अज़ीज़ नाज़रीन,
वतने अज़ीज़ में जो ख़ामोशी छाई हुई है, हर चेहरा मायूस
हर सूरत उदास नज़र आती है. इस ख़ामोशी को क्या
समझा जाए तूफ़ान और तबाही आने से पहले की खामोशी या हालात साज़गार होने की पेशबंदी है. हर नज़र उस मसीहा को तलाश रही है जिसकी जानिब उम्मीद
की जा सकती है, के वो अच्छे दिन ले कर आएगा.
पिछले कुछ महीनों से या यूं कह लीजिये दिसंबर २०१८
से इस सहाफी के इंग्लिश, उर्दू और हिंदी ब्लॉग के मज़मून में कुछ ख़ुसूसियाती हिस्से गायब कर दिए गए
थे. इसी हिसाब से फेसबुक और ट्वीटर से कुछ
ख़ुसूसियाती हिस्से जून २०१४ के बाद से ही गायब हो गए थे.
इस ज़लील हरकत का सीधा सीधा ताल्लुक़ मोदी इंतेज़ामिया से था. क्योंकि वो ख़ुसूसियात किसी भी मज़मून को मक़बूलियत फ़राहम
करने में साज़गार थे. इस सहाफी की तनक़ीदीया
मज़ामीन उस मौजूदा दौरे हुकूमत के लिए होतें हैं जो इक़्तेदार में होती है, और २०१४ से सहाफत और सोशल
मीडिया मोदी हुकूमत के ज़ेरे क़यादत काम कर रही है.
तो मोदी इंतेज़ामिया ये कैसे बर्दाश्त कर लेती के उसकी अक़लियतों, दलितों, ख्वातीनों
और अवाम की फलाह-बहबूती की निस्बत से की हुई बदकारिओं और बदआमालियों का तज़किरा मन्ज़रे
आम पे हो, तो वो सभी ख़ुसूसियाती हिस्से इस सहाफी के ब्लॉग आर्टिकल्स, ट्वीटर और फेसबुक से गायब हो
गए थे, जिसकी वजह से मोदी इंतेज़ामिया का बरहना कारोबार अवाम के रू बरू हो जाता था.
लेकिन आज सुब ये देख कर बड़ी हैरानी हुई की एक ख़ुसूसियात फिर से इस सहाफी के फेसबुक अकाउंट पे नज़र आ रहा है. इस तरक़्क़ी से क्या तवक़्क़ो की जाए, क्या मोदी इंतेज़ामिया
का बाजा बजने वाला है और नई हुकूमत के आने का इमकान है. क्योंकि मोदी इंतेज़ामिया तो कोई भी सुहूलियत उन
सहाफिओं को हरगिज़ हरगिज़ नहीं फ़राहम करेगी जो उसके खिलाफ लिखते हैं. हालात साज़गार हो रहे हैं और सहाफत को आज़ादाना माहौल
धीरे धीरे फ़राहम हो रहा है उसकी सिर्फ और सिर्फ दो ही वुजूहात इस सहाफी को समझ में
आती है. एक मोदी इंतेज़ामिया अपनी पकड़ कमज़ोर
कर रही है जिसकी वजह से फेसबुक जैसे आलमी सोशल नेटवर्किंग साइट ने उनकी बात को मांनने
से इंकार कर दिया. दूसरी हुकूमत बदलने वाली
है जिसकी वजह से कोताही की दुरुस्ती अपने आप होना शुरू हो गई है.
ख़ैर वजह चाहे कुछ भी हो अगरचे मोदी इंतेज़ामिया को
अब अपनी ग़फ़लत का एहसास हो गया और वो सहाफत की आवाज़ को आला मुक़ाम पे पहुंचाने का नया
अज़्म लेकर आई है या हुकूमत बदलने वाली है दोनों ही सूरतों में ख़ुदमुख़्तार सहाफिओं के
लिए खुशखबर है और लंगूर-लँगूरनिओं के लिए बुरे दिन आने का इमकान है.
اس صحافی کی
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addition of this Journalist
हिंदी रसम अल खत उर्दू अलफ़ाज़
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