गुजरात में बीजेपी प्रत्याशिओं को पब्लिक का ज़बरदस्त विरोध झेलना पड़ रहा है
शहज़ादे और एंटी इंकम्बेंसी फेक्टर के तहत गुजरात चुनाव का समीकरण इतना आसान नहीं होगा जितना उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावो के नतीजे. उसकी वजह ये पोलिटिकल पंडित और उसका विश्लेषण बताना चाहेगा एक उत्तर प्रदेश में अभी योगी सरकार को काबिज़ हुए ८ महीने ही हुए है. तो योगी सरकार के साथ एंटी इंकम्बेंसी फेक्टर काम नहीं कर पाया. जनता ने योगी सरकार को और समय देने का मन बना लिया है. जबकि गुजरात में बीजेपी को काबिज़ हुए २० साल से ज़्यादा वक्त बीत चूका है तो गुजरात में ज़बरदस्त एंटी इंकम्बेंसी फेक्टर काम करेगा. अगर फिर भी बीजेपी उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव के नतीजों को गुजरात चुनाव पे परिणाम की दृष्टि से देख रही है तो ये उसकी भूल ही कही जायगी, गुजरात में पब्लिक अपना मन बना चुकी है और अब किसी भी चुनाव का नतीजा गुजरात परिणाम को प्रभावित नहीं कर सकेगा.
समूचे राजनीतिक
समीकरण और इस पोलिटिकल पंडित का विश्लेषण तो इसी और इशारा कर रहे है के गुजरात में
इस बार बीजेपी के लिए राजनितिक डगर और सत्ता की मलाई फिर से खाना आसान नहीं होगा बल्कि
टेडी खीर साबित होगा कठिन परिश्रम के बाद भी बीजेपी सत्ता से दूर ही रहेगी. अगर फिर
भी बीजेपी सत्ता पे काबिज़ होती है तो उसकी सिर्फ दो वजह इस पत्रकार और पोलिटिकल पंडित
को समझ में आती है एक ज़ात पात की राजनीति कर के वोटो का ध्रुवीकरण जिसका इस पत्रकार ने अपने २७ अक्टूबर २०१७ के एक लेख फिर हो
सकता है गुजरात
में २००२ जैसा
हमला में विश्लेषण किया है के किस तरह बीजेपी गुजरात में अपना जनाधार खो रही है और और किस तरह से फिर से सत्ता के गलियारों ज़ात पात की
राजनीति कर के और वोट्स का ध्रुवीकरण कर के काबिज़ होने की कोशिश कर सकती है. जिसका
सबूत पिछले सप्ताह देखने को भी मिला के किस तरह से ‘सबका साथ सबका विकास’ धर्म और मज़हब
में तब्दील हो गया. दूसरा इ.वि.ऍम. में गड़बड़ी कर के बीजेपी समूचे गुजरात चुनाव को ही
फिक्स कर डाले जिसका इस पत्रकार ने अपने लेख गुजरात में फिर
हो सकती है
प्रजातंत्र की हत्या मोहिय्या और सटीक जानकारी के साथ विश्लेषण किया है.
फिर जिस तरह
से बीजेपी समूचे राष्ट्र में अपना जनाधार खो रही है जिसका ज़िक्र इस पत्रकार ने अपने
लेख ख़त्म हो
रहा तिलिस्म में किया है उससे साफ़ ज़ाहिर होता है के बीजेपी ने उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में भी धांधली की थी जिसका सबूत ये विडिओस और फोटोग्राफ्स है,
फिर स्मुर्ती
ईरानी हारी हुई घोड़ी जिसके ऊपर कोई भी बिजनेसमैन दांव नहीं लगाएगा उत्तर प्रदेश में
निकाय चुनाव में मिली जीत का श्रेय योगी के ८ महीनो के कार्य काल को दे रही है. किसी भी प्रदेश के ८ महीनो की सरकार
को निकाय चुनाव में मिली जीत को उसकी कार्य का विश्लेषण नहीं कह सकते. फिर जिस उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव की जीत को बीजेपी योगी के कार्य का आकलन बता रही है तो मोदी जी के विकास नाम का बालक आज ४ सालो में बाहर नहीं आया तो ८ महीनो में एक योगी के विकास का बालक कैसे बाहर आ सकता है. वैसे भी वैद्यकीय मान्यता के हिसाब से ९ महीनो में पूरी तरह से विकास दिखाई देता है. ८ महीनो वाला विकास कमज़ोर, कम अक्ल और कभी कभी मर भी जाता है. तो बीजेपी का योगी के ८ महीनो के विकास का क्रेडिट उसी की पोल खोल रहा है के कुछ तो गड़बड़ हुई है विकास
को पैदा करने में या ये विकास नाजाइज़ है.
जिस प्रकार से जनता के मन में गुजरात सरकार के खिलाफ एक आक्रोश और गुस्सा है वो इसी बात से साबित हो जाता है के सूबे के मौजूदा मुख्य मंत्री की रैली में भीड़ का आलम जिसमे से ज्यादातर तो उनके सुरक्षा कर्मी ही होंगे तो जनता की भीड़ कहा है मतलब साफ़ है जनता साथ नहीं
है.
दूसरी तस्वीर में खली पड़ी कुर्सियां अपनी दास्तान को बयान कर रही है जो मोदी और अमित के इस्तक़बाल में जनता की नुमाइंदगी के लिए बिछाई गई थी लेकिन कुर्सियां तो आ गई और जनता नदारद
जनता का मिज़ाज़ तो उत्तर प्रदेश में भी कुछ और था लेकिन जिस जीत को बीजेपी योगी के ८ महीनो के कार्य का विश्लेषण कर रही है वो असल में इ.वि.एम्. की मेहरबानी है




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