अज़ीज़ नाज़रीन
मेरा ऐसा मानना है स्कूल एक बच्चे का दूसरा घर होता है और उस्ताद दूसरी वालेदा लेकिन जो सबक़ उसको मिलता है वोह पहला होता है। उसको जो कुछ स्कूल में सिखाया जाता है या जो हादसात अच्छे या बुरे उसके साथ हो गए वोह उसके नाज़ुक दिमाग़ में चस्पा हो जातें हैं।
तिब्बी उलूम से भी यह बात साबित होती है जो बचपन में बच्चे के साथ ज़ुल्म शिद्दत जबर हो जाता है तो उस हादसे को वोह बच्चा नहीं भूल पाता है और वोह हादसे उसके दिमाग़ की किसी हिस्से में जा कर मेहफ़ूज़ हो जातें हैं। गाहे बगाहे फिर ऐसे हादसे ज़ुल्म उसको मरे तक याद रहतें हैं। बचपन में हुए हादसात की वजह से कई नौजवान अपनी जवानी में उन सब चीज़ों का बदला लेते हैं।
नाज़रीन उस्ताद की ज़िम्मेदारी होती है की किसी भी मासूम के अंदर इस तरीके के ज़हर को ना पनपने दे और अच्छी तालीम दे। अच्छे अदब और तहज़ीब सिखाये जिससे मुल्क, क़ौम और इंसानियत का कुछ भला हो सके। बरक्स उसके कुछ उस्तादों के दिलों दिमाग़ में इस क़दर ज़हर भरा होता है की वोह ख़ास मज़हब के बच्चे को देख कर आग बबूला हो जातें हैं।
नाज़रीन मुस्लिम बच्चों में ज़हानत और बेहतरीन तख़्लीक़ी ज़ेहन की कोई कमी नहीं है। यह तो उनकी बदक़िस्मती है की उनको मुफ़लिसी या किसी और वजूहात की वजह से माक़ूल मौक़े फ़राहम नहीं होतें हैं लेकिन जिनको मौक़े मिलते हैं वोह अपनी ज़हानत का लोहा उस्ताद और अपने साथ पढ़ने वाले दिगर तालिब ए इल्मों से मनवा लेते हैं। जिसका ज़िक्र ३ अप्रैल को लिखे मेरे मज़मून ज़हानत, फ़ज़ीलत किसी की ग़ुलाम नहीं होती। में किया गया है।
भारत में मुस्लिम बच्चों को लाइल्मी के अँधेरे में ग़र्क़ाब करने में हुकूमतों ने नुमाया किरदार अदा किया है। मुस्लिम हलकों में आपको शराब की दूकान दिखेगी, जुव्वे के अड्डे दिख जायेगें लेकिन एक भी हुकूमत के ज़ेरे इंतज़ाम स्कूल नहीं दिखेगा। फिर अगर तालीम देने की ज़िम्मेदारी कोई दानिशमंद उठाता है और मदरसा खोलता है तो उस पर ज़ालिम हुकूमत की तनक़ीद नज़र होती है और लंगूर लँगूरनियाँ नो निहाद हिन्दू दानिशमंद मदरसों को हाशिये पर रखने लगतें हैं। आप तो तालिबान बना रहे हो, दहशतगर्दी की तालीम दे रहे हो, वतन से बग़ावत सीखा रहे हो, कट्टरपंथी सोच भर रहे हो।
तो आप क्या कर रहे हो। आप तो ज़लील कर रहे हो और एक मासूम को एहसास ए कमतरी का शिकार बना रहे हो। उसकी ज़ेहनियत में यह चीज़ चस्पा कर रहे हो की मुसलमानों में शुजात और बहादुरी नहीं बल्कि नपुंसकता होती है। मुसलमानों में से हज़रत ए उमर की बहादुरी अली करम अल्लाह की शुजात छीन रहे हो। अपने साथ तालीम हासिल करने वाली लड़कियों से पिटवा रहे हो उसके पीछे की ज़ेहनियत यही है की वोह बच्चा कभी भी उन लड़कियों से बात चीत करने में एहसास ए कमतरी का शिकार रहे। फ़िर तो अक्सरियत तबक़े के वाल्दैन को यही सोचना होगा और अपनी बच्चिओं को सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ातूनों के स्कूलों में तालीम दिलवानी होगी।
दूसरी चीज़ इल्म इंसान के अंदर ताक़त और क़ुव्वत पैदा करती है सही और ग़लत को समझने की सलाहियत देती है। अगर एक बच्चा पढ़ लिख गया और ज़ालिम के ख़िलाफ़ बोलने की अपने और अपनी क़ौम पर होने वाले ज़ुल्म के ख़िलाफ़ बोलने की क़ुव्वत नहीं है तो उसका इल्म किसी काम का नहीं है।
आप वही एहसास मुस्लिम बच्चों में पैदा कर रहे हो। जबकी उस्ताद की ज़िम्मेदारी होती है सब तालिब ए इल्मों को एक नज़र से देखे अब जिसकी जैसी ज़ेहनियत उसको वैसे मौक़े और वसाइल।
लेकिन यह सब हालात देख कर फ़िर मुझे कहना पड़ता है अगर अक्सरियत अवाम के दिल में मुस्लिम और इस्लाम के ख़िलाफ़ इतनी नफ़रत है तो पाकिस्तान की तोहसीह करो हम चले जायेगें पाकिस्तान।
असदुद्दीन उनकी तंज़ीम या जो भी ग़ुलाम सोच है जो भारत पर मर मिटने की बात करतें हैं यहीं रहेगें यहीं दफ़न होंगे वह ऐसे ज़हरीले माहौल में रहें। जो हमारे साथ आना चाहते हैं उनके लिए तोहसीह करो।
अभी ३ रोज़ क़ब्ल सूबे शुमाल (उत्तर प्रदेश) में एक ज़ईफ़ वाल्दैन को पीट पीट कर हलाक कर दिया कियोंके उनके फ़रज़न्द वसीम को पड़ोस में रहने वाली हिन्दू लड़की से मोहब्बत हो गई और दोनों ने निकाह कर लिया। फ़िर राजिस्थान में ५ रोज़ क़ब्ल एक मुस्लिम नौजवान को १२ से १५ लोगों ने घेर कर तलवार उसके जिस्म में घुसा कर हलाक कर दिया। इन क़ातिलों में महकमा जंगलात भी शामिल था। मतलब हूकूमती नुमाइंदे भी ज़हरीले हो चुके हैं।
ऐसा नहीं है की कांग्रेस के दौर हुकूमत में सब कुछ ठीक हो जाएगा जो मुसलमान इस ख़ुशफ़हमी में होंगे की कांग्रेस आएगी सब ठीक हो जाएगा तो उसका सबसे बड़ा सबूत है मौजूदा कोंग्रेसी हुकूमतों में मुस्लिम हलाकत। राजिस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार में क्या हालात हैं। जो नफ़रत और ज़हर की ख़लीज हिन्दू मुस्लिम, हिन्दू क्रिस्टी समाज के दरमियान पैदा हुई है अब वोह किसी भी हालात में नहीं भर सकती।
अब तो हालात ऐसे हो रहें हैं हिन्दू सिखों के दरमियान वहीँ नफ़रत और ज़हर भरा जा रहा है। जो सिख कभी वतन की आबरू के लिए खुद को क़ुर्बान करने से नहीं चूकते थे उनको गद्दार और खालिस्तानी बोला जा रहा है उनके ख़िलाफ़ नफ़रत भरी जा रही है।
सहाफ़ी ज़ुबेर
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