Wednesday, 10 April 2019

अल्लाह के बरगोज़ीदा बन्दे.

अज़ीज़ नाज़रीन,

मुसन्निफ़ का पिछले मज़मून अल्लाह के बरगोज़ीदा बन्दे.  उसमे इस सहाफी ने अल्लाह के वलियों रूहानी शख्सियात के ऊपर मुश्तमिल जानकारी के ऊपर आप तमाम हज़रात को मालूमात दी थी.  उस मज़मून में वाज़े किया था की अगली नशिस्त में वाक़ियाये कर्बला से आप तमाम हज़रात को इल्म दलील की रौशनी में हक़ीक़त से रू बरू करूंगा. 

कर्नाटक का एडवोकेट फ़य्याज़ सईद जैसे लोग ग़लत बयानी कर बात की तशरीह ग़लत अंदाज़ में बयान कर के अवाम को गुमराही में धकेल रहे हैं और अहले ज़ौक़ हज़रात के दिलों दिमाग में वस्वसे और शुकूक डाल रहे हैं, जो की शैतानी अमल है.  हर वस्वसा बदगुमानी है, हर बदगुमानी गुमराही और हर गुमराह जहनुम्मी है जिसकी वज़ाहत मुसन्निफ़ इस मज़मून वाक़ेयाये कर्बला में करेगा.

जो बद अक़ीदा बद ईमान शहीद की अज़मत और हुर्मत पहचाने बिना फतवे लगतें हैं और हज़रते इमाम हुसैन की शाहदत को कोई बड़ी बात नहीं है कह कर अपने ईमान को गन्दा करते हैं.  ऐसे लोगों के लिए क़ुरआन की खुली दलील है के उनको मुर्दा मत कहो बल्कि वो तो ज़िंदा हैं.

शहादत से इस सहाफी का ये मज़मून शुरू होता है, जो वाक़ियते कर्बला पे जा कर रुकेगा.  पेश ऐ खिदमत है शहादत पे मुश्तमिल और हासिल की हुई जानकारी की पहली क़िस्त.  अल्लाह की रज़ा पे शहीद होने वाले मुसलमानों के लिए क्या अज़ीम नेमतें अल्लाह ने रखी हैं.  उखरवी ज़िन्दगी में जो इनामात उसको फ़राहम किये जायेगें वो तो अलग हैं लेकिन शहीद होने वाला मर्द मोमिन सिर्फ दुनियाँ से पर्दा कर लेता है असल में वो तो ज़िंदा हैं, फिर जो ज़िंदा हैं उनकी तब्लीग कैसे ख़त्म हो सकती है और इस्लाम और मुसलमानों की निस्बत से उनके अधूरे काम पूरे कैसे नहीं होंगे. 

कुरान सूरा अल बक़र में अल्लाह के रस्ते में शहीद होने वालों के लिए अल्लाह फार्मा रहा है के "उनको मुर्दा मत कहो वो ज़िंदा हैं लेकिन तुमको उनका  शऊर नहीं है".
  وَلاَ تَقُولُواْ لِمَنْ يُقْتَلُ فِي سَبيلِ اللّهِ أَمْوَاتٌ بَلْ أَحْيَاء وَلَكِن لاَّ تَشْعُرُونَ
जिसकी मज़ीद बद अक़ीदा लोगों के लिए अल्लाह ने सूरा अल इमरान में वज़ाहत कर दी जिससे आज के हालात में मुनाफ़िक़ों के गिरोह को मुस्लिम अवाम में बदगुमानी और वस्वसे डालने का मौक़ा नहीं मिले. एक ज़िंदा इंसान को रिज़्क़ की हाजत होती है और अगर शहीद या अल्लाह की राह में मरने वाले ज़िंदा हैं तो उनको रिज़्क़ कौन फ़राहम कर रहा है.     
وَلَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ قُتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَمْوَاتًا ۚ بَلْ أَحْيَاءٌ عِندَ رَبِّهِمْ يُرْزَقُونَ      
हरगिज़ मत समझना उनको जो अल्लाह की राह में क़त्ल हो जाएँ के वो मुर्दा हैं, वो ज़िंदा हैं और अपने रब के पास से रिज़्क़ पा रहे हैं.

जिस हिसाब से हज़रत ओसामा बिन लादेन रहीमुल्लाह अलैहे को संघी,  शिद्दत पसंद हिन्दू और कुछ ख़ौफ़ ज़दा मुसलमान बदनाम करते थे और उनकी अज़मत कम कर के बयान करते थे उनके लिए क़ुरान का फरमान खुली दलील है के वो ज़िंदा हैं.  खैर काफिरों को तो क़ुरान पे यकीन नहीं लेकिन जो मोमिन है अगरचे वो मुनाक़िफ़ भी हैं लेकिन क़ुरान के क़ौल से इंकार नहीं कर सकते.  और क़ुरआन शहीदों के लिए किया पैग़ाम दे रहा है वाज़े है.  

दूसरी बात हज़रते ओसामा बिन लादेन रहीमुल्ला अलैहे ने अपनी तमाम जायदाद इस्लाम की फलाह और हथियार खरीद फरोख्त या जिहाद के लिए वक़्फ़ कर दी थी और तोरा बोरा की पहाड़ियों पे एक फ़क़ीर के जैसे ज़िन्दगी बीता रहे थे. उनके पास उस वक़्त उतनी दौलत थी जो आज के दौर में भारत के अम्बानी ग्रुप या अज़ीम भाई के पास भी ना होगी. 

फिर कुछ मुसन्निफ़ ये कहतें हैं के अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पे हमला यहूद दहशतगर्द का किया हुआ था उसमे मुस्लिम अवाम या किसी भी मुस्लिम मुल्क़ के मुलव्विस होने के कोई सबूत नहीं हैं.  अगर ऐसा है और अमेरिका ने हज़रते शहीद ओसामा बिन लादेन को ग़फ़लत और झूट की बुनयाद पे शहीद किया तो उनका मर्तबा और भी बड़ा है.  क्योंकि उनको दुश्मन ने एक ऐसे गुनाह में शहीद किया जो उन्होंने किया ही नहीं था.  बिल फ़र्ज़ अगर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पे हमला हज़रते शहीद ओसामा बिन लादेन ने किया था, उनके पास ऐसा करने का पूरा जायज़ जवाज़ था.  

अमेरिका दहशतगर्द इजराइल को मदद कर रहा था और ग़ासिब इजराइल मासूम फलीस्तीनी मुसलमानों के ऊपर ज़ुल्म, जब्र, तशद्दुत और सितम कर रहा था. तो क़ुरान और अल्लाह के फरमान के हिसाब से ये हज़रते शहीद ओसामा बिन लादेन रहीमुल्लाह अलहे का रद्दो अमल भी क़ाबिले फख्र है.  फिर जो लोग नीम मुल्ला और नीम मुसलमान (बॉलीवुड में नाचने गाने वाले) फ़तवा देतें हैं क़ुरान का मफूम समझतें हैं मासूम का क़त्ल नहीं करना और जिस ने एक मासूम का क़त्ल किया उसने सारी इंसानियत का क़त्ल किया.  सही है दुरुस्त और सर आंखों पे.  लेकिन ये नाचने गाने वाले और नीम मुल्ला कुरान की तशरीह गलत अंदाज़ पे पेश करतें हैं.  मासूम उसको तस्लीम किया जाएगा जो उस मुल्क़ में रहता है जहाँ अमनो अमान है.  जिस मुल्क का हाकिम इन्साफ परस्त है.  हर तपके के लिए उसके दौरे हुकूमत में पुर सुकून माहौल है.  अब जिस मुल्क में क़त्ल और ग़ारत हो रहा है.  जो मुल्क जंग की अज़ीयत पहले ही भोग रहा है.  जिस मुल्क के हाकिम ने इराक़ जैसे मुल्क़ को सिर्फ और सिर्फ अपनी अना को क़ायम रखने के लिए तबाह और बर्बाद कर दिया.  १० से १२ लाख मुसलमानों को हलाक़ कर दिया.  फिर उस मुल्क के ऊपर बिल फ़र्ज़ हज़रते शहीद ओसामा बिल लादेन ने हमला किया और उसमे अवाम की बड़े पैमाने पे हलाकत हुई तो वो सभी मासूम का दर्जा नहीं रखते थे.  फिर जंग जैसे हालात में अवाम और फ़ौजिओं दोनों की हलाक़त तो होती ही है.  तो उस हिसाब से भी देखा जाए तो हज़रते शहीद ओसामा बिन लादेन रहीमुल्लाह अलहे का अमल बाइसे फख्र और बाइसे मुस्सरत था ना की बाइसे लानत और बाइसे मज़्ज़मत. 

पहले के तमाम सूफी और वली अल्लाह गुज़रें हैं उन सब में एक बात आम है जो इस सहाफी ने हज़रते शहीद ओसामा बिन लादेन रहीमुल्लाह अलहे में देखि सभी सूफी वली ऐ कामिल करोड़ पति होते थे.  दौलत का ज़खीरा रहता था लेकिन वो दुनयावी माल ओ दौलत को लात मार के पहाड़ों पे चट्टानों पे बियाबानों में जंगलात में अलहदगी इख्तियार कर के अल्लाह के ज़िक्र और अज़कार में लग जाते थे.  हज़रते इब्राहिम इब्ने अधम जो खलीफा ऐ वक़्त थे और उनके दौरे खिलाफत का दायरा बोहोत वसी था जिसकी तवक़्क़ो करना भी इख्तियार इंसान में नहीं है.  लेकिन जब फकीरी ली तो सभी तख़्त ओ ताज को ठुकरा दिया और एक दरिया के किनारे अल्लाह अल्लाह में लग गए.  उसी हिसाब से ग़ौसुल आज़म, जुनैद बग़दादी ये सब अमीर घरानों से ताल्लुक़ रखते थे.  लेकिन जब फ़कीरी ली तो सब कुछ छोड़ दिया.  हज़रते हाजी अली जिनकी हुकूमत बॉम्बे में दरिया ऐ अरब पे है वो भी काफी अमीर घराने से ताल्लुक़ रखते थे. 

जिस हिसाब से हाजी अली की जस्ते मुबारक उनके हुकुम के मुताबिक़ सुपुर्दे आब कर दी गई थी जिसका ज़िक्र पिछले मज़मून में किया जा चूका है. उसी हिसाब से हज़रते ओसामा बिन लादेन रहीमुल्लाह अलहे की जस्त को अमेरिकन हुक्काम ने सुपुर्दे आब कर तो दिया है लेकिन उनकी बुज़ुर्गी, रूहानियत और शहादत को ज़ेरे आब नहीं कर सका.  आती दुनियाँ उनके मर्तबे को फारमोश ना कर सकेगी.  जब पैमाना लबरेज़ हो जाता है तो झलक ही जाता है.  आज नहीं तो कल उनको भी आती दुनियाँ इज़्ज़त के साथ नवाज़ेगी और फ़ैज़याब होगी क्योंकि वो शहीद हैं. और शहीद कभी मरा नहीं करते.

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