गुजरात में चुनाव और उसका माहौल देखते हुए एक पुरानी कहावत याद आ गई जिसपे हिन्दू आतंकवादी पूरी तरह से यकीन रखते है "मोहब्बत और जंग में सब जाइज़ है" आम तौर पे जिस तरह की गाली गलौच ओछी भाषा का इस्तेमाल एक दुसरे के ऊपर कीचड उड़ाना. झूठे आरोप प्रत्यारोप ये अब भारतीय राजनीति का हिस्सा बन चूका है. एक तवील अरसे तक ये राजनीतिज्ञ खामोश रहते है और जैसे ही चुनाव का बिगुल बजा और जिस किसी भी पक्ष को अपना पड़ला कम नज़र आने लगा वो राजनीति के न्यूनतम स्तर पे उतर जाती है.
लेकिन इस पत्रकार का कुछ और ही मानना है जैसा की इस पत्रकार की आदत है हर वो काम करना जो समाज आम तौर पे नहीं करता या दुसरे शब्दों में कह लीजिये दुनिया से अलग हट के या जो आम तौर पे एक धारणा या भेड़ चाल है उससे हट के चलना. फिर कुछ समय बाद इसी ही पत्रकार की बाते आम हो कर समाज उसकी बातो का ट्रेंड बना के फॉलो करना शुरू कर देता है. इस पत्रकार का मानना है नदी के प्रवाह या हवा के रूख के साथ तो समूचा समाज आसानी से चल सकता है लेकिन असली मर्द वो हे जो अपनी राह खुद बनाये और नदी के प्रवाह या हवा के रूख के विरूद्ध चले और फिर जीत के दिखाए. इस पत्रकार का मानना है "मोहब्बत और जंग में जो भी हो सब जाइज़ हो"
गन्दी, ओछी, साम्प्रदाइक, गाली गलोच, ज़ात पात की राजनीति की शुरूआत भाजपा के दौर से शुरू हुई. इस गाली गलोच, साम्प्रदाइक राजनीती की शूरूआत १९९२ में भाजपा ने शुरू की थी जो आज के खुद भाजपा के मुख्या और उनके प्रमुख भाषा की मर्यादा नहीं रख पाते. उत्तर प्रदेश के पहले और दुसरे दौर की वोटिंग के बाद जब भाजपा ने अपनी स्थिति को भांप लिए तो फिर शुरू हुई ज़ात पात की राजनीति झूठे और बेबुनियाद आरोपों का दौर. शमशान और कब्रस्तान का जुमला. फिर ईद और दिवाली का बयान.
१९९२ से पहले भाजपा के सिर्फ २ संसद चुन के आते थे फिर शुरू किया गया साम्प्रदाइक ध्रूवीकरण और राम रथ पे सवार हो कर आडवाणी ने देखा प्रधान मंत्री बनने का एक ऐसा सपना जो उसके लिए सपना ही बन के रह गया. आज वही आडवाणी जो कभी भाजपा का शीर्ष नेता हुआ करता था गुमनामी के अंधेरो में जीने को मजबूर है. जिस इंसान ने राजनितिक फायदे के लिए भारत की हवाओ को प्रदूषित किया था जिस इंसान ने गंगा जमुनी तहज़ीब की हत्या की और पीठ में खंजर घोपा जिस इंसान ने भारत के मीठे पानी में साम्प्रदाइकता का ज़हर घोल के उसको कड़वा किया था आज वो ही इंसान राजनीति के सबसे कड़वे अनुभवो का एहसास कर रहा है. जिसके लिए संसद के गलियारे तंग कर दिए गए. जिस इंसान ने पार्टी को २ से लेकर शीर्ष तक ले जाने का बीड़ा उठाया हो कब उसने सोचा होगा उसके लिए पार्टी का सपोर्ट सिर्फ नाम मात्र का रह जाएगा.
हर बार की तरह जब भाजपा अपना जहाज़ डूबते हुए महसूस करती है तब उसको राम याद आने लगते है, अगर राम मदद को नहीं पहुंचे और उनका वनवास पूरा नहीं हुआ तो अंत में मुसलमानो की मदद या फिर पाक (एक मुस्लिम देश) से मदद की गुहार लगाईं जाती है. मतलब मुसलमानो को या पाक को कौस के वोट्स का साम्प्रदाइक ध्रुवीकरण किया जाता है.
जब मोदी प्रधान मंत्री की आकांक्षाएं ले कर दिल्ली की सल्तनत पे काबिज़ होने का सपना देख रहा था उसी समय उसने तब के प्रधान मंत्री और मैत्रीपूर्ण पडोसी देश पाकिस्तान के प्रधान मंत्री को भी राजनीती के गंदे दलदल में घसीटने की कोशिश की थी. मोदी अपनी चुनावी सभाओ में पाक के प्रधान मंत्री श्री शरीफ साहब पे लांछन लगाता है के नवाज़ शरीफ ने मेरे देश के प्रधान मंत्री का अपमान किया उन्होंने भारत के प्रधान मंत्री की तुलना एक देहाती औरत से की फिर इस पत्रकार ने तुरत अपने पाक पत्रकारों से ज़्यादा
जानकारी ली तभी उन्होंने पाक प्रधान मंत्री का किया हुआ इंटरव्यू इस पत्रकार को इस
सन्देश के साथ भेज दिया के हमारे प्रधान मंत्री सभ्यता पे यकीन रखते है और सभ्य भाषा
का प्रयोग करते है. ख़ास कर के अगर ये भाषा किसी देश के प्रधान मंत्री के लिए की जाए.
आगे उन्होंने लिखा ऐसी असभ्य भाषा किसी आतंकी, फरेबी, झूठे की हो सकती है जो चुनाव
जितने के लिए सारी मर्यादा भूल जाए और भूल जाए के विदेशी उच्च गरिमा वाले व्यक्तित्व
को कैसे सम्भोदित किया जाना चाहिए. मोदी भक्त
उसी रस्ते पे चल रहे है जो उनके आका और हिन्दू स्टेट के चीफ ने बनाया है. गन्दी भाषा,
महिलाओ के लिए अपशब्द, महिला प्रतिद्वेंदी को रेप और गेंग रेप की धमकी देना, अपने प्रतिद्वेंदी
को जान से मारने की धमकी देना. उसके मज़हबी
एतेक़ाद पे गन्दी, गलीज़ गालिओ से हमला करना, उसके परिवार की महिला वर्ग के लिए अति न्यूनतम
दर्जे के कमेंट करना और रेप, गैंग रेप की धमकी देना.
भारत तो भारत विदेशी उच्च अधिकारिओ के साथ साथ अब तो विश्व में भी मोदी भक्त अपनी गन्दी छाप और छवि का मुज़हेरा करते हुए दिखाई देने लगे है. पिछले महीने सयुक्त राष्ट्र में इस तरह की ज़लील गन्दी गाली गलोच वाली भाषा का भारत की तरफ से प्रयोग किया गया. पाक के कश्मीर में भारत के ज़ुल्म, मज़ालिम के सवाल पे यूं.एन. में भारत के प्रतिनिधि ने गन्दी, ओछी और अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया. जिससे विदेशी संसद में भारत की साख को ज़बर्दस्त झटका लगा. माना के मोदी की कैबिनेट में और भाजपा के संसादो में गुंडे, मावली आतंकी, खुनी, डाकू, बलात्कारी सब मौजूद है और जिस तरह ये आतंकी प्रवर्ति के लादे हुए गुंडे भारत की संसद पे कब्ज़ा किये हुए है और जैसा व्यवहार संसद में करते है विश्व की संसद में भी वैसा ही कर के अपनी माता भारत की इज़्ज़त की धज्जिया उड़वा दी. जिस तरह ये लोग एक पराई नार पे बलात्कार करते है उसी तरह इन्होने अपनी माता का विश्व संसद में बलात्कार कर दिया. और अपनी माता को भरे दरबार में नग्न और लज्जित कर दिया.
उसपे मीडिया के लंगूर पत्रकारों की मण्डली अपनी माता भारत को अपमानित करने वाले का महामण्डन और गुड़गान कर रही थी जिस तरह से एक नारी को भरे दरबार में नग्न किये जाने पे नंगा करने वाला लज्जित और शर्मिंदा नहीं हो रहा था बल्कि दरबार में हसी मज़ाक बनाया जा रहा था और नग्न करने वाले को प्रोत्साहित किया जा रहा था. उसी तरह विश्व की संसद में किये हुए वक्तव पे लंगूर पत्रकारों की मण्डली का भारत के प्रतिनिधि मंडल का महामण्डन करना प्रशंसा करना इस बात को प्रमाणित करता है के भक्त आज ही नहीं बल्कि
प्राचीन काल में भी असभ्य और दुष्ट होते थे. इन लंगूर पत्रकारों का महामण्डन और गुणगान तब तक बंद नहीं हुआ जब तक इस पत्रकार ने समूचे प्रकरण की धज्जिया न उड़ा दी और विश्लेषण नहीं कर दिया के अंतराष्ट्रीय स्तर पे भारत के प्रतिनिधि मंडल की अमर्यादित, असभ्य और असवैधानिक भाषा से भारत के गौरव
को अंतराष्ट्रीय संसद में ज़लील होना पड़ा है न की भारत का गौरव और मान सम्मान ऐसी ओछी,
असभ्य और असवैधानिक भाषा से बड़ा है.
भक्तो के
पापा तो दो कदम आगे ही रहते है हर चुनाव में कुछ ऐसा बोल बैठते हे जिससे लगे की वो
तो सिर्फ नाम मात्र के प्रधान है असल में वो तो हिन्दू स्टेट (हिन्दू राष्ट्र) के आतंकिओ
के आका और सर्वे सर्वा है. जिसको कहते है करता धर्ता. उत्तर प्रदेश का शमशान और कब्रस्तान का जुमला. फिर
ईद और दिवाली का बयान शायद कोई भी मतदाता भूला नहीं होगा. गुजरात चुनाव में इससे भी आगे निकल गए श्रीमान आका
महोदय. इस बार तो उन्होंने भक्तो से सीधा सवाल
कर डाला "आपको मंदिर चाहिए या मस्जिद" चुनाव में ऐसी साप्रदायक बातो के लिए
जगह है क्या. श्रीमान चुनाव आयोग बताये, क्या
सांविधानिक पोस्ट पे बैठे एक पंत प्रधान को ये जेब देता है के वो किसी एक सम्प्रदाय
का सपोर्ट करे. उसके इस सवाल पे हैदराबाद के
संसद और मज़लूमो के हामी इन्साफ की आवाज़ का झंडा बुंलंद करने वाले अलमदार सेपेसालर श्रीमान
असदुद्दीन ओवेसी ने लंगूर पत्रकारों और सभ्य पत्रकारों के सामने तीखी प्रतिक्रिया दी.
निश्चित रूप से यह पत्रकार इस नामुराद को भारत के प्रधान मंत्री के रूप में स्वीकार नहीं करता है बल्कि ये पत्रकार उसे हिंदू स्टेट (हिन्दू राष्ट्र) के प्रमुख के रूप में मानता है। दो मुख्य कारण यह पत्रकार अपने बयान को अधिक मजबूत और कठोर बनाने के लिए स्पष्ट करना चाहता है। सबसे पहले वह जनता के दुवारा चूना हुआ प्रतिनिधि नहीं है बल्कि ईवीएम के माध्यम से लाया गया और लादा हुआ प्रतिनिधि है। दूसरे, उसने मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों पर सभी तरह के अत्याचारों पर अपनी आंखें बंद कर दीं, लेकिन जब कोई भी आतंकवादी मारा गया तो पूरे कैबिनेट ने हत्या के खिलाफ रोना शुरू कर दिया। मुसलमानों को न सिर्फ आतंकवादियों द्वारा मार दिया जाता है, बल्कि अब खाकी आतंकवादी (पुलिस) भी उन्हें मार रही है। तीन दिन पहले अलवर राजस्थान हिंदू स्टेट (के आतंकवादीओ दोवारा कब्ज़ा किया हुआ एक हिस्सा) में खाकी आतंकवादियों (पुलिस) द्वारा मुठभेड़ के नाम पर दो २० और २२ साल के किशोरों की हत्या कर दी। इतना ही नहीं खाकी आतंकवादीओ ने शव का प्रोस्टमॉर्टम नहीं होने दिया और न ही शव को अंतिम संस्कार के लिए परिवार वालो को सौपा।
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