबी ताक़त और करामात की वजह से हर बार हारे हुए सुलतान मोहम्मद ग़ोरी की जीत हुई.

जैसा हर दौर में हक़गोई करने वालों के साथ होता आया है; उस दौर का हाकिम और अवाम करता करता था और वही सब आज के दौर में हो रहा है.   जिन मौलाना अज़हर मसूद को ये हिन्दू दहशतगर्द, शिद्दत पसंद हिन्दू तंज़ीमे और हुकूमते हिन्द का हाकिमे वक़्त; दहशतगर्द बोल रहा है अज़ीयत कुन फैसले लेने की सोच रहा है, आता वक़्त देखेगा इसके चमचे और खुद हिन्दू उनके मज़ार पे ज़ियारत के लिए और मदद मांगने जाया करेगें. 

हज़रते निज़ामुद्दीन ओलिया के उस दौर का दिल्ली की तुग़लकी सल्तनत पे काबिज़ हाकिम ग्यास उद्दीन तुगलक या मोहम्मद बिन तुगलक बोहोत ही मग़रूर और अल्लाह के वालियों से कीना और बुग्ज़ रखने वाला हाकिम था.   आप सरकार निज़ामुद्दीन ओलिया की कोई बात खटक गई और एक रिवायत में आता है क़त्ल करने के इरादे से और दूसरी में  गिरफ्तार करने के इरादे से निकला.  जैसे ही वो परवाना ले कर निकला हज़रत को ग़ैबी इल्म हो गया और आपने बरजस्ता फ़ारसी में कहा "हानूस दिल्ली दूर अस्त" मतलब अभी दिल्ली दूर है. और हुआ वही दिल्ली से चार या पांच किलोमीटर दूरी पे ऐसी बीमारी में मुब्तेला हुआ की उस बीमारी के चलते निज़ामुद्दीन ओलिया को क़त्ल करने का ख़्वाब दिल में लिए फौत हुआ और कभी भी उनकी परछाई तक नहीं पहुंच पाया.

आज दरिया अरब में हाजी अली की हुकूमत है यही वजह है की बम्बई में आज तक दरिया अरब से कोई आफ़ात या बला नहीं आई.  मद्रास में सूनामी आई, त्रिवेंद्रम में आई, साहिली आंध्रा और कर्नाटका में आई लेकिन बंबई दरिया से मेहफ़ूज़ है उसकी वजह हैं वली कामिल हाजी अली. दूसरी बात कितना भी बड़ा टाइड हो अतराफ़ की तमाम चीज़े ज़ैरे आब हो जातीं हैं लेकिन दरगाह के अंदर पानी का एक क़तरा छु भी नहीं पाता है.  ए ज़िंदा करामात नहीं तो और क्या है और ख़ाकी (इंसान) फितरत वसवसिल खन्नास (शैतान) के लिए इबरत.   

उनके दौरे फ़क़ीरी में एक बार एक ग़रीब औरत अपने बच्चे के साथ तेल ले कर जा रही थी. कसमपूर्सी का आलम था और उसके हाथ से तेल गिर गया और ज़मीन ने चूस लिया. बूड़िया ज़ारो क़तार रोने लगी.  आप हाजी अली का वहां से गुज़र हुआ और आपने बूड़िया से रोने की वजह पूछी तो उसने कहा ऐ अल्लाह के वली में ग़रीब अपने बच्चों के लिए खाना पकाने का तेल लेकर जा रही थी और ज़मीन पे गिर पड़ा और ज़ाइल हो गया. आपने ज़मीन को हुकुम दिया ए ज़मीन तू इसका तेल वापिस कर, ज़मीन ने देने से मना किया आपने ज़मीन में अपना अंगूठा धसा के ज़मीन से तेल निकाल के बुढ़िया को वापिस कर दिया. लेकिन ज़मीन बोली ए अल्लाह के वली आपने मुझसे तेल तो वापिस ले लिए लेकिन जब आप मरने के बाद मेरी पनाह में आओगे तो जो अज़ीयत आपने अपना अंगूठा घुसा के मुझको दी है में उसका बदला लूंगी.  अपने बोला मेरे को तेरी ज़रुरत नहीं है और अपने मशायकीनों को कहा मुझे पर्दा करने के बाद एक ताबूत में रख कर सुपर्दे ख़ाक करने के बजाये सुपुर्दे आब कर दिया जाए.  फिर आपकी जसत बम्बई के दरिया में लोगों ने देखि और आपकी वही मज़ार बना दी.  तो जो लोग बिन लादेन पे तनक़ीद करतें हैं और फ़िक़रे कस्ते हैं की उनकी जसत दरिया में बहाना पड़ी थी, तो अगर वो अल्लाह के वलिये कामिल होंगें, कोई बईद नहीं आने वाले वक़्त में उनकी भी कहीं ना कहीं ऐसी ही दरगाह बन जाए. 
अल्लाह के वलियों की शान निराली होती है हज़रते जुनैद बगदादी सतहे आब (पानी) पे चल रहे हैं. एक शख्स आया ए जुनैद आप दरिया पार कर रहे हो मेरे को भी उस पार जाना है, आपने कहा तू या जुनैद या जुनैद पढता मेरे पीछे पीछे चल.  जुनैद बगदादी बोल रहे हैं या अल्लाह या अल्लाह और उनके पीछे वाला बोल रहा है या जुनैद या जुनैद अब दोनों दरिया पे चल रहें हैं. इतने में एक खन्नास दिल वस्वसा डालने वाला मुसलमानी शक्ल में इब्लीस शैतान आ गया.  बोला ए शख्स तेरे आगे जो चल रहा है वो तो या अल्लाह बोल रहा है और तेरे को अपना नाम बुलवा रहा है. तू भी तो अल्लाह का बंदा है जो अल्लाह जुनैद को दे रहा है क्या वो तेरे को नहीं देगा.  बात दिल को लग गई. अब पड़ने लगा या अल्लाह जैसे ही अल्लाह का नाम लिए दरिया में डूबा.  और यहीं से ईमान का इम्तेहान शुरू होता है. जुनैद बगदादी ने हाथ पकड़ के निकाला और पुछा क्या अल्लाह का नाम लेना शुरू कर दिया था.  हमने कहा था हमारा नाम लेते चलो बेड़ा पार हो जाएगा.  अब वस्वसा तो आ गया ये क्या माजरा है अल्लाह का नाम लिया डूबा और जुनैद का नाम लिया तो बेड़ा पार.  अगर अल्लाह के ऊपर से ईमान गया और जुनैद को सब कुछ तस्लीम किया तो खारिज मुर्तद.  

ख़ैर दरिया पार करना पहला मक़सद था सो मरता क्या नहीं करता या जुनैद बोलते बोलते दरिया पार किया.  लेकिन साहिल पे पहुंच के पुछा ए जुनैद बगदादी आप भी अल्लाह के बन्दे हो में भी अल्लाह का बंदा हूँ फिर क्या वजह है की आप अल्लाह का नाम लेते हुए सतहे आब पे चल रहे थे जबकि में डूब गया.  तो उन्होंने कहा पहले तुम जुनैद तक तो पहुंच जाओ तुम्हारी रियाज़ जुनैद जितनी भी नहीं है और तुम अल्लाह तक पहुंचने का दावा कर रहे हो.  तुम डूब रहे थे इसलिए नहीं क्योंकि तुमने अल्लाह का नाम लिया बल्कि किसकी बात सुन के तुमने अल्लाह का नाम लिया. अल्लाह पाक है और जब तुम गुनाहों के दलदल में फसे रहते हो तो अल्लाह भी तुम्हारी मदद नहीं करता. पहले अपने जिस्म को साफ़ करो अपनी रूह को पाक करो फिर अल्लाह से पाकि तलब करो और मांगो तो अल्लाह तुम्हारी भी सुनेगा.  लेकिंग सिर्फ वस्वसे डालने वालों की बातो को सुन के अगर कोई भी काम किया तो गुमराही है और हर गुमराह जहनुम्मी.  

फिर ये बात भी एक हकीकत है जो इंसान दुनिया से हट के साफगोई करता है या ख़िलाफ़े बहाव अमल करता है तो अवाम उसके खिलाफ बग़ावत कर डालता है. साइंसदानों से लेकर तो थिंकर अरस्तू, प्लेटो, सुकरात सभी इस ज़हरीली ज़ेहनियत का शिकार हुए, अरिस्टोटल और सोक्रिटीज़ को ज़हर दिया गया.  न्यूटन की जिस ज़मीनी कशिश इख़्तियारात की राय को उस ज़माने ने ठुकरा दिया था आज उसी राये पे मुश्तमिल बातों पे अमल किया जा रहा है.   फिर सभी मज़हब में क्रिस्टी, यहूद और इस्लाम के पेगम्बरों को उस दौर के हाकिम और अवाम ने क्या नहीं सताया और परेशान किया. लेकिन आज वही अवाम और समाज इज़्ज़त देतें हैं.

जो सहाफी और सियासत दान मौलाना अज़हर मसूद, हाफिज सईद और लादेन जैसे वली सिफ़त इंसानों को कोस रहे हैं उनकी अज़मत आज नहीं पता चलेगी बल्कि उनके पर्दा करने के कई सालों बाद पता चलेगी. मीरा दातार जिनको आज शहंशाए गुजरात का लक़ब दिया गया और आज मारवाड़ी, गुजराती और जैनी समाज भरा पड़ा रहता है उनके आस्ताने पे, लेकिन उनके हयाते ज़िन्दगी में उनको उस वक़्त के हाकिम मेहदी बागड़ा जो के एक जादूगर और शैतानी अमलियात का मरकज़ हुआ करता था शहीद कर दिया था. लेकिन क्या आज उस हाकिमे वक़्त को कोई जानता है नहीं लेकिन मीरा दातार को शाहशए गुजरात का लक़ब दिया गया. और गरीब नवाज़ को शहंशाहे हिन्द.

आज जो नीम मुल्ला और कर्णाटक का एडवोकेट फ़य्याज़ सईद जैसे लोग मज़हब और ईमान पे फतवे फ़तवाफ़ देने लगे वो अवाम को गुमराही में धकेल रहे हैं और बात की तशरीह गलत अंदाज़ में कर के अहले ज़ौक़ हज़रात के दिलों दिमाग में वस्वसे और शुकूक डाल रहे हैं. जो की शैतानी अमल है.  हर वस्वसा बदगुमानी है, हर बदगुमानी गुमराही और हर गुमराह जहनुम्मी है जिसकी वज़ाहत मुसन्निफ़ अपने दुसरे मज़मून और वाक़ेयाये कर्बला में करेगा.  इंशअल्लाह.

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