Sunday, 14 April 2019

अल्लाह के बरगोज़ीदा बन्दे. (वाक़ियाए कर्बला) १ला - हिस्सा

अज़ीज़ नाज़रीन,

अल्लाह के बारगोज़िदा बन्दों की ये ३री क़िस्त है.  इससे क़ब्ल दो मज़मून पहले ही शाये किये जा चुके हैं, जिसमे वली ऐ कामिल और इस दौर के शहीद के बारे में तज़किरा किया गया था.   बाक़िया दो मज़मून वाक़ियाये कर्बला और शोहदाने कर्बला पे मुश्तमिल हैं.  

वाक़ियाये कर्बला

वाक़ियाए कर्बला से आज तमाम आलमी और अवामी बरादरी बा खूबी वाक़िफ़ होंगें. लेकिन  कुछ मुनाफिके इस्लाम कर्बला की जंग को इक़्तेदार की जंग मानते हैं, हक़ और बातिन की जंग,  या इस्लाम की दिफ़ा की जंग नहीं मानते जो सरासर बदगुमानी है और हर बदगुमानी गुमराही और हर गुमराह जहनुम्मी है.  कुछ फ़य्याज़ सईद जैसे वुक्ला कर्बला की निस्बत से अवाम के दिलों दिमाग में शक व शुकूक के बीज डालतें हैं वस्वसा पैदा करते हैं जो शैतानी अमल है. शक डालना वस्वसा डालना शैतान का काम है ना की रेहमान का अमल. 

ये लोग मुहर्रम की हुर्मत को इमाम हुसैन की शहादत और वाक़ियाये कर्बला की वजह से नहीं बयान करतें हैं.  बल्कि क़ुरआन के मफूम और हदीस की रौशनी में उसकी गलत तशरीह करतें हैं और बदगुमानी फेलतें है, वस्वसा डालतें हैं.   जिस तरह से रब्बे कायनात को अपने आप को इज़हार करना था इसलिए नबी सल्लम को पैदा फ़रमाया.  उसी हिसाब से मुहर्रम की इज़्ज़त, हुर्मत सिर्फ और सिर्फ वाक़ियाए कर्बला और हज़रते इमाम हुसैन आली मुक़ाम की शहादत की वजह से ही है. 

इनके हिसाब से क़ुरान में १२ महीनों का ज़िक्र आया है जिसमे ४ हुरमत वाले हैं, जिन चार महीनों का ज़िक्र कुरान में आया है उसमे एक मुहर्रम भी है.  जिसकी मज़ीद वज़ाहत नबी करीम ने बताई वो हुर्मत वाले महीने हैं ज़िल क़दा,  ज़िल हिज्जा, मुहर्रम और रजब.  फिर कहतें हैं की क़ुरान तो वाक़ियाये कर्बला से बोहोत पहले नाज़िल हुआ.  और नबी की जो हदीस है वो भी उस वाक़िये से काफी पहले की है.  तो मुहर्रम की हुर्मत और इज़्ज़त का कर्बला या इमाम हुसैन की शहादत से कोई लेना देना नहीं है वो तो पहले से ही हुर्मत वाला महीना है.

इस बद अक़ीदा बद ईमान एडवोकेट फ़याज़ सईद से कहना चाहता हूँ के अल्लाह तो आलिमुल ग़ैब, आलिमुल ख़बीर है.  उसको तो अगली पिछली सब चीज़ों का इल्म है.  फिर नबी जो ग़ैब की खबरदारी देते थे उनको भी इस बात का इल्म था की मुहर्रम में उनके लख्ते जिगर को शहीद किया जाएगा, तभी उसकी हुर्मत बयान की गई है.

बेशक वाक़ियाये कर्बला नबी के पर्दा करने के बोहोत बाद में हुआ लेकिन अल्लाह तो ग़ैब के हालात जानता है और नबी ग़ैब का हाल बताने वाले नबी हैं तो कर्बला का वाक़िया बाद में दरपेश आया लेकिन उसकी अज़मत और हुर्मत पहले ही नबी के सामने बयान हो चुकी थी, फिर अल्लाह भी सब जानता था और नबी को मालूम था की उनके लख्ते जिगर को उनके ही फैलाये हुए दीन में से एक मुनाफ़िक़ के हाथों शहीद होना पड़ेगा.  कर्बला की जंग नसीहत है उन मुनाफ़िक़ों के लिए जो आज अपने एयर कंडीशन कमरों में सिर्फ ज़ुबानी जमा खर्च करते हैं.  हज़रते इमाम हुसैन की शहादत पे भी तनक़ीद करतें हैं.  असल में शहादते हुसैन अल्लाह की रज़ा, इश्क़ के हक़ीक़ी की बेहतरीन मिसाल है.  जो अल्लाह से सच्ची मोहब्बत करता है उसके पास दोनों जहाँ की ताक़त और क़ुव्वत होते हुए भी अल्लाह की रज़ा के लिए अपने ६ महीने के लख्ते जिगर तक को क़ुर्बान कर दे ये बोहोत बड़ी बात है.

आज के दौर में एक बादशाह जिसके पास माल और दौलत के ख़ज़ाने खुले हुए हैं, अपनी औलाद को ज़र्रा बराबर बीमारी होने पे तबीबों की फौज खड़ी कर देता है. तो हुसैन तो दोनों जहाँ के बादशाह थे और क्या उनको ये मालूम नहीं था की अब आगे क्या होने वाला है और क्या वो हर उस नामुमकिन समझे जाने वाले अमल पे क़ादिर नहीं थे जो दुनियाँ नहीं कर पाती.  कर्बला में जो कुछ भी हुआ वो सिर्फ इंसानी अमल नहीं था बल्कि उस जंग में यज़ीद और उसकी फौज को शियातीन की मदद हासिल थी. लेकिन हुसैन जो अल्लाह के इश्क़ में दीवाने थे और शैतान को दिखाना मक़सूद था,  तू अल्लाह के बारगोज़ेदा बन्दों को ज़र्रा बराबर अपने मक़सद से हिला नहीं सकता और सबक़ है उन लोगों के लिए जो सिर्फ अल्लाह की रज़ा का दिखावा करतें हैं और हदीस का लबादा ओढे रखतें हैं लेकिन जब इम्तेहान की बारी आती है तो शिकवा शुरू हो जाता है.  अपने नाना के लाये हुए दीन की दिफ़ा और अल्लाह की रज़ा के लिए सय्यदना हुसैन रदियल्लाह ने अपने पूरे एहले खाना को कुर्बान कर दिया. 

अगर मुहर्रम की हुरमत कर्बला की जंग की वजह से नहीं होती, तो आप नबी सल्लम हज़रते महविया को ऐसा काहे को कहते, के आपकी नस्ल में से एक शख्स मेरी नस्ल के क़त्ल का ज़िम्मेदार होगा.  आप हज़रते महाविया ने कई साल इसीलिए निकाह नहीं किया.  लेकिन अल्लाह को भी हज़रते हुसैन की शहादत ले कर शैतान और आज के दौर में मुनाफिके इस्लाम को बताना था की अल्लाह की रज़ा में अपना सब कुछ क़ुर्बान करना इतना आसान नहीं है.  ६ महीने के अली असग़र और १६ साल के अली अकबर, की शाहदत.  फिर हज़रते महाविया की शर्मगाह में बीमारी लग गई, और उसका इलाज सिर्फ और सिर्फ हमबिस्तर होना था.  फिर भी आपने कई सालों तक निकाह नहीं किया.  लेकिन तकलीफ की शिद्दत बेहद बढ़ गई और बर्दाश्त के बहार हो गए तो मजबूर हो गए और आपने निकाह किया, और यज़ीद मलऊन आपकी नस्ल से पैदा हुआ.
    
फिर जब हज़रते इब्राहिम ने ख़्वाब देखा तो उसकी ताबीर पूरी करने के लिए हज़रते इस्माइल को अल्लाह की राह में क़ुर्बान कर दिया.  लेकिन वो तो सिर्फ इम्तेहान था असल क़ुर्बानी तो अल्लाह ने नबी सल्लम के नवासे के हक़ में लिखी थी.  ताके आती दुनियाँ के लिए इबरत बन जाए की अल्लाह से असली मोहब्बत किस को कहते हैं.  में पूछता है उन बद अक़ीदा से जो क़ुरान और हदीस का मफूम समझातें रहतें हैं और सिर्फ अपने आपको अल्लाह के हर हुकुम पे सरे तस्लीम ख़म करने वाला समझते हैं.  क्या अल्लाह की रज़ा के लिए उसकी मोहब्बत के लिए उन लोगों का  पैमाना ऐसा हो सकता है की अपने खुद के हाथो में ६ महीने के बच्चे का जनाज़ा.   में उन बद अक़ीदा से पूछना चाहता हूँ उनके घरों में सिर्फ एक दिन पूरी तरह से पानी बंद कर दिया जाए तो उसकी क्या कैफियत होगी.  ऐसा नहीं है की हज़रते हुसैन के पास रूहानी क़ुव्वत और उसत नहीं थी.  आप एक दुआ करते तो पानी बहता हुआ आपके लभों तक पहुंच जाता.  पानी खुद बे क़रार था हज़रते हुसैन और एहले बैत की प्यास बुझाने के लिए.  लेकिन वो आती दुनियाँ को दिखाना चाहते थे की अल्लाह की रज़ा में सरे तस्लीम ख़म और अल्लाह की मोहब्बत किस चीज़ को कहतें हैं.  सुलह हुदैबिया से क़ब्ल जिस नबी के दस्ते मुबारक से पानी के चश्मे जारी हो गए हों और तमाम सहाबा सराबोर हो कर पानी पीएं,  नहाये और अपनी तमाम ज़रूरतें पूरी करें क्या उस नबी के नवासे को पानी के लिए तरसना पड़ता.  नहीं हरगिज़ नहीं.  आप हुसैन एक दुआ करते तो पानी का सैलाब आ जाता और खूब सराबोर हो कर अपनी और अपने एहले खाना की प्यास बुझाते. 

फुकहा बतातें हैं जब हज़रते हुसैन अलैहे सलाम अली असग़र को ले कर पानी लेने पहुंचे तो फौज का एक सिपाही कहता है.  हुसैन क्यों हमारे आक़ा (यज़ीद) से जंग कर रहे हो तुम प्यासे ही मरोगे.  उसपे हज़रते हुसैन ने फ़रमाया प्यासा तू मरेगा में नहीं.  फुकहा बताते है इमामे हुसैन के मुँह से ये अलफ़ाज़ निकलना थे की उस मलऊन को शदीद प्यास लगी और वो जंग का मैदान छोड़ छोड़ के मशक पे मशक पानी पी जाता लेकिन उसकी प्यास ख़त्म नहीं हो रही थी. और वो उसी तरह प्यास से तड़प तपड़ के मर गया.   जब आपके लभे मुबारक से निकले हुए अलफ़ाज़ में इतनी तासीर थी की वो सच्चे हो गए तो क्या आपकी दुआ में तासीर नहीं होती.  जो लोग तनक़ीद करतें हैं हज़रते हुसैन पे की कर्बला की जंग इक़्तेदार और खिलाफत की जंग थी.  कर्बला की जंग इक़्तेदार और अपने अना को क़याम रखने की जंग नहीं बल्कि हक़ और बातिन की जंग थी.

खिलाफत तो पहले ही उनके भाई हज़रते हसन रज़े अल्लाह अन्हा के पास आ चुकी थी, और वो उस खिलाफत से दस्तबरदार हो चुके थे. हज़रते अली मुर्तुज़ा के दौरे खिलाफत में जब मुसलमानों ने हज़रते अली से पुछा क्या हम हज़रते हसन रज़े अल्लाह से बैत कर लें तो उन्होंने कहा ये तुम्हारा मामला है ना में रोकता हूँ और ना तुमको ऐसा करने का हुकुम देता हूँ.   हज़रते अली की शहादत के बाद हज़रते हसन को तमाम मुसलमानों ने खलीफा तस्लीम किया और उनके हाथ पे खलीफा की बैत ली और वो ६ महीने तक खिलाफा बने रहे. 

ये ६ महीने खिलाफते राशिदा के इख़्तेदाम था.  उसके बाद शुरू हुआ मुलूक़ियत का दौर और  इन ६ महीनों के बाद हज़रते माहविया रज़े अल्लाह खलीफा बने थे.  हदीस में आया है खिलाफते राशिदा ३० बरस रहेगी. जिसमे हज़रते अबूबकर, हज़रते उमर, उस्मान गनी राजे अल्लाह अन्हा और अली करमल्लाहो वजहा के दौरे खिलाफत शामिल हैं, बिल आखिर हज़रते हसन के ६ महीने की खिलाफत मिला लें तो ही ३० बरस पूरे होतें हैं.  उसके बाद मुलुकियत का दौर शुरू हुआ.  अमीर महविया के दौरे खिलाफत को खिलाफते राशेदा में शामिल नहीं किया जा सकता. क्योंकि उनको खिलाफत मुशावरत से हासिल नहीं हुई थी.  खिलाफते रशेदा की अव्वलीन शर्त क़ुरान के हुकुम के हिसाब से अमरहूम बयना शुरोहुम.  राये मशोरा कर के साथ नाम ज़द किये गए. 

हज़रते महविया को राये शुमारी हासिल नहीं थी और वो कई हज़ार फ़ौजिओं के लश्कर ले कर शाम से चले और इधर से हज़रते हसन इब्ने अली रज़ि अल्लाह अपने ५०,००० आदमियों के साथ निकले.  लेकिन उनको ये एहसास हो गया था की उनकी फौज में कुछ ऐसे फसादी अंसर भी मौजूद हैं जो किसी भी अच्छे काम को पसंद नहीं करते. लेकिन खित्ते में क़त्ल व ग़ारत हो अमन सुकून तबाह हो मुस्लिम नस्ल कुशी हो तो हज़रते हसन ने हज़रते महविया को पैगाम भेजा के में मुसालेहत चाहता हूँ बताइये शराइत क्या हैं.  हज़रते महविया ने एक सफ़ेद कागज़ हज़रते हसन के पास भेज दिया और कहा जो भी शराइत आप चाहें लिख दें. हज़रते हसन ने शरत लिखी और खिलाफत की नुमाइंदगी से दस्तबरदार हो गए.

फिर कर्बला की जंग क्यों हुई
                                                                            मज़मून पेज २ में जारी रहेगा ......

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