Wednesday, 20 December 2017

मुस्लिम और पाक आये बचाव में

गुजरात चुनाव में लार्ड रामा हिन्दू स्टेट के आतंकवादीओ और उसके आका को बचाने नहीं पहुंच सके.  शायद उनको डर सता रहा होगा अगर पराजित हो गया तो किस मुख से अपनी सीता देवी के पास जाउगा.  या फिर उनका वनवास खत्म ही नहीं हुआ होगा. फिर अंत में बचाव के लिए और मदद के लिए हिन्दू स्टेट के आतंकिओ ने सहारा लिया मुस्लिम समाज का और पाक का. पहले दौर की वोटिंग खत्म होने के बाद शुरू हुई ज़ात पात की राजनीति, हिन्दू मुस्लिम की राजनीति, पाक के नाम से वोट लेने की राजनीति. तो इस हिसाब से आतंकवादीओ को राम ने नहीं रहीम ने जीत दिलवाई हे.  पाक में भी रहीम वाले और जिन मुस्लिम समाज के नाम पे वोट लिया वो भी रहीम वाले. 


चुनाव रिजल्ट्स आने के बाद एक आतंकी बेहूदा ट्वीट्स करता है और राम को इस जीत का दावेदार बताता है.  अरे बाबा जो अपनी जोरू की अस्मत नहीं बचा सका वो किया किसी को बचाएगा और जीतवायेगा.  अगर सती सावित्री थी तो अग्नि परीक्षा का किया मतलब है. दूसरी बात जिस जीत में राम का कोई योगदान ही नहीं हो उस जीत को कैसे आप हज के ऊपर राम की जीत बतला सकते हो. सही है आपका भी कहना सही है आप उसी समाज के वंशज हो जो अपनी पत्नी को पराये साधू या इंसान के पास भेजते हो और 'नियोग' प्रथा के तहत पैदा होने वाले 'विकास' नामक नाजाइज़ बालक को अपनी संतान कहते हो और उसको जाइज़ बतलाते हो.  तो इस जीत में भी वही हुआ जिस जीत को आप हज के ऊपर राम की जीत बतला रहे हो असल में वो नियोग प्रथा के तहत मुस्लिमो की संतान है राम चुनाव में नदारद थे फिर चुनाव मुस्लिमो के पास भेजा गया और उनके नाम से पाक के नाम से वोट्स का ध्रूवीकरण किया गया और जीत नमक बालक आया.


जो मनुष्य अपनी पत्नी पे भरोसा नहीं कर सकता और उससे अपनी पवित्रा साबित करने के लिए लेता है अग्नि परीक्षा वो क्या किसी के जीत या हार का कारन बन सकता है. वो सिर्फ परीक्षा ही ले सकता है वो भी एक महिला की.  फिर भी अग्नि परीक्षा के बाद भी महल से निकाली गई.  आज उन्ही रीति रिवाज पे आतंकी चल पड़े है.  खुद मास्टर माइंड ने अपनी बिहाता को ज़िन्दगी के मझदार में अकेला छोड़ दिया है.  फिर इन सभी आतंकिओ को दूसरी महिलाओ को बड़ी फ़िक्र है.  किसी के भी विवाहिक जीवन में किया हो रहा है उसकी ताक झांक करने वाले आपलोग कौन होते हो. एक इंसान को अपने निजी जीवन से अलहदगी इख़्तियार करने पे तीन साल की कैद और जो अपनी बीवी को न छोड़ रहा है और न तलाक दे रहा है बस रख छोड़ा है और खुद दूसरी महिलाओ के साथ अपनी राते रंगीन कर रहा है उसको माफ़ी. ये केसा इन्साफ है.  न तो तुम अपनी बीवी को रख रहे हो और न ही उसको इजाज़त है के वो अपनी मर्ज़ी से दूसरी शादी कर ले. ये कितना ज़ुल्म है के एक महिला अपनी यौन इच्छा किस हद तक दबा के रख रही होगी.  लेकिन आपको तो दूसरी बहनो की फ़िक्र सताने लगी है.  हिन्दुस्तान में कम से कम २ लाख हिन्दू महिलाये हर वर्ष अपने पति से अलग हो जाती है उनको तलाक भी नहीं दिया जाता और उनको इतनी भी इजाज़त नहीं के वो अपने पति के साथ रह सके या दूसरी शादी कर सके. 


तो जो लल्लू गुजरात की जीत को हज के ऊपर राम की जीत बता रहे है वो असल में मुस्लिमो से पैदा होने वाली 'नियोग' प्रथा की संतान है.  समझे लल्लू राम 

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