अज़ीज़ नाज़रीन,
वतन
के सबसे बड़े ग़द्दार और दुश्मन तो दरअसल बीजेपी के दरख़्त से निकले ज़हरीली बीज ही हैं। जिनके ऊपर ज़ाफ़रानी हाकिम मोतदिल नज़र आतें हैं। आज ही सूबे दरमियान से एक बेहद ज़हरीला अवाम की नस्ल
कूशी करने वाला बयान बीजेपी के महा सचिव कैलाश विजयवर्गीय की जानिब से आया है। वोह कहता है किसी ने भी भारत माता के ख़िलाफ़ बोला
तो उसको क़तल कर देंगें।
नाज़रीन हाल ही में ज़ाफ़रानी हुकूमत के ज़ेरे इंतज़ाम हरयाणा का नूह और मणिपुर आतिशे नार हो चुके हैं। हुकूमत की मुनाफ़ेक़त का वोह आलम है की सिर्फ मुस्लिम अवाम के घरों और तिजारत को मिस्मार किया जा रहा है फिर ऐसे ज़हरीले कीड़ों के ऊपर हिकमत ए अमली करने में क्यों हुकूमत क़ासिर दिखती है।
नाज़रीन इन जैसे ज़हरीले बोलों और बीजेपी के आला ओहदेदारों की वजह से पुलिस, इन्तेज़ामियाँ ज़हरीली होती जा रही है जिसका जीता जागता सबूत हाल ही में बंबई का मुस्लिम क़त्ले आम है। जिसमे एक पुलिस कॉन्स्टेबल ने जयपुर एक्सप्रेस में मुस्लिम अवाम को चुन चुन के गोलियां मार कर हलाक कर दिया। इतना ही नहीं जब अपने फ़र्ज़ को अंजाम देने वाले पुलिस वाले ने उसको ऐसा करने से रोका तो उसको भी गोली मार कर हलाक कर दिया।
कल ही अहमदाबाद रेलवे स्टेशन पर एक ट्रैन में होम गार्ड ने दाढ़ी वाले मुसलमान को चाकू मार कर शदीद ज़ख़्मी कर दिया और ट्रैन से उतर कर भाग गया।
अब सवाल यह उठता है ऐसे नाज़ुक मौक़े पर जब भारत बारूद के ढेर पर है तो पेट्रोल डालने की क्या ज़रुरत है। कोई क्यों भारत के ख़िलाफ़ बोलेगा किसी को भारत के ख़िलाफ़ बोलने की क्या हाजत है। लेकिन अक्सरियत अवाम के दिलो दिमाग़ में ज़हर कैसे तैयार होगा ऐसे ही तैयार होगा कियोंके अब मध्य प्रदेश में भी इंतेखाब आने वाले है और जब तक फसाद ना होगा खून नहीं बहेगा इस बीजीपी नाम की दहशत को अक्सरियत अवाम का वोट कैसे मिलेगा। दरअसल यही लोग भारत माता की अस्मिता के ख़िलाफ़ काम कर रहें हैं तो सबसे पहले तो खुद सरकार को इन जैसे लोगों को मार डालना चाहिए जो वतन की फ़िज़ा को खराब कर रहें हैं।
एक बात में ज़रूर इस कैलाश विजयवर्गीय से पूछूंगा जो हर अक्सरियत अवाम का अक़ीदा है की भारत में पैदा होने वाला हर बन्दा उसकी संतान है। फिर क्या क़ानून अपना काम नहीं करता है अगर माता खुद अपनी संतान का क़तल कर देती है। कई ऐसे क़िस्से हुए हैं जहाँ पर माता ने खुद अपनी संतान को मौत के घाट उतार दिया यहाँ तक ६ माह के शीर खोर मासूम बच्चे तक का क़तल कर दिया। तो क्या ऐसी माता को पुलिस गिरफ्तार नहीं करती है और क़ानून के हिसाब से उसको सज़ा नहीं होती है।
अब दूसरा पहलू अगर भारत माता खुद अपनी संतान को क़तल करना शुरू कर दे तो उसके लिए क्या सज़ा होना चाहिए। संतान चाहे कितनी भी बिगड़ी हो अय्याश हो लेकिन एक माता को अपनी संतान को भी मारने का हक़ नहीं है फिर अगर भारत माता खुद अपनी संतान का क़त्ले आम कर रही है तो उसके ऊपर क्या सज़ा देंगें यह बीजेपी वाले और कैलाश विजयवर्गीय जैसे मुनाफ़िक़।
कैलाश विजय वर्गीय बोलता है जो BMJ का नारा लगाएगा वोह हमारा भाई है उसके लिए हम जान भी दे देंगें लेकिन जो ख़िलाफ़ जाएगा उसकी जान ले लेगें। उसने अपनी ज़हरीली जुबां से वही राम मंदिर और कई मुतनाज़िया क़िस्सों का ज़िक्र किया। अब ऐसे हस्सास मसलों पर क़त्ल करने की बातें करना चूनौती देना कहाँ तक जाइज़ है। मतलब बात वही हो गयी इंतेखाब को मुत्तासिर करने के लिए खून की होली खेली जाएगी जिसका ज़िक्र हर मज़मून में करता हूँ इंतेखाब से क़ब्ल हिन्दू मुस्लिम होगा। कश्मीर पाकिस्तान निकल कर आयेगें बाबरी मस्जिद और डाका डाली हुई मंदिर का ज़िक्र होगा।
ऐसे ज़हरीली ज़ुबान पर अदालत ए उज़्मा को इदराक लेनी चाहिए। इंतेखाब को खून खराबा कर के मुत्तासिर नहीं किया
जा सकता और अगर कोई कर रहा है तो उस तंज़ीम और नुमाइंदे को ही बेन करना चाहिए। गुजिश्ता १० सालों में कोई काम तो किया नहीं अब
फिर वही खून खराबे की बातें करने लगे।
नाज़रीन एक होता है किसी मुद्दे पर या हालात पर इंसान को उबाल आ जाए और कुछ बयान दे दे तो उसकी तलाफ़ी हो सकती है लेकिन अभी किसी ने ना तो भारत माता के ख़िलाफ़ बोला और ना ही ऐसे हालात थे। मणिपुर में दो खातूनों को बरहना घूमाने और उनके अहले ख़ाना को क़तल करने के बाद उनकी इज्तेमाई अस्मत दरी करने वाले वाक़िये के बाद ना सिर्फ भारत बल्कि आलमी बरादरी में सख्त गुस्सा और गम था।
फिर उस हादसे के बाद मर्कज़ी पुलिस (CRPF) से
किनाराकश हुए एक ब्रिगेडियर ने बयान दिया था अगर में मुलाज़मत में होता तो मुजरिम जनरल
डायर और झलियावाला बाग़ भूल जाते।
में बीजेपी, संघ, शिद्दतपसन्द हिन्दू और भारत के तमाम अवाम से पूछना चाहता हूँ जो वतन परस्ती के लबादे के पीछे तमाम गुन्हा बदकारी और अपनी ही माता को ज़ख़्मी करने का गुनाह करते हैं फिर उनके लिए क्या सज़ा होना चाहिए। फिर भारत क्या है महज़ एक ज़मीन का टुकड़ा या दिवार पर लटका हुआ पोस्टर। मेरे हिसाब से ना तो उस ज़मीन के टुकड़े की कोई हैसियत है और ना ही दिवार पर टंगे हुए नक़्शे की कोई अज़मत और इज़्ज़त है।
लेकिन अगर इज़्ज़त और अज़मत है तो उस ज़मीन में रहने वाले अवाम के किरदार
की है। हूकूमती नुमाइंदों के इन्साफ पसंदी के अमल की इज़्ज़त
है ग़ैर जानिबदार, मुंसिफ़ाना हिकमत की अज़मत है।
हर अवाम को उस ज़मीन में अपने आपको मेहफ़ूज़ तसव्वुर करने की यक़ीन दिहानी की अज़मत
है। वहीँ हो क्या रहा है एक ख़ौफ़ का माहौल तैयार
किया जा रहा है और उसमे ख़ुद हुकूमत से मुनसलिक नुमाइंदे शामिल हैं। अदालतें फैसला दहशत के दबाव में आ कर दे रहीं हैं
हर जानिब क़त्ले आम हो रहा है, हुकूमत का हर फैसला फ़िरक़ापरस्त साबित हो रहा है।
साबित हो जाता है हुकूमत में शामिल ज़ाफ़रानी
नुमाइंदे ख़ुद ही भारत माता के ग़द्दार है तो सबसे पहले हुकूमत को इन जैसी ज़हरीली काश्त
को ख़तम करना होगा।
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