Wednesday, 6 December 2017

इस हार का ठीकरा किसके सर पे फोड़ू


हस्बे आदत बीजेपी और हिन्दू आतंकी पाखंड, झूट और फरेब पे यकीन रखते है. झूटी खबरों का संचालन करना और उसको आम करके ये लोग इतिहास को भी तब्दील करना चाहते है. इस तरह की झूटी और फरेबी खबरों की कड़ी में इस पत्रकार ने एक लेख लिखा हे हिंदू मुख्य न्यायमूर्ति ने अपने ही सहिष्णु धर्म का...  जिसमे इस पत्रकार ने हिन्दू आतंकवादीओ का मुख पत्र आज तक के खबर के शीर्षक और उसके सार की धज्जिया उड़ाते हुए विश्लेषण किया है के किस तरह से संपादक खबर को गलत रूप दे कर ऐसा दिखाना चाहता है जिससे प्रतीत हो के बंगलादेश के पहले हिन्दू न्यायमूर्ति को उनके धर्म की वजह से तकलीफ दी गई. 


झूट फरेब फैलाना अब बीजेपी की आदत बन गई है यही वजह है के देश का सबसे बड़ा झूठा आज पंत प्रधान की पोस्ट पे काबिज़ है हालांकि उसकी काबिलियत, निति और शिक्षा उसकी पोस्ट का मज़ाक बनाती है न सिर्फ देश में बल्कि विदेशो में भी अब तो पत्रकार और न्यूज़ एजेंसीज उसको चाय वाला प्रधान कह के सम्बोदित करते है. इसी कड़ी में बीजेपी का एक और झूट पकड़ में आया है। उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों में मिली हार को जीत जैसा प्रोजेक्ट करने का झूट। बीजेपी ने सोचा होगा जब झूट ही बोलना है तो कुछ भी बोल दो कौन रोकने वाला है देश हमारा है, मीडिया के लंगूर हमारे है, जनता नादान है जो कहोगे उसपे यकीन कर लेगी। लेकिन अब जनता १९४७ वाली नादान नहीं है और मीडिया के लंगूर कुछ भी कहे अब सोशल मीडिया लंगूरो के मीडिया से ज़्यादा शक्तिशाली हो चूका है जो किसी भी लंगूर मीडिया वालो की धज्जिया उड़ाने में सक्षम है।


झूट की इस कड़ी में आते है उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव के नतीजे जिसमे बीजेपी ने अपने आतंकवाद समर्थित लंगूरो की मीडिया टीम के ज़रिये फरेब फैलाना शुरू कर दिया जिससे ऐसा प्रतीत हो के उत्तर प्रदेश में विधान सभा के बाद अब गली कूचो का भी भगवाकरण हो गया है. जबकि ऐसा नहीं है कई सीट ऐसी हैं जहां बीजेपी के उम्मीदवार अपनी जमानत भी जब्त होने से नहीं बचा सके। बीजेपी को जिन सीटों का नुकसान हुआ है वह पिछले निकाय चुनाव से कहीं ज्यादा है। बीजेपी के 3,656 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई है जबकि 2,366 सीट पर उन्हें जीत मिली है। जीती हुई सीट की अपेक्षा हारी हुई सीट की संख्या ज्यादा है।


इन लंगूरो की टीम को फारूक अब्दुल्लाह ने ज़बरदस्त तरीके से धो डाला था।  हिन्दू आतंकिओ के मुख पत्र आज तक के एक पत्रकार प्रसून कुमार वाजपाई के एक बेहूदा सवाल पे फ़ारूक़ अब्दुल्लाह बेहद भड़क पड़े थे. मंच के नीचे बैठे मीडिया के लंगूर जो वाजपाई के बेहूदा, घटिया, सवाल पे ताली ठोंक रहे थे सब खमोश हो गए जैसे किसी ने राष्ट्रगान शुरू कर दिया हो या साम्प्रदाइक, ज़हरीला, आतंकवादीओ का समर्थित गाना 'गंदे हो जा नरम'


इस पत्रकार ने अपने लेख अंगूर खट्टे में नहीं खाती में विश्लेषण किया है और कहा है के उत्तर प्रदेश में योगी को सत्ता पे काबिज़ हुए महीने हुए है तो एंटी इंकम्बेंसी फेक्टर वहां काम नहीं कर पाया और जनता ने बीजेपी को एक और मौका देने का मन बना लिया है। लेकिन जैसे जैसे पत्रकार के पास तथ्य सामग्री आती गई चीज़े और साफ़ होती गई। बीजेपी भले ही अपनी हार जग ज़ाहिर ना करे लेकिन सांच को आँच ही क्या. अब तो समूची देश की जनता को पता चल चूका है की उत्तर प्रदेश निकाय चूनाव मे बीजेपी जीती नही परंतू हारी है ओर बीजेपी का ग्राफ़ लगातार नीचे की तरफ रहा है. निकाय नतीजो के बाद बीजेपी ने संघी आतंकवादीओ के हामी न्यूज़ एजेन्सीस के सहारे एसी हवा बाँधी थी के एसा लगे की उत्तर प्रदेश मे बीजेपी का प्रचम लेहरा गया है ओर उत्तर प्रदेश की गालियो का भगवाकर्ण हो गया है. लेकिन जेसे जेसे स्थिति सॉफ होती गई ओर कोहरा हटता गया चीज़े सॉफ नज़र आने लगी की अस्ल मे ये बीजेपी की जीत नही बल्कि हार है.


उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव के नतीजे इस लिए भी और चौकाने वाले है क्योके जिस बीजेपी ने २०१४ लोक सभा में ८० में से ७१ सीटों पे कब्ज़ा किया था तथा विधान सभा की ४०३ में से ३१२ सीटों पे जीत दर्ज करवा के तीन चौथाई बहुमत हासिल किया था वो महज़ महीनो में ६१२ शहरी सीटों के निकाय चुनावो में से महज़ ३१२ सीटें ही जीत सकी.  १६ मेयर में से बीजेपी १४ के ऊपर अपनी जीत दर्ज करवाने में सफल हुई.  १२९९ ग्राम पंचायत में बीजेपी महज़ ५४६ में अपनी जीत दर्ज करवा सकी.  मज़े की बात तो ये है की जहाँ जहाँ बलोट पेपर के साथ वोटिंग हुई उस सीट पे या तो बीजेपी के उम्मीदवार की ज़मानत ज़प्त हुई या वो हरा और जहाँ जहाँ इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के दोवारा वोटिंग हुई वहां बीजेपी जीती है.


फिर अपनी हार को जग ज़ाहिर करने की कवायत को तेज़ करते हुए और जैसा की आतंकवादीओ की आदत है के बात का बतंगड़ बनाना इस हार को भी जीत का सेहरा बांधने की कवायत तेज़ हो गई और बड़े बड़े सूरमाओ ने भी वर्त्तमान पत्रों को  इस हार को भी जीत की बधाई संदेशो से भर डाला. जिसमे मुख्यता प्रधान चायवाला, नीरस, बेस्वाद, फूहड़ महिला के ट्वीट्स है.  स्मृति ईरानी ने अपने बधाई सन्देश के ट्वीट में इस जीत के ऊपर योगी के विकास को ज़िम्मेदार बताया था. इस विकास नाम के बालक के पैदा होने में योगी और इस महिला का कोई भी योगदान नहीं था फिर भी बधाई संदेशो में उन दोनों के योगदान को याद किया गया अब जब सब कुछ सामने गया है के विकास नाम का बालक बीजेपी से पैदा ही नहीं हुआ तो क्या स्मृति ईरानी अपने ऊपर इस लज्जा और बेशर्मी के ताज को पहनना चाहेगी.


बीजेपी झूट के ज़रिये अपनी खोकली और खोती हुई ज़मीन का भृम जनता के मन में कायम रखना चाहती है के अभी तक जनता बीजेपी के साथ है और उसके ऊट पटांग निर्णयों का जनता ने खुले दिल से सुवागत किया है जिसका सबूत हर जगह बीजेपी को मिली जीत है क्योके अगर बीजपी का असली और हार का चेहरा  अगर जनता के सामने गया तो उसका असर गुजरात विधान सभा और २०१९ के चुनावों पे विपरीत परिणाम आएगा इसीलिए अमित ने उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में मिली जीत पे गुजरात पे उसका परिणाम होगा पत्रकारों के इस जवाब पे कन्नी काट ली और कहा गुजरात के चुनाव अलग है और उत्तर प्रदेश के अलग.

No comments:

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...