अज़ीज़ नाज़रीन
१८ अगस्त २०२३ जब भारत के ज़ालिम तरीन बादशाह और उसकी टीम ग़ुलामी की ९वी सालगिरह बना रही थी तब बिहार के अररिया में एक ख़बरनामे के सहाफ़ी को गोली मारकर हलाक कर दिया गया। सहाफ़ी की पहचान विमल कुमार यादव के रूप में हुई है।
विमल को उनके मकान में गोली मारी गई है. वारदात १८ अगस्त अल सुबह हुई है. क़तल की सनसनीखेज़ वारदात से इलाके मे दहशत का माहौल है।
नाज़रीन अपनी जमात के महज़ एक अफ़राद के क़तल पर लंगूरों ने बवाल मचा दिया। बिहार में जंगल राज नितीश ज़िम्मेदार और क़तल को सीधा २०२४ के इंतेखाब से जोड़ दिया। अगरचे मारा गया शख्स लंगूरों की जमात से था तो यह सहाफ़ी उसकी मौत का ख़ैरमक़दम करता है। उसकी वजह है इन ९ सालों की ग़ुलामी में जितना ज़हर इन लंगूरों ने अवाम के दिलों दिमाग में भरा था उसकी वजह से आज भारत बटवारे के दो मोहने पर आ खड़ा हुआ है। हर मसले पर मोदी, बीजेपी, संघी दहशत, शिद्दत पसंद हिन्दू जमात से सवाल करने के बजाये सीधा मुख़ालिफ़ों को खटघरे में खड़ा कर देते थे। और कहीं कुछ भी नहीं मिला तो एक मुल्ला जी को बली का बकरा बना कर पेश कर देतें थे।
आज
जब उनकी जमात के लंगूर मारे जा रहें हैं तो बेवा (विधवा) विलाप कर रहें हैं वहीँ २०१४
के बाद से हज़ारों अफ़राद मारे गए हिन्दू मुस्लिम सिख क्रिस्टी दलित लेकिन इन लंगूरों
की जमात की हिम्मत नहीं हुई की ज़ाफ़रानी हाकिमों से इतनी ही सख़ती से सवाल कर लें, जितना
की महज़ एक लंगूर की मौत पर बवाल काटा जा रहा है।
हर मुद्दे पर जब यह लंगूर लँगूरियाँ टके के भाव अपना ज़मीर फ़रोख़्त कर के हवा
मुख़ालिफ़ों और मुस्लिम अवाम के ख़िलाफ़ बांधते थे, बजाये बीजेपी और ज़ाफ़रानी हाकिमों
से ऐसे ही आतिशी अंदाज़ में सवाल करने के मुख़ालिफ़ों से सवाल किये जाते थे। अगर ज़ाफ़रानी हाकिमों की ज़ुल्म और नाइंसाफी पर उस वक़्त सवाल बीजेपी से होता तो आज इनकी जमात के लंगूर की मौत पर ना सिर्फ
भारत बल्कि बेरुन मुल्क भी आंसू बहाता।
मेरा
फलसफा एक दम शफ़्फ़ाफ़ है अगर ज़ालिम के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ कोई क़ुव्वत और ताक़त रखते हुए भी
नहीं बोल रहा है मतलब वोह भी उस ज़ालिम के ज़ुल्म में बराबर का हिस्सेदार है। फिर जब ज़ालिम का हिसाब होगा तो उन तमाम अफ़राद का
हिसाब पूरा होगा जो ज़ालिम के जुर्म में बराहे रास्त या बिला वास्ता शरीक़ थे। जिसका जैसा जुर्म उसको वैसी सज़ा। अगर कोई ज़ालिम की ताईद कर के अपनी आँखों के सामने
क़तल होते देख रहा है और बजाये ज़ालिम का हाथ पकड़ने के उसको रोकने के ख़ुद ऐसे हालात पैदा
कर रहा है क़तल के सामान मोहिय्या कर रहा है ज़हरीली ज़ुबान बोल रहा है मक़तूल के ख़िलाफ़
ज़हर भर रहा है उसका झूठा किरदार कूशी कर रहा है मतलब क़ातिल के साथ मक़तूल के क़तल में वोह
ख़ुद भी बराबर का शरीक़ है।
जैसा आज नितीश को कोसा जा रहा है वैसा ही अगर हर क़तल पर गोरक्षकों, संघी आतंकिओं, बीजेपी वालों, शिद्दत पसंद हिन्दुओं को कटघरे में खड़ा कर के मोदी, अमित, योगी, हेमंत, नाथूराम (नरोत्तम) और बीजेपी के तमाम वज़ीर ए आला जब ज़ुल्म सितम करते थे, बस्तियां की बस्तियां तबाह कर देतें थे उनको कोसते तो हालात इतने पेचीदा नहीं होते थे। मुल्लाजी के क़तल पर बजाये सवाल करने के खुशियां बनाई जाती थी। स्टुडिओं में मिठाइयां बांटी जाती थी। कहीं भी मुल्लाजी के क़त्ल का मसला आया की इन लंगूरों की आँखों का पानी ख़ुश्क हो जाता था। ऐसे हस्सास मसलों को दबाने के लिए हिन्दू मुस्लिम, पाकिस्तान हिंदुस्तान, मंदिर मंस्जिद, कश्मीर में बेहेस को उलझा देते थे अब रो रहे हो।
मेने अपने एक मज़मून में साफ़ यही लिखा है अब पछतावे किया होए जब चूडिया चुग गई खेत।
दरअसल भारत को तबाह करने में सबसे अव्वल नंबर इन लंगूर लँगूरनियों की जमात का आता है। अगर हाकिम ज़ालिम है तो उसकी आँखों में आखें डाल कर उससे सवाल करना था की आप इंसानियत का क़तल महज़ मज़हब की बुन्याद पर नहीं कर सकते। आप एक पूरी तहज़ीब को तबाह और बर्बाद नहीं कर सकते आप किसी एक इंसान के जुर्म की सज़ा पूरे मआशरे को इज्तेमाई सज़ा नहीं दे सकतें। लेकिन ऐसा हुआ और कलेक्टिव पनिशमेंट मुस्लिम अवाम ने पाई और लंगूरों की गद्दार जमात अपने फ़र्ज़ से गद्दारी कर के खामोश रही बल्कि हुकूमत का ही साथ दिया।
अभी तो बोहोत कुछ देखना और भोगना बाक़ी है। कुछ भारत भोगेगा (फ़िरक़ापरस्त नाइंसाफ़ सियासतदान, ज़मीन) कुछ अक्सरियत अवाम कुछ लंगूरों की जमात। अब इसे चाहे पेशनगोई समझ लो या बद्दुआ।
सहाफ़ी
ज़ुबेर
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