अज़ीज़ नाज़रीन,
जिस तरह नाटक में गटर-२ फेम को पाकिस्तान तबाह करते हुए दिखाया गया है वैसा ही हाल चंद्रयान-३ सय्यारे का है। चंद्रयान-५ की तर्ज़ पर भारत का चंद्रयान-३ मिशन क़मर भी तबाह हो चूका है। जितने जारिहाना अंदाज़ में इश्तेहार किया जा रहा है वोह उस बात का ही सबूत है की दाल में काला नहीं पूरी दाल ही काली हो चुकी है।
अगर भारत ने चाँद पर फ़तह हासिल की है तो वाक़ई यह बात क़ाबिल ए तारीफ़ है और हर भारतीय के लिए फ़ख़र का मक़ाम है। जिस ख़ुशी में सिर्फ कुछ खरीदे हुए मुल्लों को दुआ मांगते कुछ मदरसे के बच्चों को और कुछ पंडितों को हवन करते हुए देखा जा सकता है। मियां घुम्मक्कड़ कहाँ गए। उनके क्या तास्सुरात हैं, बीजीपी या किसी भी सियासतदां के क्या तास्सुरात हैं। अब एक एक कर के आना शुरू हो जाएँ तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। पहले कियों नहीं आये।
जिस रूस के सय्यारे को तबाह हुआ बताया गया दरअसल वोह भारत का ही था और मीडिया में एक डम्मी सय्यारा रूस के नाम से तैयार किया जिसकी ना तो आलमी ख़ला तस्दीक़ करता है और ना ही रूस के सफारातख़ाने ने इस बात की तस्दीक़ की है की उसके देश ने कोई सय्यारा ख़ला में छोड़ा था जो तबाह हो चूका है।
तीसरी बात भारत के मीडिया के हिसाब से भारत आलमी ख़ला को फ़तह करने जा रहा है तमाम आलम के तालीमी आफ़ता मुल्कों की नज़र भारत पर टिकी है और मियां घुम्मक्कड़ जुनूबी अफ्रीका जा पहुंचे। क्या ऐसे मौक़े पर जब तमाम आलम की निगाहें भारत पर टिकी हैं और वोह क़मर को फ़तह करने पहुंच गया तो मियां घुमक्कड़ को भारत में मौजूद नहीं होना चाहिए था। क्या वतन के तमाम अवाम के साथ उस खुशी के पल को सांझा नहीं करना चाहिए था।
भारत का सय्यारा चंद्रयान-३ तो पहले ही फ़ौत हो चूका है लेकिन जर्राहों की टीम ने उसको बिस्तर ए मर्ग पर फ़रेबी कहानियों के साथ ज़िंदा रखा हुआ है।
जैसे एक नाटक आया था कनाडा से भगोड़े जोकर का "गब्बर" जिसमे मरे हुए अवाम का इलाज़ चालू रहता है जब तक वोह लाश सड़ने नहीं लगती है उसको ज़िंदा रखा जाता है। चंद्रयान-३ का भी वही हाल है। मियां घुम्मक्कड़ को खबर लग गई थी की भारत का सय्यारा तबाह हो चूका है सो वोह घूमने फिरने जुनूबी अफ्रिका निकल गए।
अब शाम को जब मीडिया फ़रेबी कवरेज दिखायेगा तब वहां से ताली बजाएगें और उठ कर मोहतरमा सोनियां गांधी को मुबारकबाद देंगें।
अब इस मज़मून के बाद हो सकता है मीडिया और जारिहाना अंदाज़ में कवरेज पेश करे। इस बात को साबित करने की कोशिश करे की हमने क़मर पर फ़तह हासिल कर ली। लेकिन यह वैसा ही होगा जैसा सेहरा की ताप्ती गर्मी में रेत के ऊपर पानी का अक्स।
जब भी कोई सय्यारा ख़ला में दाखिल किया जाता है तो उसकी जानकारी आलमी ख़ला को फ़ौरन हो जाती है और उस मुल्क को भी जानकारी देनी होती है लेकिन ऐसी कोई भी जानकारी रूस ने नहीं दी बल्कि जहाँ तक रूस के सिफ़ारत ख़ाने से तहक़ीक़ की गई है उससे यह पता चला की गुजिश्ता १० सालों में उसने कोई सय्यारा ख़ला में नहीं भेजा है।
अमेरिका ने गुजिश्ता ७ सालों में कोई सय्यारा नहीं भेजा फिर तबाहकुन सैय्यरा किस मुल्क का था।
अगर भारत ने चाँद पर फ़तह हासिल की है तो वाक़ई यह बात क़ाबिल ए तारीफ़ है और हर भारतीय के लिए फ़ख़र का मक़ाम है। जिस ख़ुशी में सिर्फ कुछ खरीदे हुए मुल्लों को दुआ मांगते कुछ मदरसे के बच्चों को और कुछ पंडितों को हवन करते हुए देखा जा सकता है। मियां घुम्मक्कड़ कहाँ गए। उनके क्या तास्सुरात हैं, बीजीपी या किसी भी सियासतदां के क्या तास्सुरात हैं। अब एक एक कर के आना शुरू हो जाएँ तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। पहले कियों नहीं आये। लेकिन इस तरक़्क़ी पर सियासत नहीं होना चाहिए। अब यह मरा हुआ सय्यारा चंद्रयान ३ इन्तेख़ाब तक ज़िंदा रहेगा। २०२४ में मीडिया जिस मरे हुए सय्यारे पर बीजपी को नफ़ा पहुंचाने का काम करेगा।
फिर इसरों के साइंसदाओं ने कैसे यकायक सय्यारे को चाँद पर उतरने का वक़्त और दिन बदल दिया। क्या ऐसा हो सकता है। जब कोई सय्यारा ख़ला में पहुंच जाता है तो अब उसके इख़्तेयार में कुछ नहीं होता कियोंके अब वोह दुनियां के ग्रेविटी से बहार हो चूका है। अब वोह ख़ला में अपने आप खींचा जाता है। दूसरी बात ख़ला में कोई ग्रेविटी फाॅर्स नहीं होता है ज़ीरो ग्रेविटी में काम होता है तो कोई भी साइंसदान दावा नहीं कर सकता की १८ बज कर ६ मिनिट पर इस तारिख को इस दिन हम चाँद पर उतरेगें।
सहाफ़ी ज़ुबेर
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