कश्मीरियों को दहशतगर्द बोलना बंद करो.
नाज़रीन
आज सहाफी अपना मज़मून एक अलग कैफियत में लिख रहा है जिसमे सख्त तनक़ीद है हुकूमते हिन्द
के लिए, हिन्दू शिद्दत पसंदों के लिए, मुस्लिम रहनुमाओं की उस जमात के लिए जो हुकूमत
के तलवे चाटते हैं और हक़बयानी से डरते हैं और ख़ास उस मुस्लिम सियासतदान के लिए जिसकी
जमात का नाम तो मुस्लिम है लेकिन काम मुनाफ़िक़ों जैसे हैं.
नाज़रीन
हाल ही के पुलवामा हादसे के बाद पनपे भारत पाक कशीदगी से तमाम मुल्क के अवाम और बेनक़वामी
मुमालिक बा खबर होंगें. खैर पाक की पाकीज़गी
और वज़ीरे अज़ाम इमरान खान की दानिशमंदी, सूझ बूझ से जंग का खतरा फ़ौत हो गया और हालात
मज़ीद साज़गार होने की उम्मीद है. ये सहाफी मुसलसल कश्मीरी अवाम के हक़ की बात करता
है और हमेशां उनके, मुस्लिम अवाम, दलितों के हुकूक की हक़तल्फ़ी के खिलाफ ख़तम अल खत
लिखता है. आइये एक एक कर के हुकूमते हिन्द,
हिन्दू दहशतगर्द और हिन्दू शिद्दतपंसद, मुस्लिम रहनुमा और मुस्लिम सियासतदान चारों का
तब्सिरा करतें हैं.
१. हुकूमते
हिन्द पे तब्सिरा
हुकूमते हिन्द कश्मीरी
अवाम के आज़ादी की जंग को दहशतगर्दी का नाम देती है जो बिलकुल ग़ैर वाजिब और ना मुनासिब
बात है. क्योंकि कश्मीरी अवाम ने भारत को अपना
मुल्क तस्सव्वुर ही नहीं किया है और ना ही हुकूमत के किसी भी इक़दाम में अपने आपको शरीक
मानते हैं. उनका और इस सहाफी का भी मानना है या तो कश्मीर
पाकिस्तान का हिस्सा है या आज़ाद है, और हुकूमते हिन्द का फौजी फ़ैल ख़िलाफ़े अमन है और
बेन अक़वामी कानून की ख़िलाफ़वर्ज़ी है, हुकूमते हिन्द ने फौज को कश्मीरी अवाम के ऊपर मुस्सलद
किया हुआ है जो जंगी जराइम कर रही है. दूसरी
बात हुकूमते हिन्द के हिसाब से अगर कश्मीरी अवाम दहशतगर्द हैं तो तात्या टोपे कौन था,
राजगुरु, सुखदेव कौन था. रानी लक्ष्मी बाई
जिसके बारे में कसीदे कसे जाते हैं, वह कौन थी, उनकी बहादुरी के किस्से आज तारीख में
बताये जाते हैं. आज़ाद भारत में बच्चों को उन
आज़ादी के सिपाहीओं की कश्फ़ दी जाती है. आज
के आज़ाद भारत में वाल्दैन अपनी बच्चिओं को स्कूलों के शकाफति इज्लासों में रानी लक्ष्मी
बाई के जैसी शबी इख्तियार कर के फख्र महसूस करते हैं. ये सभी लोग कौन थे क्या ये लोग बाग़ी और दहशतगर्द
नहीं थे. क्या इन्होने अपने वतने अज़ीज़ के लिए एक बाहरी ताक़त और फौज से लोहा नहीं लिया. क्या इन लोगों ने कभी भी अपने आपको अंग्रेज़ों का
ग़ुलाम तसुव्वर किया. नहीं हर्गिज़ नहीं. तो जब पहले के लोग बाग़ी, दहशतगर्द नहीं ब्लकि आज़ादी
के सिपाही हैं तो आज के दौर में कश्मीरी कैसे दहशतगर्द हो गए, वो भी आज़ादी के सिपाही
हैं, नहीं तो पहले वाले भी दहशतगर्द हैं.
२. हिन्दू
दहशतगर्द और हिन्दू शिद्दतपंसद
आज हिन्दू शिद्दत पसंद
तमाम ऐसे लोगों को बाग़ी और मुख़ालिफे वतन तस्सव्वुर करतें है जो हक़गोई की बात करतें
हैं. ये शिद्दत पसंद कश्मीर को तो भारत का
हिस्सा मानते हैं लेकिन कश्मीरियों को नहीं.
पुलवामा हादसे के बाद जो ज़ुल्म और ज़ब्र कश्मीरी तालिब इल्मों के ऊपर हुआ वो
किसी से भी पोशीदा नहीं है. जिसके बारे में पुलवामा हादसे के बाद ये सहाफी ३-४ मज़मून
लिख चूका है. ठीक है कश्मीरी बाग़ी हैं वो अपने
आपको भारतीय तस्सव्वुर नहीं करते, तो आप अपने राजा शिवाजी भोसले को काहे को सराहते
हो. उनके बारे में क़सीदे काहे को कस्ते हो. जब कभी भी ५६ इंची सीने की बात होती है और अपने
हक़ को लेने की बात होती है तो आप लोग शुरुआत ही इस जुमले से करते हो “शिवाजी महाराज
ने आज हिन्दू सामाज को जीने का हुनर सिखाया”.
शिवाजी ने क्या किया था तब की मुगलिया हुकूमत के खिलाफ बगावत की थी. क्योंकि
वो अपने आपको मुगलों का गुलाम तस्सव्वुर नहीं करते थे. मुगलिया भारत के हुकूमत का कोई भी फरमान शिवाजी
नहीं मानते थे, उस बात को आज फख्र से कहा जाता है और हिन्दू शिद्दत पंसदों में मज़ीद
आलूद भरा जाता है लेकिन उस आलूद की तशरीह गलत अंदाज़ में की जाती है. अगर शिवाजी बागी नहीं थे और उन्होंने उस दौर के
भारत के हाकिम के खिलाफ बगावत नहीं बल्कि आज़ादी की जंग लड़ी थी तो कश्मीरी कैसे बागी
हो गए. अगर शिवाजी दहशगर्द नहीं थे तो कश्मीरी
कैसे दहशतगर्द हो गए. अगर आज शिवाजी के औरग़ज़ेब
के खिलाफ बागी तेवर, आज़ादी के अमल को सराहा जाता है, हौसला अफ़ज़ाई की जाती है, तो वही
बात अगर कश्मीरी कर रहे हैं तो उनको काहे को नहीं सराहा जाता है फिर उनको काहे को बागी
और दहशगर्दों जैसे अलफ़ाज़ से नवाज़ा जाता है.
३. मुस्लिम रहनुमा
पुलवामा हादसे के बाद मुस्लिम
रहनुमा मौलानाओं की एक जमात हुकूमत के सख्त ख़ौफ और तशद्दुत के साये में आ गई. और जंग
के हालात बनने पे लगे हुकूमते हिन्द के मुवाफ़ेक़त में बयानात देने. हम हुमुमते हिन्द
के किसी भी फैसले में साथ खड़े हैं. हम भारतीय फौज के साथ हैं. हम पाकिस्तान को ललकारते
हैं जल्द से जल्द अभिनन्द को रिहा करे. बोहोत अच्छी बात है आपके अंदर वतन की मोहब्बत
है लेकिन आप लोगों का दिल काला है. दोहरा रव्वैया
है एक के लिए कुछ और बयान दुसरे के लिए कुछ और.
रज़ा अकेडमी के सरबराह सईद नूरी उनकी और उनके अकीदतमंदों की कुछ मजबूरी होगी
जो हुकूमते हिन्द के खिलाफ हक़ बयानी करने से डरते हैं. लेकिन वही बात बेरुन मुल्क मुस्लिम हक़ तलफि की बात
आती है तो एहतेजाजी मोहीम में सरे फेहरिस्त नज़र आतें हैं.
पिछले साल इजराइल के सरबराह
नितिन याहू भारत आये थे, तो ये वही राजा अकेडमी थी जिसने तक़रीबन भारत के हर बड़े शहर
में एहतेजाज किया था. और उनके मशायक़ीन गले की नसों को फूला फूला के नितिन याहू के खिलाफ
इश्तेआल अंगेज़ी कर रहे थे. उनके हिसाब से इजराइल
मासूम फलस्तीन अवाम की हक़तल्फ़ी कर रहा है उनको गोलिओं से भून रहा है. तो वही बात भारत के ऊपर भी लागू होती है वो भी तो
कश्मीरी अवाम के साथ वही कर रहा है जो इजराइल फलस्तीन के साथ करता है. अगर आप भारत हुकूमत के साथ कश्मीरी अवाम के खिलाफ
खड़े हैं तो इजराइल के खिलाफ फलस्तीन के साथ कैसे खड़े हो सकतें हैं क्योंकि इजराइल हुकूमत
आपने वतन के फेवर में काम कर रही है. फिर मौलानाओं
की जमात समझती है इजराइल फौज ज़ुल्म, तशद्दुत, जब्र की रह चल रही है वो फलस्तीनी अवाम
की हक़तल्फ़ी कर रही है फिर अगर वही रह पे हुकूमते हिन्द चल रही है वही काम भारतीय फौज
कश्मीरी अवाम के साथ कर रही है तो एक सही दूसरा गलत कैसे हो सकता है. फिर ये
मौलानाओं की जामत ही थी जिसने कांग्रेस दौरे हुकूमत में मुंबई में बर्मा हुकूमत के
रोहंगिया मुसलमानो पे ज़ुल्म और तशद्दुत के
खिलाफ ज़बरदस्त एहतेजाज किया था. फिर वही काम
अगर हुकूमते हिन्द कश्मीर में कर रही है तो आप लोग हुकूमते हिन्द के साथ कैसे खड़े हो
सकतें हैं. एक सही तो दूसरा गलत कैसे हो सकता
है.
फिर अगर मौलानाओं की जमात
समझती है के ये एक्तेदार की लड़ाई है और हक़
ना इंसाफ़ी की लड़ाई नहीं है ब्लकि सियासी लड़ाई तो ये भी बताते चलें की उनकी राये कर्बला
की जंग के बारे में क्या है. और इमाम हुसैन
को वो अपना लीडर मानते हैं या यज़ीद को. यज़ीद
हाकिम था और इमाम हुसैन हक़तल्फ़ी, ना इंसाफ़ी, ज़ुल्म, तशद्दुत, जब्र के खिलाफ थे. इमाम हुसैन ने यज़ीद को ना तो खलीफा तस्सवुर किया
था और ना ही उसको इमाम माना था. अगर आज के
दौर में ये मौलानाओं की जमात हुकूमते हिन्द के साथ हैं जो कश्मीरी अवाम की हक़तल्फ़ी
कर रही है तो साबित होता है मौलानाओं की जुबां पे कुछ और है और दिल में कुछ. मौलानाओं
की जमात हर दौर में हुकूमत की गुलाम और हामी थी, है और रहेगी चाहे वो उस वक़त की यज़ीदी
दौरे खिलाफत हो या आज की हुकूमते हिन्द.
४. मुस्लिम सियासतदान
असदुद्दीन ओवेसी जो मुस्लिम
अवाम की लाशों पे अपनी सियासी रोटियां सेक रहा है, उस बेखौफ निडर लीडर के ऊपर इतना
हुकूमत का ख़ौफ और ग़लबा के अपनी हैसियत भूल गया और लगा हुकूमते हिन्द के मुवाफ़ेक़त
में ऐसे बयानात देने जो हिन्दू शिद्दत पसंदो से शबी रखतें हैं. असदुद्दीन कहता है जैश ए शयातीन अरे ना मुराद मौलाना
अज़हर ने उस मजलिस को मोहम्मद का नाम दिया है उस नाम की लाज तो रखता. अगर मुँह से गंदगी निकालना बोहोत ही ज़रूरी था तो
अपने आक़ा के नाम की लाज रख कर गंदगी निकालना थी.
अपना एक मक़सूस वोट बैंक मुस्तहकम करने के चक्कर में तू इतना गिर गया की आका
के नाम को तूने शैतान बोल दिया. और वही तो
संघी बोलते हैं मोहम्मद सल्लम को वो लोग बराहे रास्त बरजस्ता बोलते हैं तूने
इशारे किनायों में बोल दिया मक़सद तेरा भी वही था जो संघी और तशद्दुत पसंद तंज़ीमों का
मोहम्मद सल्लाहो अलैहे वस्सल्लम के बारे में रहता है.
एवान में तू मुस्लिम हक़
के बारे में बड़ी बड़ी तक़रीर करता है तुझे ये नहीं मालूम के कश्मीरी अवाम के साथ भारीतय
फौज सख्त ज़ुल्म कर रही है उनको सख्त तरीन अज़ीयत पंहुचा रही है और वो लोग अपने हक़ के
लिए लड़ रहे हैं. फिर तूने एक मौलाना एक नमाज़ी परेहज़गार खुशदिल इंसान को शैतान बोला
है इसका कफ़्फ़ारा तो तेरे को अल्लाह को देना पड़ेगा. पोशीदा या बरहना. एक इंसान अल्लाह के लिए इबादत करता है उसकी हम्दो
सना करता है और तू उस इंसान को शैतान की शबी दे रहा है. दूसरी बात फिर तू क़ुरआन और हदीस को भी झुटला रहा
है. रसूल्ललाह ने क्या जिहाद नहीं किया, क्या
सहाबा ने अपने हमसायों और इस्लाम की दिफ़ा के लिए ज़ालिम से लड़ाइयां नहीं लड़ी. फिर अगर वतन की मोहब्बत तुझसे ज़्यादा रसूल्लाह और
सहाबा किराम में होती तो ज़्यादातर जंग तो मक्का में उस वक़्त के हाकिम यहूदिओं से लड़ी
गई. फिर तू आज के हाकिम एक काफिर ज़ालिम के
साथ खड़ा है और कश्मिरिओं के हक़ में बयान देने के बजाये तू एक मौलाना खुश दिल सूरत
इंसान को शैतान कह रहा है.
इस सहाफी को तुझ जैसे इंसान
को समझने में बोहोत बड़ी भूल हो गई. तिलिंगाना
इंतेखाबात में तेरे और तेरी तंज़ीम की हिमायत कर के इस सहाफी ने हिमाक़त कर दी, जो इंसान वतन की मोहब्बत में इतना अँधा हो जाए की
उसको ज़ुल्म, ज़ालिम, तशद्दुत, दहशगर्दी में फ़र्क़ ही महसूस ना हो जो वतन की मोहब्बत में
हक़बयानी करने से डरे तो ऐसे सियासतदान का अल्लाह हाफिज ही है. फिर तुझमे और मोदी में तुझमे और संघी दहशतगर्दों
में तुझमे और हिन्दू तशद्दुत पसंदों में क्या फर्क रह गया.
मुसलमानों के हक़ में झूटी
और दोग़ली मोहब्बत तो हर कोई दिखाता है. लेकिन
सच्चा साथी वो जो बुरे वक़्त में भी हक़ बयानी से नहीं डरे. जो अच्छे वक़्त में सदन में सिर्फ ज़ुबानी जमा खर्च
करतें हैं और बुरे वक़्त में हुकूमत के तलवे चाटते है और हक़बयानी से डरतें हैं ऐसे लोगो
से मुसलमानों को मोहताद रहने की ज़रुरत है.
हुकूमते हिन्द कश्मीर के
नवजवानों को दहशतगर्द बोल के उनका सोची समझी ततबीर के साथ क़त्ल कर रही है और दहशतगर्दी
के नाम पे फौज को उनका क़त्ल करने का परवाना दे दिया है.
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