बीजेपी के २०१४ की कारगरदेगी को दोहराते
हुए २८० से ज़ाइद अराकीने पार्लियामेंट की मुकम्मल अक्सरियत हासिल करने के इमकान कम
नज़र आतें हैं. उस वक़त मोदी माफ़िक़ ग़ुब्बारे
में ज़बरदस्त हवा भरी गई थी. मुसन्निफ़ को यकीन
नहीं है की बीजेपी २०१९ में आसान जीत दर्ज करवाने में कामयाब होगी. जो हवा भारतीय अवाम के दिलो दिमाग में आलूद और ज़हरीली
ज़ुबानी जमा ख़र्च के ज़रिये हिन्दू तशद्दुत पसंद ज़ेहनियत और हिन्दू दहशतगर्दों ने भरी
थी वो अब ख़ारिज हो चुकी है, और बीजेपी के कारकूनों के बयानात से साफ़ ज़ाहिर हो चूका है की अब वो “सल्तनते हिन्द” की कुर्सी की कुव्वत दुबारा हासिल नहीं कर सकते वो बैचनी उनके बयानात
में साफ़ देखि जा सकती है.
२०१४ के बाद से इन तमाम सालों में शिद्दत
पसंद हिन्दू और हिन्दू दहशतगर्दों ने मुल्क़ के लिए कुछ भी कारे ख़ैर नहीं किये बरक्स
उन्होंने मुस्लिम, क्रिस्टी और दलित समाज के खिलाफ ज़हरीली बीज बौने का काम किया है. जिसके नताइज मुसलमानो की बड़ी तादात में हलाकत और
लीचिंग के सबूत के तोर पे मौजूद हैं.
हिन्दू दहशतगर्दों को इन पांच सालों में
दी गई मुतावीतिर मश्क़ और तालीम की फसल पक चुकी और अब सही वक़्त आ गया है की उस ज़हरीली
फसल को इस्तेमाल किया जाए. मुसन्निफ़ ने इन
जैसे पेचीदा मामलों का नज़दीकी जायज़ा लिया है और उसे इस बात को मन्ज़रे आम पे लाने में
ज़र्रा बराबर हिचक नहीं है की जो ज़हर और नफरत के बीज भारतीय अवाम के दिलों दिमाग में
पेवस्त किये गए थे ज़रूर आने वाली हुकूमत के लिए मुज़िर और तकलीफ कुन साबित होने वाले
हैं. अच्छे दिन की उम्मीद भारतीय बर्रे सग़ीर
से कोसों दूर दिख रहे हैं, बल्कि मुसन्निफ़ मज़ीद बुरे दिन महसूस कर सकता है. कियोंकि
आने वाली हुकूमत के लिए आलूदी सौदागरों, हिन्दू
दहशतगर्दों और उस हिन्दू शिद्दत पसंद ज़ेहनियत को कुचलना और चकना चूर करना एक इम्तेहान
से कम नहीं होगा, ठीक उसी तरह जिस तरह से एक नशे की लत वाले मरीज़ को इख्तिआर में करना
खानदान के तमाम अफ़राद के लिए किसी सख़्त इम्तेहान से कम ना होता है. इन तमाम ५ सालों में मोदी इन्तेज़ामियाँ ने सियासी
नफरत की बीमारी का खात्मा करने के लिए कुछ भी ज़रूरी इक़दाम नहीं उठाये. बजाये उसके ज़्यादा नफरत की खुराक के ज़हरीले बयानात
की मिक़्दार दी गई जिसकी वजह से शरदकालूँ उस खुराक के आदतन और पेशावर बन गए.
मुसन्निफ़ २०१४ के बाद अपने कई मज़ामीनों
में हुकूमते हिन्द को माशरे में बढ़ते हुए इख्तेलाफ़ात और नफरत के बारे अपनी फिक्रमंदी
से आगाह कर खिताब कर चूका है. इस तरह के इख्तेलाफ़ात
और हुकूमत की ख़ामोशी भारत को खाना जंगी की जानिब धकेल रही है.
मुल्क की अवाम वाज़े तोर पे जदीद भारत के
तरक़्क़ी की गवाह रहेगी के किस तरहं मोदी इंतेज़ामिया ने शिद्दत की बन्दूक मीडिया, इंतेज़ामिया
और अदलिया पे रख कर अपने अना को मुतमईन किया.
ऊपर बताये गए मुल्क़ के तीन ख़ास इदारे सहाफत,
इंतेज़ामिया और अदलिया के बाद जो की मोहज़्ज़ब कौम की तामीर करदा इमारत में एहम किरदार
निभातें हैं, बिलआखिर अब मुल्क की फौज को सियासी खेल में खसीटने की बारी थी. पुलवामा हादसे के बाद जिस तरह से ज़ाफ़रानी सियासत
की ज़ुबानी जंग शुरू हुई और फौजियों की लाशों पे नफ़ा लेने की जो हिकमते अमली शुरू की
गई वो फौज को बलि का बैल बनाने का एक ज़िम्नी वाक़्या है. जिसने बालाकोट पाक में जंगल में की गई नाकाम एयर
स्ट्राइक की कोशिश को मज़ीद सरबराही इख़्तेयार कर ली. जिसने पाक इंतेज़ामिया के लिए अक़वामे मुताहिदा में
शिकायत का एक नया बाब खोल दिया. भारतीय फ़िज़ाई
हमला जंगलात को तबाह करने वाला और अक़वामे मुत्तहिदा के संद दीना और मौसमीयाती तब्दीली
हिकमते अमली की खिलाफवर्जी है. फिर भी ज़ाफ़रानी
बेहेस यहाँ पर नहीं रूकती है. बड़े घड़याल योगी
और विज़ अपने मुँह से गंदगी नकाले बगैर नहीं रुके.
कोई फ़िज़ाई हमले को मोदी का ५६ इंची सीने की शबी दे रहा है कोई कह रहा है बदला लेने की कुव्वत सिर्फ मोदी में ही है.
कोई भी ज़ाफ़रानी पाक की तरफ से अक़वामे मुत्तहिदा में जंगलात में किये गए नाकाम
भारतीय फ़िज़ाई हमले पे आने वाली परेशानी के ऊपर मुबाहिसा या बात चीत करने को तैयार नहीं
है
ताज़ा गंदगी की ज़ुबानी जमा ख़र्च में फौज
को सियासी अखाड़े में घसीटा जा रहा है और मुल्क की फौज को किसी खुसूसी रहनुमा के नाम
पे मोदी के फौजी बोल के खिताब किया जा रहा है.
मुल्क की फौज को मोदी के फ़ौजिओं का नाम देते वक़त ये ज़ाफ़रानी भूल गए की वो अपने
खुद के मुल्क के साथ गद्दारी के मुर्तक़िब हो रहे है. मोदी बादशाहत में इस तरह की बयान बाज़ी पिछले ५
सालों में एक आम बात थी. लेकिन मुल्क की फौज
को मोदी की फौज का नाम देना फौज में बगावत को आम करना है जो के भारत को खाना जंगी तक
ले कर जायेगे. क्योंकि फौज के ऐसे ऑफिसर्स
और जवान जो ज़ाफ़रानी दहशतगर्दी के हामी और मुवाफ़िक़ होंगे वो बराहे रास्त हुकुमाते हिन्द
के वफादार फ़ौजिओं से जंग के मोहाने पे आ जायेगे.
साधू रवि शंकर बाबरी मस्जिद के ऊपर मुल्क
के अवाम को खाना जंगी के नताइज की वजह से ख़ौफ़ज़दा करना चाहता था. अगरचे बोहोत पहले कुछ २०१५ में इस सहाफी ने खाना
जंगी का नाम लिया था लेकिन जिसकी वजह सख़्त तरीन नफरत, ज़हर और आलूद को बताया था ना के
बाबरी मस्जिद.
ये संघी दहशतगर्द
ना सिर्फ अवामी अलकों और सरकारी इदारों पे काबिज़ हो चुके हैं बल्कि वो मुसलमानों के
मामलात में भी इस्लामिक ज़ाब्ताये लिबास और दाढ़ी इख्तयार कर के मुलव्विस पाए जाते हैं. ये संघी
बकवास और गैर मुनासिब फतवे दे कर मुल्क और बेन अक़वामी अवाम को गुमराह करतें हैं. अब मुस्लिम दानिशमंदों, मौलानाओं और सियासी रहनुमाओं
की ये ज़िम्मेदारी है की अवाम को दुरुस्त तालीम दें. उनको क़ुरआन और हदीस की रौशनी में हक़गोई से आगाह
करें फिर उस बात की परवाह करे बगैर असली मौलाना अगरचे वो हाफिज सईद, अज़हर मसूद, सलाहुद्दीन
की या फिर पकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, अरबिस्तान या कोई और इस्लामिक मुल्क की अज़मत बयान
की जाती है तो बिला खौफ करें बजाये कुफ्रिस्तान (हिन्दू राष्ट्र) के कसीदे पड़ने और
बयान करने के सही बात बयां करें. मुसलमान
भाइयों अपनी ज़कात निकालते वक़्त होशियार रहिये, क्योंकि संघी दहशतगर्द आपकी ज़कात के
पीछे हैं और वो उसको ले कर मुसलमानों और इस्लाम को तबाह करने में इस्तेमाल कर रहे हैं.
English Version
No comments:
Post a Comment